किसी भी देश का रेडियो स्टेशन लाईव

AMAZING TECHNOLOGY 
नीचे दी गई लिंक को ओपन करें, इसके बाद पृथ्वी का गोला यानी ग्लोब दिखाई देगा। उस ग्लोब पर अनेक हरे रंग के छोटे बडे बिंदु दिखाई देंगे। उन बिन्दुओं पर जिस किसी भी देश का रेडियो स्टेशन लाईव सुनाई पडेगा। आजमा कर देखें।

http://radio.garden/live

आरक्षण की गेंद

सरकार ने आरक्षण की बाबत एक अहम फैसला किया है। इस फैसले के तहत नेशनल कमीशन फॉर सोशियली ऐंड एजुकेशनली बैकवर्ड क्लासेस यानी राष्ट्रीय सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ा वर्ग आयोग (एनएसईबीसी) का गठन होगा, जो मौजूदा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की जगह लेगा। पहले भी, आरक्षण का आधार सामाजिक व शैक्षिक पिछड़ापन ही था, और जैसा कि खुद नाम से जाहिर है, नए आयोग के गठन के बाद भी वही होगा। इसमें कुछ गलत नहीं है, संविधान में भी और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में भी आरक्षण की बाबत यही नीति और नजरिया मान्य है। केंद्र सरकार के ताजा निर्णय में अगर कुछ नया है, तो एक यह कि इसके जरिए उसने आरक्षण की गेंद संसद के पाले में डाल दी है। दूसरे, प्रस्तावित एनएसईबीसी को संवैधानिक दर्जा दिया जाएगा, जैसा कि अनुसूचित जाति आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग को हासिल है।

पर यह दर्जा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को प्राप्त नहीं था। सवाल है कि सरकार के इस फैसले से आरक्षण को लेकर क्या फर्क पड़ेगा? सबसे खास बात यह होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर किस जाति को पिछड़े वर्ग में रखा जाए और किसे बाहर किया जाए, इसका फैसला केंद्र सरकार के बजाय संसद करेगी। एनएसईबीसी का एक अध्यक्ष होगा और एक उपाध्यक्ष, और तीन अन्य सदस्य होंगे। नागरिकों के किसी समूह को पिछड़े वर्ग में शामिल करना है या उससे बाहर करना है इस बारे में प्रस्तावित आयोग केंद्र सरकार को अपनी सिफारिश भेजेगा। आयोग की सलाह अमूमन केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी होगी। मगर इस बाध्यकारिता का कोई ज्यादा मतलब नहीं होगा, क्योंकि फैसला अंतत: संसद करेगी। अलबत्ता यह जरूर कहा जा सकता है कि निर्णय संसद में होने का व्यावहारिक अर्थ यह होगा कि सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन की भूमिका उसमें अहम होगी।

लेकिन जब ओबीसी आरक्षण के लिए जाट आंदोलन जैसी उलझन में डाल देने वाली स्थिति होगी, तो सरकार पल्ला झाड़ते हुए कह सकेगी कि हमारे हाथ बंधे हुए हैं, फैसला हमें नहीं संसद को करना है। पटेल औरकापु जैसी कई और ताकतवर जातियां भी आरक्षण मांग रही हैं। उनकी सियासी ताकत को देखते हुए, क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि संसद उनकी मांग पर सिर्फ सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के कोण से विचार करेगी? दूसरे, क्या इस बात की भी आशंका नहीं है कि कोई ऐसा समुदाय, जो संख्याबल में कमजोर हो और राजनीतिक नफे-नुकसान के लिहाज से ज्यादा मायने न रखता हो, उसके आवेदन या उसकी शिकायत को नजरअंदाज कर दिया जाए? आरक्षण को लेकर उभरने वाले विवादों के पीछे दो सबसे बड़ी वजहें हैं।

एक यह कि मांग की तुलना में रोजगार के नए अवसर बहुत कम पैदा हो रहे हैं। दूसरे, संगठित क्षेत्र की नौकरियों के बरक्स असंगठित क्षेत्र के रोजगार में पैसा भी बहुत कम मिलता है और असुरक्षा भी ज्यादा होती है। खेती के लगातार घाटे का धंधा बने रहने तथा अन्य स्व-रोजगार में अस्थिरता व दूसरी मुश्किलों के चलते सरकारी नौकरी सबका सपना हो गई है। यही कारण है कि जाट, पटेल और कापु जैसे समुदाय, जो कभी अपनी आत्मछवि पिछड़े के तौर पर नहीं देखते थे, अब आरक्षण के लिए आसमान सिर पर उठा लेते हैं। कोई भी पार्टी वोट के नुकसान के डर से आरक्षण की अनुचित मांग के खिलाफ मुंह नहीं खोलती। ऐसे में, संसद में सियासी समीकरणों से ऊपर उठ कर विचार होगा, इसकी ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती।

