छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया

छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया ॥
समाज के घणे ताने सुणे पर ना पाछै कदम हटाया ॥
महिला नै समाज मैं पूरे मिलने चाहिए अधिका
पूरा जीवन लगा दिया किया जन जन मैं प्रचार
बारा साल मैं ब्याह होग्या फेर भी अपना फर्ज निभाया ॥
छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया ॥
लिंग भेद का विरोध करया पति नै पूरा साथ दिया था
जाति भेद के खिलाफ उणनै यो खुल्ला ऐलान किया था
बाल हत्या प्रतिबन्धक गृह यो सुरक्षा सेंटर बनाया ॥
छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया ॥
महिलाओं को पढ़ाने जब सावित्री स्कूल मैं जाया करती
जनता गोबर फ़ैंकती बहोतै क्रोध या जताया करती
स्कूल जा साड़ी रोज बदली महिलाओं को जरूर पढ़ाया ॥
छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया ॥
दत्तक पुत्र डॉक्टर बणग्या पुणे मैं अस्पताल चलाया
सावित्री बाई मरीज सेवा मैं अपना काफी बख्त लगाया
समाज सुधार मैं रणबीर अपना पूरा जीवन बिताया ॥
छोरियां का सबतैं पहला सावित्रीबाई नै स्कूल चलाया ॥
ranbir dahiya




गुजरात: दलितों के प्रदर्शनों, आगज़नी के बाद तनाव

गुजरात के वेरावल में दलितों की पिटाई का वीडियो वायरल होने और दलितों के उग्र प्रदर्शनों के बाद सौराष्ट्र में स्थिति तनावपूर्ण है. वहां वेरावल, राजकोट, सुरेंद्र नगर और गोंडल बुरी तरह प्रभावित हैं.

पुलिस के अनुसार वेरावल में कथित शिवसेना कार्यकर्ताओं ने पिछले हफ़्ते कुछ दलितों को तब पीटा था जब वो जानवर की खाल उतार रहे थे. हालांकि बाद में गुजरात में शिवसेना ने अपने कार्यकर्ताओं के इस मामले से जुड़े बने से इनकार किया है.

सोमवार को दलितों ने उग्र प्रदर्शन किए थे और पुलिस के अनुसार सात लोगों ने आत्महत्या की कोशिश की थी. इसके बाद मुख्यमंत्री आनंदीबेन ने जांच के आदेश दिए थे और चार पुलिस कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया था.

 

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स्थानीय पत्रकार प्रशांत दयाल के अनुसार, जिन दलितों ने आत्महत्या की कोशिश की थी, उनमें से दो की हालत गंभीर है.

उनके मुताबिक़ सोमवार की रात गोंडल, धोराजी और जूनागढ़ हाइवे पर सरकारी बसों को आग लगा दी गई और राजमार्ग जाम कर दिया गया. अब वहाँ बड़ी संख्या में पुुलिस मौजूद है.

गोंडल के डिप्टी एसपी एसएस रघुवंशी ने बीबीसी को बताया कि प्रदर्शनों में हिंसा पर उतर आई भीड़ पर काबू करने के लिए स्टेट रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स तैनात कर दी गई है और स्थिति नियंत्रण में है.

प्रशांत दयाल के अनुसार दलित समुदाय के लोगों ने पूरे मामले पर अपना विरोध जताने के लिए सौराष्ट्र के सुरेंद्र नगर और गोंडल में सरकारी दफ़्तरों पर मरे हुए जानवर गिरा दिए हैं.

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राज्य के कई दलित संगठनों ने 20 जुलाई को गुजरात बंद का ऐलान भी किया है.

गुजरात में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने दलितों के इस आंदोलन को समर्थन दिया है. इसके बाद क्षेत्र में सियासी सरगर्मी भी बढ़ गई है.

पूरे मामले की जाँच अब गुजरात पुलिस की सीआईडी शाखा करेगी. पीड़ित दलित युवकों को चार-चार लाख रुपए का मुआवज़ा देेने की घोषणा हुई है.

