देहदान कीजिए, PGI देगा अवार्ड और ऑर्गन डोनर कार्ड

देहदान करने वालों को रोहतक पीजीआई सम्मानित करेगा। सा‌थ ही देह दानियों को विशेष रूप से आर्गन डोनर कार्ड जारी किए जाएंगे, जिससे दानी व्यक्ति के जीवित रहने तक उसको स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं संस्थान में आसानी से मिलें। एक व्यक्ति मरने के बाद भी सात लोगों ने जीवनदान दे सकता है।

यह बात मंगलवार को हेल्थ विवि के वीसी डॉ. ओपी कालरा ने कही। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपनी किडनी, दिल, लीवर, फेफडे़, आंत, कॉर्निया आदि विशेष अवस्था में दान कर सकता है। संस्थान के निदेशक डॉ. राकेश गुप्ता ने कहा कि इस संबंध में जल्द ही व्यवस्था की जाएगी, ताकि देहदान करने वालों को उपचार में बेहतर सुविधा मिल सके।

वीसी की प्रेरणा पाकर किया देहदान
वीसी डॉ. ओपी कालरा की प्रेरणा पाकर मंगलवार को ओल्ड हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी निवासी भारत प्रेम ने अपनी देह दान करने के लिए शपथ पत्र भरा। इस दौरान उनके साथ पत्नी सुषमा नाथ, पुत्र अखिल नाथ और पुत्री सुचेता नाथ भी रहे। गौरतलब है कि देहदान करने वाले भारत प्रेम लेखक और वरिष्ठ पत्रकार भी हैं। इस मौके पर प्रति कुलपति डॉ. वीके जैन, डॉ. रोहताश यादव और डॉ. सुखबीर मौजूद रहे।

देहदाता का बना रहे सम्मान, होगी व्यवस्था
डॉ. कालरा ने बताया कि जल्द ही हम ऐसी व्यवस्था करेंगे, जिससे देहदाता की अंतिम इच्छा का सम्मान हो सके। पिछली एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कई बार पारिवारिक मतभेद के बाद मृतक के शरीर को लेकर समस्या हो जाती है। मृतक के शरीर को लेकर कई बार परिजनों में दो विचार बन जाते हैं।

भ्रांति से बचें, करें देहदान
डॉ. विवेक मलिक ने कहा जब समाज के लोग रक्तदान करने से डरते हैं, ऐसे में शरीर दान करना सराहनीय है। हमें समाज में फैली भ्रांतियों से नहीं डरना चाहिए और ऐसे कार्यों के लिए आगे आना चाहिए, जिससे समाज जागरूक हो।

किडनी को बचाने की अपील
कुलपति डॉ. कालरा ने आमजन से बतौर नफ्रोलोजिस्ट अपनी-अपनी किडनी बचाने की अपील की है। उन्होंने बताया कि वे स्वयं मरीजों की जरूरतों को देखते हुए ओपीडी में बैठते हैं। अज्ञानता के चलते किडनी रोगियों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इसलिए सभी को समय-समय पर बीपी, यूरीन और शुगर जांच करवानी चाहिए। पीजीआई में जल्द ही किडनी ट्रांसप्लांट सुविधा भी शुरू हो जाएगी।