OBC आयोग को मिलेगा संवैधानिक दर्जा; संसद के पास होगा आरक्षण देने का अधिकार

jansatta

ऐसे थे हमारे साहेब काँशीराम जी

👏👏 *कांशीराम साहब का समाज के प्रति समर्पण भावना, लगन, निष्ठा तथा परिश्रमी स्वभाव का लोहा हर कोई मानता है।वे शुरू से ही कहा करते थे,’इस शरीर से जितना काम लेना हो ले लेना चाहिए, बाद में तो यह मिट्टी में ही मिलना है।अपनी साईकिल यात्रा के दौरान साहब कहा करते थे मेरे प्रत्येक कार्यकर्ता को प्रतिदिन20किलोमीटर पैदल या साईकिल पर चलना चाहिए और इस परिधि में पड़ने वाले प्रत्येक बहुजन से संपर्क करते हुए उसे आंबेडकरी मिशन की रुपरेखा बतानी चाहिए।चाहे चिलचिलाती धुप हो, चाहे थिकुरते जाड़े और चाहे मूसलाधार बारिश हो।साहब कभी रुके नही, झुके नही।बाहर मौसम की भयानक मार पड़ रही होती और साहब कहते नेचर अपना काम कर रही है और हमे अपना काम करना है।नही तो नेचर के बिरुद्ध हो जाएगा।प्रकृति जब आराम नही कर रही है,तब हम भी क्यों करे।साहब पल-पल का सदुपयोग करते।अकसर कहते जिनको बुद्ध फुले आंबेडकर के सपनो को साकार करना है उन्हें आराम की फुर्सत ही कहां?”*

🙏 *ऐसे थे हमारे साहेब काँशीराम जी जिनसे हमे सीख लेनी चाहिए* !
💙🐘💙🐘💙🐘💙🐘💙🐘💙
💐 *साहब काँशीराम जी को सत् सत् नमन*💐
*जय भीम*

थैंक्स फॉर 90 वोट्स

मानवता के इतिहास में तमाम करुण कहानियां अनकही रही गई हैं. इरोम शर्मिला का अपनी मुसलसल हार के लिए जनता को धन्यवाद देना वैसी ही एक अनकही कहानी है.

इरोम शर्मिला. (फोटो: पीटीआई)

मणिपुर का मालोम बस स्टैंड. तारीख़ 2 नवंबर, 2000. एक महिला कवि बस स्टैंड पर खड़ी थी. सुरक्षाबलों का एक दस्ता पहुंचता है और दस युवाओं पर अंधाधुंध गोलियां बरसा कर उन्हें भून देता है. कवि हृदय रो पड़ता है. भारतीय संविधान में तो अपराधी या आतंकी को भी ऐसी सज़ा देने का प्रावधान नहीं है!

उस महिला कवि ने फ़ैसला किया कि वह इस काले क़ानून के ख़िलाफ़ लड़ेगी. इस तरह किसी को कैसे मारा जा सकता है? यह कौन सा क़ानून है? यह क़ानून है सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम यानी आफ्सपा, जो पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में लागू है. यह क़ानून सुरक्षा बलों को यह अधिकार देता है कि वह किसी को शक के आधार पर गोली मार सकते हैं.

उस युवा महिला कवि का नाम है इरोम शर्मिला चानू. इरोम ने अगले दिन से इस क़ानून के ख़िलाफ़ अनशन शुरू कर दिया. यह अनशन अन्ना हज़ारे का अनशन नहीं था. उन्होंने 16 साल तक एक अनसुना अनशन किया. कोर्ट के आदेश पर उन्हें आत्महत्या की कोशिश के आरोप में पुलिस हिरासत में रखकर नाक में नली डालकर तरल भोजन दिया जाता रहा. वे अनशन करती रहीं और हारती रहीं.

दिल्ली की एक अदालत में इरोम ने पिछले साल आंख में आंसू भरकर कहा था, ‘मैं ज़िंदा रहना चाहती हूं. मैं जीना चाहती हूं. शादी करना चाहती हूं, प्रेम करना चाहती हूं, लेकिन उससे पहले यह चाहती हूं कि हमारे प्रदेश से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हटा लिया जाए.’ वे 16 साल तक इस एक इच्छा के लिए लड़ती और हारती रहीं.

अंतत: इरोम ने तय किया कि वे चुनावी रास्ते से विधायिका में जाएंगी और इस क़ानून के ख़िलाफ़ लड़ेंगी. वे इस बार मणिपुर के मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ीं और 90 वोट पाकर हार गईं. जिस प्रदेश की जनता के जीने के अधिकार के लिए वे 16 वर्षों तक लड़ती रहीं, उस जनता ने उनके सियासी सपने को बेरहमी से मार दिया. इरोम ने आंखों में एक सपना लेकर चुनावी अखाड़े में प्रवेश किया था और आंखों में आंसुओं का सैलाब लेकर उस अखाड़े से बाहर निकल गईं, साथ में यह कहती गईं, ‘अब इधर कभी नहीं आना है.’ उन्होंने सियासी जीवन जिए बिना उससे संन्यास की घोषणा कर दी.

Imphal: Irom Sharmila coming out of JNIMS Security ward after her release in Imphal on Wednesday following a court order. PTI Photo (PTI8_20_2014_000230B)

(फोटो: पीटीआई)

अफ्स्पा को लेकर 16 वर्षों तक अनशन करने वाली इरोम शर्मिला वैसे ही हार गई हैं, जैसे मणिपुर में मनोरमा हार गई थी, जैसे मनोरमा कांड में न्याय पाने के लिए नग्न होकर प्रदर्शन करने वाली महिलाएं हार गई थीं, जैसे बस्तर में मड़कम हिड़मे और सुखमती हार गई. इस हार के बदले आज इरोम ने फेसबुक पर लिखा, थैंक्स फॉर 90 वोट्स.