मामले की तेज़ सुनवाई के लिए एक विशेष अदालत बनाने की घोषणा की गई है.

 

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इन 10 बातों ने कांशीराम को दलित राजनीति का चेहरा बनाया

हम अक्सर उत्तर भारत में बदले हुई राजनीतिक परिदृश्य के लिए मंडल युग की बात करते हैं जिसके तहत पिछड़ा वर्ग अपने अधिकारों को लेकर पहली बार सचेत हुआ था.

यही वक्त दलितों के भी राजनीतिक रूप से चेतनशील होने का था हालांकि उन्हें हमेशा से भारत में आरक्षण मिला हुआ था.

दलित राजनीति के सक्रिय होने का श्रेय बिना किसी संदेह कांशीराम को जाता है.

कांशीराम के बारे में ऐसी 10 दस बातें जानें जिन्होंने उन्हें दलित राजनीति के उत्थान का चेहरा बनाया.

  1. बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के संस्थापक कांशीराम भले ही डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की तरह चिंतक और बुद्धिजीवी ना हों, लेकिन इस बारे में कई तर्क दिए जा सकते हैं कि कैसे अंबेडकर के बाद कांशीराम ही थे जिन्होंने भारतीय राजनीति और समाज में एक बड़ा परिवर्तन लाने वाले की भूमिका निभाई है. बेशक अंबेडकर ने एक शानदार संविधान के जरिए इस परिवर्तन का ब्लूप्रिंट पेश किया लेकिन ये कांशीराम ही थे जिन्होंने इसे राजनीति के धरातल पर उतारा है.
  2. कांशीराम का जन्म पंजाब के एक दलित परिवार में हुआ था. उन्होंने बीएससी की पढ़ाई करने के बाद क्लास वन अधिकारी की सरकारी नौकरी की. आज़ादी के बाद से ही आरक्षण होने के कारण सरकारी सेवा में दलित कर्मचारियों की संस्था होती थी. कांशीराम ने दलितों से जुड़े सवाल और अंबेडकर जयंती के दिन अवकाश घोषित करने की मांग उठाई.
  3. 1981 में उन्होंने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति या डीएस4 की स्थापना की. 1982 में उन्होंने ‘द चमचा एज’ लिखा जिसमें उन्होंने उन दलित नेताओं की आलोचना की जो कांग्रेस जैसी परंपरागत मुख्यधारा की पार्टी के लिए काम करते है. 1983 में डीएस4 ने एक साइकिल रैली का आयोजन कर अपनी ताकत दिखाई. इस रैली में तीन लाख लोगों ने हिस्सा लिया था.
  4. 1984 में उन्होंने बीएसपी की स्थापना की. तब तक कांशीराम पूरी तरह से एक पूर्णकालिक राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता बन गए थे. उन्होंने तब कहा था कि अंबेडकर किताबें इकट्ठा करते थे लेकिन मैं लोगों को इकट्ठा करता हूं. उन्होंने तब मौजूदा पार्टियों में दलितों की जगह की पड़ताल की और बाद में अपनी अलग पार्टी खड़ा करने की जरूरत महसूस की. वो एक चिंतक भी थे और ज़मीनी कार्यकर्ता भी.
  5. बहुत कम समय में बीएसपी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी एक अलग छाप छोड़ी. उत्तर भारत की राजनीति में गैर-ब्राह्मणवाद की शब्दावली बीएसपी ही प्रचलन में लाई हालांकि मंडल दौर की पार्टियां भी सवर्ण जातियों के वर्चस्व के ख़िलाफ़ थीं. दक्षिण भारत में यह पहले से ही शुरू हो चुका था. कांशीराम का मानना था कि अपने हक़ के लिए लड़ना होगा, उसके लिए गिड़गिड़ाने से बात नहीं बनेगी.
  6. कांशीराम मायावती के मार्गदर्शक थे. मायावती ने कांशीराम की राजनीति को आगे बढ़ाया और बसपा को राजनीति में एक ताकत के रूप में खड़ा किया. लेकिन मायावती कांशीराम की तरह कभी भी एक राजनीतिक चिंतक नहीं रहीं. कांशीराम 2006 में मृत्यु से क़रीब तीन साल पहले से ही ‘एक्टिव’ नहीं थे.
  7. कांशीराम की मृत्यु के एक दशक बाद एक बार फिर संभावना जताई जा रही है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में मायावती सत्ता हासिल करने की प्रमुख दावेदार हैं. अनेक जानकार मानते हैं कि बीएसपी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है. यदि ऐसा होता है तो इसीलिए कि कांशीराम की विरासत आज भी ज़िंदा है और बेहतर कर रही है.
  8. फिर भी इस बात को लेकर सवाल उठते हैं कि मायावती जिस तरह से ठाठ में रहती हैं उसे देखकर कांशीराम कितना खुश होते? जिस दौर में कांशीराम की विरासत मायावती के हाथों में आ रही थी उस दौर में मायावती पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे थे. हालांकि बीएसपी इन सभी आरोपों को निराधार बताती है.
  9. इस बात का जवाब हमें कभी नहीं मिल पाएगा कि अपनी बीमारी और मौत के कई साल पहले ही कांशीराम ने मायावती को ही अपनी राजनीति का प्रतिनिधि क्यों चुन लिया था. खैर इसने उत्तर प्रदेश में दलितों को तो मजबूत बनाया ही, साथ ही साथ दूसरे राज्यों में भी वोट शेयर में इजाफा किया.
  10. व्यक्तिगत रूप से कांशीराम एक सादा जीवन जीते थे. लेकिन इस बात को लेकर हमेशा बहस रही है कि धन-वैभव का प्रदर्शन भी दलित सशक्तिकरण का एक प्रतीक है.कांशीराम को 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में काफ़ी याद किया जाएगा.source