अब आसानी से समझ आएगी ‘एफआइआर’ की भाषा

अब थानों में दर्ज होने वाली एफआइआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) की भाषा आम आदमी की समझ में आसानी से आ जाएगी। थानों में दर्ज होने वाली एफआइआर में अब हंिदूू शब्दों का प्रयोग होने लगा है। पुलिस महानिदेशक के निर्देश के बाद सोनीपत पुलिस ने हंिदूू शब्दों को काफी हद तक अपना लिया है। पुलिस महानिदेशक के निर्देश के बाद सदियों से चलन में रही अरबी, फारसी और उर्दू भाषा के शब्दों से पुलिस ने परहेज करना शुरू कर दिया है। पुलिस विभाग में अरबी, फारसी और उर्दू के शब्द मुगलकाल से ही चले आ रहे थे। जिनके शाब्दिक अर्थ आम आदमी के सिर के उपर से निकल जाते थे। पुलिस अब ज्यादा से ज्यादा हंिदूी और आम बोल चाल के शब्दों का ही प्रयोग कर रही है। जिसे आम आदमी आसानी से समझ सकता है।1पहले एफआइआर में उर्दू भाषा के शब्दों के आलावा कई कठिन भाषाओं के शब्दों का इस्तेमाल होता रहा है। यह शब्द आम आदमी की समझ से कोसों दूर होते थे। आमतौर पर पुलिस किसी भी एफआइआर या अन्य कार्रवाई में उर्दू, अरबी व फारसी शब्दों का प्रयोग करती थी। यह शब्द आम आदमी की समझ से परे जो थे ही साथ ही इन्हें समझने के लिए पुलिस को भी विशेष प्रशिक्षण देना पड़ता था। एफआइआर में इमरोज मन, तहरीर, पुलंदा, हजा, बगर्ज जैसे शब्दों का काफी प्रयोग किया जाता था। यह किसी आम आदमी के लिए समझना नामुमकिन-सा लगता है। लंबे वक्त तक इन शब्दों का इस्तेमाल करने और सहज रहने की वजह से पुराने पुलिस कर्मी भी इन्हें ही तव्वजों देते थे। हालांकि अब पुलिस अधीक्षक अभिषेक गर्ग के निर्देश के बाद थानों में हंिदूी शब्दों का प्रयोग होने लगा है। इससे नई भर्ती वाले पुलिस कर्मियों को भी काफी राहत मिली है। 1इतना आया बदलाव : पहले किसी एफआइआर में लिखा होता था कि ‘‘एसडीओ साहब, मजरुब राजेश (काल्पनिक नाम ) जेरे इलाज मिला, जिससे पूछताछ अमल में लाई, जिसने अपना बयान तहरीर कराया जो बयान बाला-हालात से मुलाहजा एमएलसी से सरेदस्त सूरत जुर्म दफा 307 का सरजद होना पाया जाता है। लिहाजा तहरीर हजा बगर्ज कायमी मुकदमा दर्ज करके इत्तिला दी जावे।’ यह उर्दू न जानने-समझने वाले किसी भी आदमी की समझ से परे होती थी। अब इसकी जगह इस तरह की भाषा का प्रयोग शुरू हो गया है कि ‘एसडीओ साहब, राजेश नामक व्यक्ति ने अपनी शिकायत दर्ज करवाई, जिसमें उसने एमएलसी के आधार पर धारा 307 के तहत मुकदमा दर्ज कराया। शिकायत की पूरी जानकारी मैं आपको डाक द्वारा भेज रहा हूं। इस तरह से लिखी शिकायत को कोई भी समझ सकता है। 1बेहतर है यह प्रयास : जितेंद्र 1अधिवक्ता जितेंद्र कुमार कहते हैं कि अब एफआइआर की भाषा आम आदमी की समझ में आसानी से आ रही है। पुलिस विभाग ने यह बेहतर कदम उठाया है। अब तक उर्दू, फारसी व अरबी भाषा के कई शब्द समझने में काफ मशक्कत करनी पड़ती थी। 1हंिदूी के शब्दों का हो रहा प्रयोग : गर्ग1पुलिस अधीक्षक अभिषेक गर्ग कहते हैं कि सोनीपत पुलिस अब एफआइआर में हंिदूी शब्दों को ही तव्वजो दे रही है। इसके लिए सख्त निर्देश जारी कर दिए गए हैं। अब थानों में आम लोगों के समझ की भाषा में ही शिकायत लिखी जाती है। जिससे शिकायतकर्ता को पूरी जानकारी रहती है कि उसके अनुसार ही उसकी एफआइआर दर्ज की गई है