इरोम 16 साल से लड़ रही हैं और बार-बार हार रही हैं. वे कह रही थीं कि सेना को वह अधिकार न दिया जाए, जिसके तहत वह किसी को शक के आधार पर गोली मार देने का अधिकार रखती है.

वे चाहती हैं कि सेना को इतना अधिकार न हो कि वह किसी मनोरमा का बलात्कार कर दे या चौराहे पर खड़े किन्हीं युवाओं को बिना कारण गोलियां बरसा कर भून दे, या किसी 12 साल के बच्चे को पेशेवर आतंकी घोषित करके उसकी मां के सामने उसका ‘एनकाउंटर’ कर दे.

जिस तरह चुनाव में नोटबंदी में मरे क़रीब 150 लोग कोई मुद्दा नहीं थे, जिस तरह उत्तर प्रदेश में कुपोषित आधी महिलाएं कोई मुद्दा नहीं थीं, जिस तरह डायरिया या इनसेफलाइटिस से मरने वाले लाखों बच्चे कोई मुद्दा नहीं होते, उसी तरह इरोम का 16 साल तक संघर्ष करके अपना जीवन दे देना कोई मुद्दा नहीं रहा.

जिस लोकतंत्र में अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी पत्नी की हत्या के केस में जेल में बंद रहकर चुनाव जीत जाते हों, माफ़िया मुख़्तार अंसारी जेल में रहकर चुनाव जीत जाते हों, बाहुबली सुशील कुमार, रघुराज प्रताप सिंह और विजय मिश्र आदि चुनाव जीत जाते हों, वहां पर हत्याओं के विरोध में ज़िंदगी खपा देने वाली इरोम की हार तो जैसे पहले से ही तय थी. तमाम बाहुबलियों को भारी बहुमत से जिता देने वाली जनता ने आंसुओं से गीली आंखों वाला, नाक में नली डाले एक कवयित्री का चेहरा पसंद नहीं किया.

इरोम ने 16 साल बाद अपना अनशन तोड़ा था और चुनावी राजनीति में उतरकर बदलाव लाने का फ़ैसला किया था. उन्होंने ‘पीपुल्स रिइंसर्जेंस एंड जस्टिस अलाएंस’ नाम की पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा, लेकिन मणिपुर के मतदाताओं ने इरोम को नोटा का विकल्प समझना भी मुनासिब नहीं समझा. उन्हें मात्र 90 वोट मिले. चुनाव परिणाम आने के बाद इरोम रोईं और राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर डाली.

रविवार को इरोम ने अपने फेसबुक पेज पर चार शब्द का स्टेटस लिखा, ‘Thanks for 90 Votes.’

Irom sharmila

इरोम शर्मिला का फेसबुक स्टेटस

इरोम के स्टेटस पर तमाम लोगों ने हमदर्दी भरे कमेंट किए हैं. गनीमत है कि उन्हें ट्रोल नहीं किया गया. शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने फ़ेसबुक पेज पर यह स्टेटस शेयर करते हुए लिखा, ‘इरोम शर्मिला का ये स्टेटस पढ़ रहा हूं और रोयां-रोयां कांप रहा है. कितनी हिम्मत जुटाई होगी उन उंगलियों ने Thanks for 90 Votes टाइप करने के लिए! मणिपुर के लोगों के लिए 16 साल का अनशन और तोहफे में 90 वोट! वाह रे लोकतंत्र!’

अदिति ने अपनी वॉल पर लिखा, ‘इरोम ने जनता को धन्यवाद नहीं दिया है, चार शब्दों में लोकतंत्र का शोकगीत लिखा है.’

रवि जोशी ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला को सिर्फ़ 90 वोट मिलना ये दिखाता है कि भारत के लोगों को राजनीति में अच्छे लोगों की कोई ज़रूरत नहीं है, उसे गुंडे, बलात्कारी ही अच्छे लगते है या नोट और शराब बाटने वाले!’

अंशू राजपूत ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला की हार से काफी लोग सदमे में हैं. इरोम को शायद 90 वोट मिले हैं. दरअसल, चुनाव का अपना डायनामिक्स होता है. जनता अपने तरीके से सोचती है. इरोम शर्मिला को छोड़िए… जिस शख्स ने 1950 में देश को इतना शानदार संविधान दिया, उस आंबेडकर को 1951-52 के लोकसभा चुनाव में बॉम्बे की जनता ने हरा दिया. आंबेडकर चौथे नंबर पर आए. और तो और, 1954 में वो भंडारा का उपचुनाव भी नहीं जीत सके. जिस राम मनोहर लोहिया के राजनीतिक दर्शन पर यूपी और बिहार में सरकारें बनती हैं उन लोहिया जी को यूपी में चंदौली के लोगों ने हरा दिया. लोहिया नेहरू जी के खिलाफ भी चुनाव हारे. आचार्य नरेंद्र देव, मोरारजी देसाई, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी- ये सबके सब हार चुके हैं. अगर इरोम शर्मिला में राजनीतिक क्षमता और योग्यता होगी तो उन्हें सियासी ताकत बनने से कोई नहीं रोक सकता है.’

एके मिश्रा ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला का 90 वोट पाना और राजा भैया का 1,30,000 वोट पाना ही लोकतंत्र है. सलाम जनादेश!’ बाबूराम यादव का कहना था, ‘बेहद दुखद. इरोम शर्मिला के हिस्से 90 वोट, किस जनता के लिए आपने 16 साल अनशन किया?’