मन की बात में बोले पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को एक बार फिर अपने मन की बात रेडियो कार्यक्रम के जरिए अपने विचार साझा किए। यह ‘मन की बात’ का 18वां प्रसारण है। पेश है पीएम मोदी के मन की बात के मुख्‍य अंश…

– मन की बात में पीएम मोदी ने सभी को ईस्टर की शुभकामनाएं दी
– पीएम मोदी ने कहा, ‘भारत में क्रिकेट की तरह अब फुटबॉल, हॉकी, टेनिस और कबड्डी का एक मूड बनता जा रहा है।
– अगले वर्ष 2017 में भारत फीफा अंडर 17 विश्व कप की मेज़बानी करने जा रहा है।
– फीफा में हमारी रैंकिंग इतनी नीचे है कि मेरी बोलने की हिम्मत ही नहीं हो रही है।
– मेरा हर नौजवान FIFA2017 U-17 विश्व कप का ऐम्बैसडर बने।
– हम सब की कोशिश है कि फुटबाल को गांव.गांव, गली.गली तक पहुंचाया जाए।
– जो काम टूरिस्ट डिपार्टमेंट, कल्चर डिपार्टमेंट नहीं कर सकते, वो काम देश के करोड़ों प्रवासियों ने कर दिया।
– जब मुख्यमंत्री नहीं था, प्रधानमंत्री नहीं था और आप ही की तरह छोटी उम्र थी, मैंने बहुत भ्रमण किया, शायद हिन्दुस्तान का कोई जिला नहीं होगा, जहां मुझे जाने का अवसर न मिला हो।
– ज़िन्दगी को बनाने के लिए प्रवास की एक बहुत बड़ी ताक़त होती है और अब भारत के युवकों में, प्रवास में साहस जुड़ता चला जा रहा है।
– हमारा युवा साहसिक हो, जहां कभी पैर नहीं रखा है, वहां पैर रखने का उसका मन होना चाहिए।
– नागपुर के पास सावनेर में इको फ्रेंडली माइन टूरिज्‍म सर्किट का विकास करने के लिए कोल इंडिया को एक विशेष बधाई।
– आप भी एक टूरिस्ट होने के नाते टूरिस्ट डेस्टिनेशन पर स्वच्छता पर आप बल दे सकते हैं।
– आप अपनी छुट्टियों का समय अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए, अपने पास कोई एक नये हुनर के लिए, अपने कौशल-विकास के लिए अवश्य करें।
– महादेवी वर्मा ने पक्षियों के लिए लिखा था – तुझको दूर न जाने देंगे, दानों से आंगन भर देंगे और हौद में भर देंगे हम, मीठा-मीठा ठंडा पानी।
उन्होंने कहा है कि हमारे पास दूध बेचने वाले, अख़बार बेचने वाले, पोस्‍टमैन आते हैं। क्या कभी हमने उनको पानी के लिए पूछा है?