धारा 498-ए: दहेज प्रताड़ना के खिलाफ सहारा या हथियार

 

source

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005

सूचना का अधिकार अधिनियम (अधिनियम सं. 22/2005)
  1. अधिनियम का परिचय – संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया है, जिसे 15 जून, 2005 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और 21 जून 2005 को सरकारी गजट में अधिसूचित किया गया। अधिनियम के अनुसार, यह, जम्मू व कश्मीर राज्य को छोड़कर, संपूर्ण भारत पर लागू है।
  2. सार्वजनिक प्राधिकारी- “सार्वजनिक प्राधिकारी” से आशय है (क) संविधान द्वारा अथवा उसके अंतर्गत (ख) संसद द्वारा निर्मित किसी अन्य कानून के द्वारा (ग) राज्य विधायिका द्वारा बनाए गए किसी अन्य कानून के द्वारा (घ) समुचित सरकार आदि द्वारा जारी अथवा दिए गए किसी आदेश के द्वारा स्थापित कोई प्राधिकरण अथवा निकाय अथवा स्व-शासी संस्था।
  3. सूचना का अधिकार – सूचना का अधिकार में ऐसी सूचना तक पहुँच का होना समाहित है, जो किसी सार्वजनिक प्राधिकारी द्वारा धारित अथवा उसके नियंत्रण में है। इसमें कार्य, दस्तावेज, अभिलेखों को देखने, दस्तावेजों/ अभिलेखों से टीप, उद्धरण लेने और सामग्री के प्रमाणित नमूने तथा इलेक्ट्रॉनिक रूप में संग्रहीत सूचना प्राप्त करने का अधिकार शामिल है।
  4. प्रकटन से छूट-प्राप्त सूचना – अधिनियम की धारा 8 व 9 में कतिपय श्रेणियों की सूचनाओं को नागरिकों पर प्रकट करने से छूट का प्रावधान है। सूचना पाने के इच्छुक व्यक्तियों को सलाह दी जाती है कि वे सूचना हेतु अनुरोध प्रस्तुत करने के पहले अधिनियम की तत्संबंधी धाराओं को देख लें।
  5. सूचना के लिए कौन अनुरोध कर सकता है – कोई भी नागरिक निर्धारित शुल्क देकर अंग्रेजी/हिन्दी/जहाँ आवेदन किया जा रहा हो वहाँ की राजभाषा भाषा में लिखित में अथवा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना के लिए आवेदन कर सकता है। आवेदन लखनऊ स्थित केन्द्रीय जन सूचना अधिकारी को सीधे अथवा केन्द्रीय सहायक जन सूचना अधिकारी के माध्यम से भेजा जाना चाहिए।

RTI मलतब सूचना का अधिकार – ये कानून हमारे देश मे 2005 मे लागू हुआ। जिस का उपयोग कर के आप सरकार और किसी भी विभाग से सूचना मांग सकते है आम तौर पर लोगो को इतना ही पता होता है, परंतु इस सम्‍बन्‍ध में रोचक जानकारी निम्न हूँ –

  • आरटीआई से आप सरकार से कोई भी सवाल पूछ कर सूचना ले सकते है
  • आरटीआई से आप सरकार के किसी भी दस्तावेज़ की जांच कर सकते है
  • आरटीआई से आप दस्तावेज़ या Document की प्रमाणित Copy ले सकते है
  • आरटीआई से आप सरकारी काम काज मे इस्तमल सामग्री का नमूना ले सकते है
  • आरटीआई से आप किसी भी कामकाज का निरीक्षण कर सकते है

आरटीआई कि निम्‍न धाराऐं महत्‍वपूर्ण है इन्‍हे स्‍मरण में रखना चाहिये –

  • धारा 6 (1) – आरटीआई का application लिखने का धारा है
  • धारा 6 (3) – अगर आप की application गलत विभाग मे चली गयी है तो गलत विभाग इस को 6 (3)
  • धारा के अंतर्गत सही विभाग मे 5 दिन के अंदर भेज देगा
  • धारा 7(5) – इस धारा के अनुसार BPL कार्ड वालों को कोई आरटीआई शुल्क नही देना होता
  • धारा 7 (6) – इस धारा के अनुसार अगर आरटीआई का जवाब 30 दिन मे नही आता है तो सूचना फ्री मे दी जाएगी
  • धारा 18 – अगर कोई अधिकारी जवाब नही देता तो उस की शिकायत सूचना अधिकारी को दी जाए
  • धारा 19 (1) – अगर आप की आरटीआई का जवाब 30 दिन मे नही आता है तो इस धारा के अनुसार आप प्रथम अपील अधिकारी को प्रथम अपील कर सकते हो
  • धारा 19 (3) – अगर आप की प्रथम अपील का भी जवाब नही आता है तो आप इस धारा की मदद से 90 दिन के अंदर 2nd अपील अधिकारी को अपील कर सकते हो