Irom Sharmila

(फोटो साभार: बाबूराम यादव की फेसबुक वॉल से)

तरुण शेखर ने लिखा, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला को नोटा के 166 वोट से भी कम 90 वोट मिले. अच्छे काम की इससे बड़ी किरकिरी क्या होगी! मणिपुर में 16 साल से आंदोलन कर रही ईरोम ने 2016 में अनशन तोड़ा था. 16 साल तक अफ्स्पा हटाने के खिलाफ इरोम सत्याग्रह के रास्ते पर चली थीं, 44 साल की आयरन लेडी इरोम पिछले 16 साल से नेजल ट्यूब के साथ अनशन पर थीं. सत्याग्रह करने वाली शर्मिला के शरीर में अन्न जल पहुंचाने का यही अकेला तरीका था.’

गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला चुनाव हार गई, सोनी सोरी चुनाव हार गई, दयामनी बारला चुनाव हार गईं, मेधा पाटकर चुनाव हार गईं. खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते. तो उस फ़कीर ने कहा कि तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है, पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिए इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है. धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं. उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं.’

चुनाव हारने के बाद इरोम ने बयान दिया, ‘मैं इस राजनीतिक प्रणाली से आजिज आ चुकी हूं. मैंने सक्रिय राजनीति छोड़ने का फैसला लिया है. मैं दक्षिण भारत चली जाउंगी क्योंकि मुझे मानसिक शांति चाहिए. लेकिन मैं आफस्पा के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखूंगी, जबतक वह हटा ना लिया जाए, लेकिन मैं सामाजिक कार्यकर्ता की भांति लड़ती रहूंगी.’

यानी इरोम फिर उसी अनशन की अंधी गली में लौट जाएगी, जिसमें घुप्प अंधेरा है, डरावना सन्नाटा है और इरोम अकेली है.

छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया

छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया ॥
समाज के घणे ताने सुणे पर ना पाछै कदम हटाया ॥
महिला नै समाज मैं पूरे मिलने चाहिए अधिका
पूरा जीवन लगा दिया किया जन जन मैं प्रचार
बारा साल मैं ब्याह होग्या फेर भी अपना फर्ज निभाया ॥
छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया ॥
लिंग भेद का विरोध करया पति नै पूरा साथ दिया था
जाति भेद के खिलाफ उणनै यो खुल्ला ऐलान किया था
बाल हत्या प्रतिबन्धक गृह यो सुरक्षा सेंटर बनाया ॥
छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया ॥
महिलाओं को पढ़ाने जब सावित्री स्कूल मैं जाया करती
जनता गोबर फ़ैंकती बहोतै क्रोध या जताया करती
स्कूल जा साड़ी रोज बदली महिलाओं को जरूर पढ़ाया ॥
छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया ॥
दत्तक पुत्र डॉक्टर बणग्या पुणे मैं अस्पताल चलाया
सावित्री बाई मरीज सेवा मैं अपना काफी बख्त लगाया
समाज सुधार मैं रणबीर अपना पूरा जीवन बिताया ॥
छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया ॥
ranbir dahiya




‘चमार रैप,’ ये किस बदलाव की आहट है?

कभी पहचान छुपाने वाली दलित जातियों में उसपर गर्व करने की पहल ज़ोर पकड़ रही है और धीरे-धीरे हुई शुरुआत ने समाज को साथ लेना शुरू कर दिया है.

जालंधर पंजाब के सबसे अधिक दलित आबादी वाले जिलों में से एक है और यहां बड़ी तादाद में मौजूद चमड़े का काम करने वाली जाति को – जिन्हें दलितों में गिना जाता है; अब अपनी जात बताने में शर्म नहीं.

जाति से जुड़े संगठनों ने अपने बैनर्स पर सबसे ऊपर लिखना शुरू कर दिया है ‘गर्व से अपनी जाति के बारे में कहो.’

धीरे-धीरे एक पूरी पीढ़ी इस बात पर गर्व महसूस करने लगी और जो नाम एक अपमान के तौर पर उनकी तरफ उछाला जाता था, उसकी बाज़ी उन्होंने पलट दी.

हालात ये हैं कि अब बात होती है ‘चमार रैप’ की.

और, दलित परिवार में जन्मी 18 साल की गुरकंवल भारती – जो यूट्यूब और फ़ेसबुक पर गिन्नी माही के नाम से अधिक मशहूर हैं, आज चमार रैप क्वीन मानी जाती है.

हुंदे असले तो बध डेंजर चमार (हथियारों से अधिक खतरनाक हैं चमार), गिन्नी का ऐसा वीडियो है जिसे यूट्यूब के अलग-अलग चैनल्स पर लाखों की तादाद में हिट्स मिले हैं.

रविदास समुदाय के परिवार से संबंधित गिन्नी का कहना है कि उसे अगर एक दमदार आवाज़ मिली है तो वह अपनी आवाज़ से ही लोगों को सामाजिक पिछड़ेपन से बाहर निकालने के लिए प्रयास करती रहेगी.

Image copyright g kumar

एक हज़ार से अधिक स्टेज शो और गायन कार्यक्रमों में हिस्सा ले चुकीं गिन्नी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि 11 साल की उम्र से गायन शुरू कर आज वह 22 से अधिक गीत रिकॉर्ड करवा चुकी है और उनके वीडियो भी बने हैं. वह अपने हर गीत में एक संदेश देना चाहती है और अब तक अपने लक्ष्य में सफल भी रही है.