– बात छोटी होती है, लेकिन गर्मी के बीच अगर पोस्‍टमैन घर के पास आया और हमने पानी पिलाया, कितना अच्छा लगेगा उसको।
– कुछ लोगों को लगता है कि डिजिटल इंडिया शहरी नौजवानों की दुनिया है। जी नहीं, ‘किसान सुविधा ऐप’ आप सब की सेवा में प्रस्तुत है।
– ‘किसान सुविधा ऐप’ के माध्यम से कृषि सम्बन्धी, मौसम सम्बन्धी जानकारियां हथेली में ही मिल जाएंगी। इस ऐप को डाउनलोड करें।
– हमें भी सोचना होगा कि पानी के बिना क्या होगा? क्या हम पुरानी जगहों को फिर से खुदाई, सफ़ाई करके जल-संचय के लिये तैयार कर सकते हैं?
– बारिश में बूंद-बूंद पानी कैसे बचाएं। गांव का पानी गांव में रहे, ये अभियान कैसे चलाएं। आप योजना बनाइए, सरकार की योजनाओं से जुड़िए।
– कृषि क्षेत्र में टेक्‍नोलॉजी आई है, बदलाव आया है,लेकिन अभी खेतों तक उसे पहुंचाना है, किसान कहने लगा है कि अब फर्टिलाइजर कम करना है।
– अधिक फर्टिलाइजर के दुरुपयोग ने हमारी धरती मां को बीमार कर दिया है।
– इस बार 5 लाख तालाब, खेत-तालाब बनाने का बीड़ा उठाया है। मनरेगा से भी जल-संचय के लिए ऐसेट क्रिएट करने की तरफ बल दिया है।
– हर चीज़ संतुलित होनी चाहिये। हमारा तो मत है- कम कॉस्‍ट, ज्‍यादा आउटपुट। वैज्ञानिक तौर-तरीकों से हमें कृषि को आगे बढ़ाना चाहिए।
– 2014 में भारत में क़रीब साढ़े छः करोड़ डायबिटीज के मरीज थे। 3% मृत्यु का कारण कहते हैं कि डायबिटीज पाया गया।
– 7 अप्रैल को वर्ल्‍ड हेल्‍थ डे है। इस बार वर्ल्‍ड हेल्‍थ डे को ‘Week Beat Diabetes’ थीम पर केन्द्रित किया है। क्या हम 7 तारीख से कुछ प्रेरणा लेकर अपने निजी जीवन में डायबिटीज को परास्त करने के लिए कुछ कर सकते हैं क्या?
– हम सब जानते हैं कि हमारी जीवनशैली उसके लिए सबसे बड़ा कारण है। शारीरिक श्रम कम हो रहा है।
– योग में रुचि है, तो योग कीजिए, दौड़ने-चलने के लिए जाइए। अगर देश का नागरिक स्वस्थ होगा, तो मेरा भारत भी स्वस्थ होगा।
– 24 मार्च को दुनिया ने टीबी डे मनाया। दुनिया की तुलना में टीबी के मरीजों की संख्या हमारे यहां बहुत है।