गिन्नी ने बताया कि स्कूल और कॉलेज में भी उसे काफी सहयोग मिलता है. स्कूल और कॉलेज में टीचर्स उसे गायन में प्रोत्साहित करते हैं. सहपाठियों से भी प्रोत्साहन मिलता है. डेंजर चमार का आइडिया भी उसे एक स्टूडेंट से ही मिला था जो कि आज उसका सबसे हिट म्यूजिक वीडियो बन चुका है.

आसपास और गायन कार्यक्रमों में गायन करने के बाद अब गिन्नी को पंजाबी फिल्मों से भी ऑफ़र आने लगे हैं और जल्द ही वह पंजाबी फिल्मों में प्ले बैक सिंगिंग भी करती दिखेंगी. अभी तक अपने स्तर पर ही संगीत सीखने वाली गिन्नी अब संगीत की शिक्षा भी लेना चाहती है ताकि गायिकी में और सुधार ला सके.

गिन्नी के पिता राकेश माही का कहना है कि गिन्नी को मिली सफ़लता ने उनकी समुदाय के अन्य बच्चों को भी प्रेरित किया है और वे भी अब गायन में आना चाहते हैं. उनके आसपास के परिवारों में गिन्नी की सफलता के चर्चे हैं और बच्चे भी गिन्नी से लगातार उनके नए गीतों के बारे में पूछते रहते हैं.

समुदाय के कार्यक्रमों में भी गिन्नी को विशेष सम्मान मिल रहा है और गिन्नी को भी छोटी उम्र से ही ये सब अच्छा लगता है. हालांकि वह अभी भी अपनी पढ़ाई को प्राथमिकता देती है.

Image copyright AFP

सिर्फ 18 साल की उम्र में गिन्नी राजनीतिक और सामाजिक तौर पर भी काफी जागरूक है और वह अच्छी तरह से जानती है कि बाबासाहब भीमराव अंबेडकर ने संविधान लिखा और संविधान में दलितों को आरक्षण देकर उनका सामाजिक उत्थान किया.

वह अपने गीतों में भी अपने आप को बाबा साहब की बेटी ही क़रार देती है. प्लस टू में 77 प्रतिशत अंक लेकर अब गिन्नी कॉलेज में पढ़ाई कर रही है और वह पंजाब और पूरे देश में दलितों के उत्थान के लिए काम करने के साथ ही बॉलीवुड में प्ले बैक सिंगर भी बनना चाहती है.

गर्व से कहो हम चमार हैं, पुत्त चमारा दें, की सोच को पूरे समाज तक पहुंचाने के लिए इस समुदाय के गायकों की एक पूरी पीढ़ी सक्रिय है जो कि चर्चे चमारा दें, डेंजर चमार आदि गीतों से अपने समाज को अपने पर गर्व करने के लिए प्रेरित कर रही है.

पंजाब में जिस तरह से ये जाति अपने आप को अपनी पहचान और गुरु रविदास और बाबा साहब पर गर्व करने के लिए प्रेरित कर रही है, उतना कोई नहीं कर पा रहा.

और, ये एक नए तरह का बदलाव है जो कि अब रफ़्तार पकड़ रही है. bbc

बहुजन नायक मान्यवर श्री कांशीराम जी का सफर नामा

बहुजन नायक मान्यवर श्री कांशीराम जी का सफर नामा :
जीवन परिचय :-
जन्म- 15 मार्च, 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के ख्वासपुर गांव में दलित (सिख समुदाय के रैदसिया) परिवार में हुआ.
माता-पिता – बिशन कौर और हरी सिंह
शिक्षा- स्नातक (रोपड़ राजकीय कालेज, पंजाब विश्वविद्यालय)
नौकरी- डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ)
सामाजिक प्रेरणा स्रोत:-
नौकरी के दौरान जातिगत भेदभाव से आहत होकर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और पेरियार के दर्शन को गहनता से पढ़कर दलितों को एकजुट करने में जुटे.
पंजाब के एक चर्चित विधायक की बेटी का रिश्ता आया लेकिन दलित आंदोलन के हित में उसे ठुकरा दिया.
– बुद्धिस्ट रिसर्च सेंटर की स्थापना की.
– कांशीराम जी की पहली ऐतिहासिक किताब ‘द चमचा ऐज’ (अंग्रेजी) 24 सितंबर 1982 को प्रकाशित हुआ.
-पे बैक टू सोसाइटी के सिद्धांत के तहत दलित कर्मचारियों को अपने वेतन का 10वां हिस्सा समाज को लौटाने का आह्वान किया.
राजनितिक व सामाजिक सफरनामे की सुरुआत:-
-सबसे पहले बाबा साहेब द्वारा स्थापित पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के सक्रिए सदस्य बनें.
-1971 में पूना में आरपीआई और कांग्रेस के बीच गैरबराबरी के समझौते और नेताओं के आपसी कलह से आहत होकर पार्टी से इस्तीफा.
-बामसेफ -1964 में 6 दिसंबर 1978 को ‘बामसेफ’ का विधिवत गठन किया. कांशीराम का मानना था कि आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी नौकरी में पहुंचा वर्ग ही शोषितों का थिंक, इंटलैक्चुअल और कैपिटल बैंक यही कर्मचारी तबका है. दलितों की राजनीतिक ताकत तैयार करने में बामसेफ काफी मददगार साबित हुआ.
राजनितिक मुहीम की सुरुआत:-
दलितों को एकजुट करने और राजनीतिक ताकत बनाने का अभियान 1970 के दशक में शुरू किया.
दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) – दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय को जोड़ने के लिए उन्होंने डीएस-4 का गठन किया. इसकी स्थापना 6 दिसंबर 1981 को की गई. डीएस-4 के जरिए सामाजिक, आर्थिक बराबरी का आंदोलन आम झुग्गी-झोपड़ी तक पहुंचाने में काफी मदद मिली. इसको सुचारु रूप से चलाने के लिए महिला और छात्र विंग में भी बांटा गया. जाति के आधार पर उत्पीड़न, गैर-बराबरी जैसे समाजिक मुद्दों पर लोगों के बीच जागरूकता और बुराइयों के खिलाफ आंदोलन करना डीएस-4 के एजेंडे में रहे. डीएस-4 के जरिए ही देश भर में साइकिल रैली निकाली गई.
भारत की तीसरे नम्बर की पार्टी का सफरनामा:-
बहुजन समाज पार्टी (बसपा)- 14 अप्रैल, 1984 को बसपा का गठन. सत्ता हासिल करने के लिए बनाया गया राजनीतिक संगठन.
– 1991 में पहली बार यूपी के इटावा से 11 लोकसभा का चुनाव जीते.
– 1996 में दूसरी बार लोकसभा का चुनाव पंजाब के होशियारपुर से जीते.
– 2001 में सार्वजनिक तौर पर घोषणा कर कुमारी मायावती को उत्तराधिकारी बनाया.
महापरिनिर्वान:-
-2003 में लकवाग्रस्त होने के बाद सक्रिय राजनीति से दूर चले गए.
– 9 अक्टूबर, 2006 को हार्टअटैक, दिल्ली में अंतिम सांस ली.
साहित्यक योगदान:-
कांशीराम ने निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाएं शुरू की—-
अनटचेबल इंडिया (अंग्रेजी)
बामसेफ बुलेटिन (अंग्रेजी)
आप्रेस्ड इंडियन (अंग्रेजी)
बहुजन संगठनक (हिन्दी)
बहुजन नायक (मराठी एवं बंग्ला)
श्रमिक साहित्य
शोषित साहित्य
दलित आर्थिक उत्थान
इकोनोमिक अपसर्ज (अंग्रेजी)
बहुजन टाइम्स दैनिक
बहुजन एकता
सम्पूर्ण योगदान एक नजर में:-
कांशीराम जी पहले ऐसे व्यक्ति थे जिसने शोषित समाज की निष्क्रिय रही राजनितिक चेतना को जागृत किया था. बाबा साहब ने संविधान के माध्यम से शोषित समाज के लिए विकास के लिए बंद दरवाजे खोल दिए थे, लेकिन इस विकास रूपी दरवाजे के पार पहुचाने का कार्य मान्यवर ‘कांशीराम’ जी ने किया था. बाबा साहब ने दलितों को मनोबल प्राप्त करने का आह्वान किया, कांशीराम जी ने समाज को ‘मनोबल’ प्राप्त करने के लिए मजबूर किया. कांशीराम जी उन महान पुरषों में से है जिन्होंने व्यक्तिगत ‘स्वार्थ’ की जगह समाज के लिए कार्य किया, अपनी माँ को लिखी चिठ्ठी में ‘मान्यवर कांशीराम’ जी ने ‘शोषित समाज’ को ही अपना परिवार बताया. वर्तमान में समाज को ‘कांशीराम’ जी जैसे महापुरषो की अत्यंत आवश्यकता है.

Haryana ka Jadu Song by Sombir Jasrana

On Special Request:  Haryana ka Jadu Song by Sombir Jasrana and AK Hooda Rurkee

 

बौद्ध धम्म की जन्म तिथि :अषाढी पूर्णिमा

आज हैं – बौद्ध धम्म की जन्म तिथि :अषाढी पूर्णिमा
————————————
गौतमबुद्ध के द्वारा प्रथम धम्म उपदेश- धम्मचक्र प्रवर्तन दिन के अवसर पर आप सब को हार्दिक बधाई, मंगल कामना ।
🌹 🌹 🌹

बोधिसत्व सिद्धार्थ गौतम छः साल की साधना के बाद वैशाखी पूर्णिमा की रात को सम्यक संबोधि प्राप्त करके बुद्ध हुए ।बोधि वृक्ष के नीचे बुद्धत्व प्राप्त करने के पश्चात गौतमबुद्ध ने सोचा, जो ज्ञान मैंने पाया हैं, जिस दिव्य घटना का मैंने अनुभव किया हैं, वह इतने सूक्ष्म हैं कि शब्दों में उसको कहना कठिन हैं । उन्होंने सोचा कि जो मैंने पाया हैं, वह इतना सूक्ष्म हैं कि शब्दों में उसका बयान नहीं किया जा सकता, सिखाया नहीं जा सकता ।अतः मैं खामोश रहूँगा ।चुप रहूँगा । मैंने जो पाया हैं, वह स्वअनुभव से समझा जा सकता हैं और पाया जा सकता हैं ।अतः मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा ।