नायक नहीं आंदोलन महत्वपूर्ण है

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बाहर और भीतर पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह एक राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना और चैनलों से लेकर अखबारों और सोशल मीडिया के साथ-साथ इंटरनेट पर उपलब्ध ई-पत्रिकाओं में भी उसकी भरपूर धमक रही. अंतरिम जमानत पर रिहाई के बाद जेएनयू के छात्रों के बीच दिया कन्हैया का भाषण अनेक चैनलों ने लाइव चलाया और बताते हैं कि इंटरनेट पर इसे 30 लाख से अधिक लोग देख चुके हैं. इसके बाद जो प्रतिक्रियाएं आईं उनमें उसे चे ग्वेरा से लेकर लेनिन तक कहा गया, प्रशंसा के पुल बांध दिए गए और एक आम मत था कि भारत को अपना नया नेता मिल गया है. इसी के बरअक्स उसे विलेन बनाने वालों की भी कोई कमी नहीं है. ऐसा लगता है कि कन्हैया को लेकर देश का जनमत दो हिस्सों में बंट गया है.

अगर देखें तो उसका भाषण महान नहीं था. बौद्धिक सेमिनारों और आयोजनों में जाने वाले जानते हैं कि उसमें कोई नई और मौलिक बात नहीं थी. कुछ तथ्यात्मक भूलें भी थीं. वैसे भी संघर्षों में तपे वामपंथी छात्र नेता पूरे कमिटमेंट के साथ बोलते हुए अच्छा भाषण देते ही हैं. लेकिन वह भाषण निश्चित तौर पर ऐतिहासिक था. सोचिए जरा जेल और इतने दमन के बाद अगर उसके भाषण में डर का कोई कतरा होता? प्रतिहिंसा का कोई कतरा होता? कोई अभद्र टिप्पणी होती? कोई हल्की बात होती? तो यह पूरा छात्र आंदोलन कमजोर पड़ जाता. वह किसी डिबेट में नहीं था, जेल से आने के कुछ घंटों के भीतर उस छात्र समूह के सामने था जो उसके साथ रहा तो उस मीडिया और जनता के सामने भी जिसका एक बड़ा हिस्सा उसको खत्म कर देने के लिए मुतमइन था. इसलिए वह देस-काल महत्वपूर्ण बन गया. उसे इतिहास ने एक मौका, एक जिम्मेदारी दी, जिसे उसने  बखूबी निभाया. इस अवसर पर जिस कमिटमेंट और विट के साथ उसने दक्षिणपंथी राजनीति पर हमला किया और आंबेडकरवादी तथा वामपंथी छात्र राजनीति को एक मंच पर आने का आह्वान किया वह संघर्ष की उस लंबी परियोजना की ओर इंगित करने वाला था, जिसके बिना फासीवाद के खिलाफ कोई लंबी लड़ाई भारत में नहीं लड़ी जा सकती.

देश भर के तमाम इंसाफपसंद लोग जो सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं… ये सब हीरो हैं. सब इसमें बराबरी के हिस्सेदार हैं

और यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. देश में एक के बाद एक छात्र आंदोलनों की कड़ियां जुड़ती जा रही हैं. शुरुआत एफटीआईआई के आंदोलन से हुई जब एक औसत से भी निचले स्तर के कलाकार गजेंद्र चौहान को सिर्फ इस आधार पर इस प्रतिष्ठित संस्था की कमान सौंप दी गई कि वे सत्ताधारी पार्टी से जुड़े हुए हैं. वह आंदोलन कैंपस से बाहर निकला और जेएनयू ही नहीं अनेक विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्रों, फिल्म से जुड़े गंभीर लोगों और बुद्धिजीवी समाज ने उसे पूरा समर्थन दिया. उसके बाद केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय विश्वविद्यालयों की शोध फेलोशिप बंद किए जाने के खिलाफ एक ऐतिहासिक आंदोलन हुआ जिसमें छात्रों ने यूजीसी कार्यालय के सामने 88 दिनों तक लगातार धरना दिया. इसमें जेएनयू ही नहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय सहित तमाम जगहों के छात्र शामिल थे और उनके समर्थन में देश भर में धरना प्रदर्शन हुए. अंततः सरकार को फेलोशिप तो देनी पड़ी लेकिन इसे बढ़ाने की उनकी मांग ठुकरा दी गई. हैदराबाद के आंबेडकरवादी छात्र संगठन के कार्यकर्ता रोहित वेमुला के केंद्रीय मंत्रियों के दबाव में छात्रावास से निष्कासन के बाद आत्महत्या जैसा कदम उठाने के बाद तो आत्महत्या के  लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने की मांग के साथ देश के भीतर ही नहीं बाहर भी आंबेडकरवादी, वामपंथी और प्रगतिशील विचारधारा के लोगों ने जबरदस्त प्रतिरोध दर्ज कराया. हर बार की तरह इस बार भी जेएनयू इस प्रतिरोध में अपनी पूरी ताकत के साथ खड़ा था.

इलाहाबाद में छात्रों ने अपनी अध्यक्ष ऋचा सिंह के नेतृत्व में विषैले बयानों के लिए चर्चित सांसद आदित्यनाथ को प्रवेश करने से रोका तो उनके खिलाफ जो कुचक्र रचे जा रहे हैं वे आज तक जारी हैं. केंद्र में नई सरकार आने के बाद जिस तरह कैंपसों में हिंदुत्व का वैचारिक एजेंडा लागू करने के लिए कोशिशें हुईं उसमें यह स्वाभाविक था कि इसका दुष्परिणाम झेलने वाले तबके एक साथ आते और प्रतिरोध दर्ज कराते. जेएनयू में हुई एक घटना के बाद जिस तरह तीन छात्रों को राजद्रोह (भाषा की अपनी राजनीति होती है जिसके तहत ब्रिटिशकालीन राजद्रोह कानून को मुख्यधारा के चैनल देशद्रोह में बदल देते हैं) के आरोप में गिरफ्तार किया गया, वह तमाम तार्किक लोगों को गैरजरूरी और अतिरेकी कदम लगा और इसीलिए देश-विदेश से तमाम प्रगतिशील लोगों, विश्वविद्यालयों, शिक्षक संघों, बुद्धिजीवियों और आम जनता ने इसका कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराया. छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में कन्हैया के भाषण को इन्हीं परिप्रेक्ष्यों में देखा जाना चाहिए लेकिन मसीहा की तलाश में पागल हमारा समाज केजरीवाल से कन्हैया तक के कंधों पर अपनी अकूत उम्मीदों का बोझ डालने के लिए बेकरार है. उसे उद्धारक चाहिए जो पांच साल में दुनिया बदल दे और खुद बस एक बार जाकर वोट डालना हो. जाहिर है उसे हर बार धोखा खाना ही होगा. एक कमजोर और आत्मविश्वास से हीन समाज ही मसीहा तलाशता है लेकिन इतिहास का अनुभव बताता है कि समाज जनता बदलती है नेता नहीं. आंदोलन नेता पैदा करते हैं, नेता आंदोलन नहीं पैदा करते. व्यक्ति को आंदोलन से ऊपर खड़ा कर देने की प्रवृत्ति सत्ता और उसके समर्थकों के लिए तो लाभकारी होती है जो आज उसे कुछ साल पहले मिली सजा से लेकर एक मित्र के साथ सामान्य-सी तस्वीर को अपने कुत्सा प्रचार का हिस्सा बनाकर निजी हमलों की आड़ में व्यापक सवालों को छिपा रहा है लेकिन शिक्षा के बाजारीकरण और भगवाकरण के खिलाफ जो एक देशव्यापी आंदोलन सुगबुगा रहा है, उसके समर्थकों का इसे स्वीकार करना घातक होगा.

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अंधविश्वास का मायाजाल

हमें बचपन से किताबों में यही पढ़ाया जाता रहा है कि सच बोलो, झूठ पाप के समान है। मगर इसी झूठ से अंधविश्वास की दुकानों में खूब नफा कमाया जा रहा है, वह भी उसी धर्म-मजहब के नाम पर जिसमें सच बोलने की सीख दी जाती है। जो लोग मजहब के रहनुमा बनने की बात करते हैं, उन्हीं की नाक के नीचे अंधविश्वास का यह कारोबार फल-फूल रहा है। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्हें इसकी खबर नहीं, मगर यह सवाल जरूर उठता है कि अंधविश्वास फैलाने वाले ढोंगी मौलानाओं, बाबाओं का विरोध पुरजोर तरीके से क्यों नहीं किया जाता, ऐसे लोगों के खिलाफ कोई मुहिम या फतवा जारी क्यों नहीं होता। 21वीं सदी में विज्ञान इंसान को चांद पर बसाने की कोशिश कर रहा है। कोई ठीक नहीं कि कुछ समय में चांद पर पहुंचाने के दावे ढोंगी तांत्रिक बाबाओं की ओर से किए जाने लगें, क्योंकि विज्ञान से ज्यादा आज लोग अंधविश्वास और जादू-टोने में अपनी मुसीबतों का इलाज तलाश रहे हैं।

इसकी वजह है कि लोगों में पैसा कमाने की जल्दी और जल्द से जल्द दिक्कतों को दूर कराने की होड़। इसका हल वे अपने प्रयासों में कम, इन ढोंगियों के पास ज्यादा ढ़ंूढ़ने लगे हैं। यही वजह है कि अभी तक कुछ आसूमल, निर्मल बाबाओं की एक खेप लोगों को झूठे ख्वाब दिखा कर उल्लू बना रही थी। अब बाबाजी, मौलानाजी जैसे फर्जी दावे वाले लोग भी अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के बाजार में पूरी तरह उतर आए हैं। इनके हौसले भी इतने बुलंद हैं कि अभी तक इनकी पहुंच मुहल्लों, कस्बों तक थी पर अब इनका मायाजाल शहरों की चकाचौंध तक जा पहुंचा है। इसकी एक वजह यह भी है कि इन ढोंगियों को मीडिया का सहयोग हासिल है। जैसे सरकारें सिगरेट, तंबाकू, शराब से बचने की ताकीद विज्ञापनों के जरिए करती हैं और वही इनको बेचने का लाइसेंस भी वही मुहैया कराती हैं।

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रोहित वेमुला पर हो रही डिबेट में उठे सवालों से डर गई है भाजपा ?

धर्म जाति और नस्ल का सवाल

अगर यह कहा जाए कि हममें से ज्यादातर के भीतर जाति, रंग, नस्ल और भाषा को लेकर एक-दूसरे से नफरत करने की प्रवृत्ति होती है तो हम जल्दी स्वीकार नहीं करेंगे। इस तरह से बातें करने लगते हैं जैसे यह किसी दूसरी दुनिया की समस्या है और हम तो कभी इसके शिकार हो ही नहीं सकते। लेकिन जब मौका आता है, जब हम गुस्से में होते हैं, तब हमारी असलियत बाहर झांकने लगती है। हम खुद ही साबित करने में लग जाते हैं कि हम बिल्कुल जाति, रंग, नस्ल और भाषा को लेकर एक-दूसरे से नफ़रत करते हैं। बल्कि नफ़रत करने वाले दो-चार मिल जाएं तो हम भीड़ में बदलकर एक गलती की सज़ा उसी रंग, जाति नस्ल और भाषा से मिलते-जुलते दूसरे को दे सकते हैं। मार सकते हैं, उसकी कार तोड़ सकते हैं और जला भी सकते हैं।
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