बाद में बुद्ध ने अपने ज्ञान को बांट ने का विचार किया ।
पहले आलार कालाम को ज्ञान देने का सोचा । बुद्ध ने अपने दिव्य चक्षु से देखा की आलार कालाम एक सप्ताह पहले मृत्यु प्राप्त कर चुके हैं ।
फिर सोचा कि मैं उद्दक रामपुत्त को ज्ञान बांटु । बुद्ध ने दिव्य ज्ञान से देखा कि उद्दक रामपुत्त अगली रात्रि को मृत्यु पाये हैं ।
फिर बुद्ध के मन में आया कि मेरे पहले पाँच साथी मुझे छोड़कर गये हैं उन्हें ज्ञान देना चाहिए क्योंकि उन्होंने मेरी खुब सेवा की हैं । बुद्ध ने जाना की पाँच साथी अभी वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाय में साधना कर रहे हैं । वे पाँच साथी ज्ञान के अधिकारी हैं ।

बुद्ध बोधगया से वाराणसी के तरफ चल पडे । 11 दिन की सफर के बाद बुद्ध अषाढी पूर्णिमा के दिन वाराणसी मृगदाय में पहुंचे ।

उसी दिन बुद्ध ने पंचवर्गिय परिव्राजक को प्रथम धम्म उपदेश दिया ।

जिसे इतिहास में धम्मचक्कप्पवत्तन के नाम से जाना जाता हैं ।

🌳धम्मचक्कप्पवत्तनसुत्त बौद्ध धम्म का सार तत्व हैं ।
🌳 इसी धम्मचक्कप्पवत्तनसुत्त को ही मज्झिमा पटिपदा और आर्य अष्टांगिक मार्ग तथा चार आर्य सत्य भी कहा जाता हैं ।

🔔बुद्ध ने कहा –

भिक्खुओ ! दो अतियों को छोड दो ।
दो अतियों का सेवन करना अनर्थ हैं, अज्ञानता हैं ।
🌿जैसे काम सुख में आसक्त हो लिप्त होना ।
🌿दूसरा, शरीर को अति पीड़ा देना, अति कष्ट देना ।
इन दो अतियों को छोड मैंने मध्यम मार्ग खोजा हैं जो आंख देने वाला हैं, सुख देने वाला हैं , शान्ति देने वाला हैं, ज्ञान देने वाला हैं, आनंद देने वाला हैं ।
मध्यम मार्ग ही आर्य अष्टांगिक मार्ग हैं –

🔔सम्यक दृष्टि,
🔔 सम्यक संकल्प,
🔔 सम्यक वचन,
🔔 सम्यक कर्म,
🔔 सम्यक आजीविका,
🔔सम्यक व्यायाम,
🔔सम्यक स्मृति,
🔔 सम्यक समाधि ।
💐 💐 💐

बुद्ध ने उन्हें चार आर्य सत्य का ज्ञान दिया ।

उन्होंने बताया कि-
दु:ख हैं,
दु:ख का कारण हैं,
दुःख का निरोध हैं और
दु:ख निरोध का मार्ग हैं ।

बुद्ध ने आज अषाढी पूर्णिमा के दिन धम्म चक्क गतिमान किया और आदि कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी और अंत में भी कल्याणकारी धम्म सर्वे प्राणीओं के हित के लिए, मंगल के लिए, सुख के लिए, निर्वाण के लिए प्रकाशित किया ।

आज के युग में भी बुद्ध का धम्म कल्याणकारी हैं, सिर्फ धम्म के मार्ग पर हमें चलना हैं ।
🍀बुद्ध का धम्म हमारे में विकसित हो और हम दु:ख के छुटकारा पाये यही मंगल कामना के साथ धम्मचक्कप्पवत्तन दिन की मंगल कामना -बधाई ।🍀
💐नमो बुद्धाय 💐
💐नमो धम्माय 💐
💐नमो संघाय 💐
🎄🎄सुप्रभात 🎄🎄

गुजरात के दलितों का मुद्दा संसद में गूँजा

गुजरात में दलितों की पिटाई के बाद वहां दलित समुदाय में भारी गुस्सा है और बुधवार को बुलाए गए गुजरात बंद के दौरान कुछ जगहों पर हिंसा की घटनाएँ हुई हैं.

ये मुद्दा संसद में भी गूंजा है. राज्यसभा में बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के सांसदों ने इस मुद्दे पर तत्काल बहस की मांग की है. राज्यसभा को कुछ देर के लिए स्थगित भी करना पड़ा है.

बसपा प्रमुख मायावती ने संसद के बाहर कहा, ”दलितों से जुड़ा कोई भी मामला जब बसपा उठाती है, तो आपस में मिले हुए कांग्रेस, भाजपा उस पर राजनीति करने लगते हैं.”

दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत ने संसद के बाहर कहा कि गुजरात सरकार ने मामला सामने आने के बाद तत्काल कड़ी कार्रवाई की है लेकिन विपक्ष न दो संसद में व्यवस्थित ढंग अपनी बात रखना चाहता है और ही सरकार की बात सुनना चाहता है.

उधर गुजरात से पत्रकार प्रशांत दयाल ने बताया है कि सौराष्ट्र में अमरोली, भावनगर, जूनागढ़ और राजकोट ज़िलों में बंद के दौरान बसों पर पथराव हो रहा है स्कूल कॉलेज बंद हैं.

Image 

जूनागढ़ और अहमदाबाद में भी स्कूल कॉलेज बंद कराए गए हैं क्योंकि सरकारी बसों और दफ़्तरों को निशाना बनाया जा रहा है.

ये मुद्दा तब शुरू हुआ जब ग्यारह जुलाई को वेरावल ज़िले के ऊना में कथित गो रक्षकों ने जानवर की खाल उतार रहे चार दलितों की बेरहमी से पिटाई की थी.

इस घटना का वीडियो वायरल हो गया था.

इसके बाद भड़के प्रदर्शनों में पथराव हुए थे जिनमें एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई. विरोध प्रदर्शनों के दौरान 16 दलितों ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी.

इनमें से एक युवक की मौत हो गई है. हालांकि प्रशासन का कहना है कि मृत व्यक्ति ने व्यक्तिगत कारणों से ज़हर खाया था. लेकिन दलित संगठन प्रशासन के दावों को नकार रहे हैं.

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल Image 

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल इस मामले में जांच के आदेश दे चुकी हैं. वो पीटे गए दलित युवकों से मिलने ऊना पहुंच गई हैं.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी 21 जुलाई को और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल का 22 जुलाई को इन पीड़ितों से मिलने का कार्यक्रम है.

अमरेली में मंगलवार को दलितों के प्रदर्शन में हुई पत्थरबाज़ी में एसपी रैंक के एक अधिकारी समेत छह पुलिसकर्मी घायल हुए थे.

गुजरात में आंदोलन करते दलित.Image 

मुख्यमंत्री ने मंगलवार को एक ट्वीट कर बताया था कि ऊना की घटना के संबंध में अब तक 16 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है.

इन लोगों पर अपहरण, लोगों को बंधक बनाने और एसएसी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है.

 

scouce

गुजरात: दलितों के प्रदर्शनों, आगज़नी के बाद तनाव

गुजरात के वेरावल में दलितों की पिटाई का वीडियो वायरल होने और दलितों के उग्र प्रदर्शनों के बाद सौराष्ट्र में स्थिति तनावपूर्ण है. वहां वेरावल, राजकोट, सुरेंद्र नगर और गोंडल बुरी तरह प्रभावित हैं.

पुलिस के अनुसार वेरावल में कथित शिवसेना कार्यकर्ताओं ने पिछले हफ़्ते कुछ दलितों को तब पीटा था जब वो जानवर की खाल उतार रहे थे. हालांकि बाद में गुजरात में शिवसेना ने अपने कार्यकर्ताओं के इस मामले से जुड़े बने से इनकार किया है.

सोमवार को दलितों ने उग्र प्रदर्शन किए थे और पुलिस के अनुसार सात लोगों ने आत्महत्या की कोशिश की थी. इसके बाद मुख्यमंत्री आनंदीबेन ने जांच के आदेश दिए थे और चार पुलिस कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया था.

 

Image copyrightANKUR JAIN

स्थानीय पत्रकार प्रशांत दयाल के अनुसार, जिन दलितों ने आत्महत्या की कोशिश की थी, उनमें से दो की हालत गंभीर है.

उनके मुताबिक़ सोमवार की रात गोंडल, धोराजी और जूनागढ़ हाइवे पर सरकारी बसों को आग लगा दी गई और राजमार्ग जाम कर दिया गया. अब वहाँ बड़ी संख्या में पुुलिस मौजूद है.

गोंडल के डिप्टी एसपी एसएस रघुवंशी ने बीबीसी को बताया कि प्रदर्शनों में हिंसा पर उतर आई भीड़ पर काबू करने के लिए स्टेट रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स तैनात कर दी गई है और स्थिति नियंत्रण में है.

प्रशांत दयाल के अनुसार दलित समुदाय के लोगों ने पूरे मामले पर अपना विरोध जताने के लिए सौराष्ट्र के सुरेंद्र नगर और गोंडल में सरकारी दफ़्तरों पर मरे हुए जानवर गिरा दिए हैं.

Image copyrightPRASHANT DAYAL

राज्य के कई दलित संगठनों ने 20 जुलाई को गुजरात बंद का ऐलान भी किया है.

गुजरात में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने दलितों के इस आंदोलन को समर्थन दिया है. इसके बाद क्षेत्र में सियासी सरगर्मी भी बढ़ गई है.

पूरे मामले की जाँच अब गुजरात पुलिस की सीआईडी शाखा करेगी. पीड़ित दलित युवकों को चार-चार लाख रुपए का मुआवज़ा देेने की घोषणा हुई है.

मामले की तेज़ सुनवाई के लिए एक विशेष अदालत बनाने की घोषणा की गई है.

 

source

DASFI द्वारा एक विशाल विरोध प्रदर्शन

जिस तरह से गुजरात में हुआ वो बहुत ही निंदनीय घटना है।वैसे तो इस तरह की घटनाये पूरे देश में होती है।लेकिन जिस तरह से गुजरात के भीम सैनिकों ने इसका विरोध किया उनके जज्बे को सलाम।आज देश का पूरा दलित वर्ग आपके साथ है।कल कुरुक्षेत्र में भी इसके विरोध में DASFI व् अन्य अम्बेडकरवादी संगठनो द्वारा एक विशाल विरोध प्रदर्शन किया जायेगा।पूरे देश में DASFI इसके विरोध में प्रदर्शन करेगा।

रविन्द्र ढांडा,
DASFI