आरटीआई कैसे लिखे –

 
इस के लिए आप एक साधा पेपर ले और उस मे 1 इंच की कोने से जगह छोड़े और नीचे दिए गए प्रारूप मे अपने आरटीआई लिख ले

………………………………………………………………..
………………………………………………………………..

सूचना का अधिकार 2005 की धारा 6(1) और 6(3) के अंतर्गत आवेदन

सेवा मे
(अधिकारी का पद)/ जन सूचना अधिकारी
विभाग का नाम

विषय – आरटीआई act 2005 के अंतर्गत ……………… से संबधित सूचनाए

1- अपने सवाल यहाँ लिखे
2-
3
4

मैं आवेदन फीस के रूप में 10रू का पोस्टल ऑर्डर …….. संख्या अलग से जमा कर रहा /रही हूं।

या
मैं बी.पी.एल. कार्ड धारी हूं इसलिए सभी देय शुल्कों से मुक्त हूं। मेरा बी.पी.एल. कार्ड नं…………..है।

यदि मांगी गई सूचना आपके विभाग/कार्यालय से सम्बंधित नहीं हो तो सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6 (3) का संज्ञान लेते हुए मेरा आवेदन सम्बंधित लोक सूचना अधिकारी को पांच दिनों के समयाविध् के अन्तर्गत हस्तान्तरित करें। साथ ही अधिनियम के प्रावधानों के तहत सूचना उपलब्ध् कराते समय प्रथम अपील अधिकारी का नाम व पता अवश्य बतायें।

भवदीय
नाम:
पता:
फोन नं:

आईपीसी (इंडियन पैनल कोड) की धारा 354

1860 से चले आ रहे कानून आईपीसी (इंडियन पैनल कोड) की धारा 354 में स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग करना जैसी वारदातें आती थीं. इसके तहत आरोपी को एक वर्ष के लिए कारावास, जो पांच वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माने की सजा का प्रावधान था. साथ ही यह जमानतीय धारा भी थी. जिसमें आरोपी जमानत पर बाहर आ सकता था. दिल्ली में हुए दामिनी रेप केस के बाद कानून में खासे बदलाव हुए. धारा 354 में कई उपधाराएं तैयार की गईं.
  • 354(क) इसके तहत अवांछनीय शारीरिक संपर्क और अग्रक्रियाएं या लैंगिक संबंधों की स्वीकृति बनाने की मांग या अनुरोध, अश्लील साहित्य दिखाना जैसी वारदातें आती हैं. वैसे तो यह बेलेबल है लेकिन इसमें कम से कम कारावास तीन वर्ष तक, जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान किया गया. इसी के तहत लैंगिक आभासी टिप्पणियों की प्रकृति का लैंगिक उत्पीडऩ भी जोड़ा गया. जिसमें आरोपी को एक वर्ष तक का कारावास हो सकेगा या जुर्माना या फिर दोनों.
  • 354(ख) इसके तहत किसी महिला को विवस्त्र करने के आशय से स्त्री पर हमला या आपराधिक बल कर प्रयोग किया जाना. जिसमें आरोपी को कम से कम पांच वर्ष का कारावास, किंतु जो दस वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना भी नियत किया गया. साथ ही यह धारा नॉनबेलेबल है.
  • 354(ग) दृश्यरतिकता यानि किसी को घूरकर देखना. इसके तहत अगर किसी लड़की को कोई पंद्रह सेकंड घूरकर देख ले तो उसके खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है. जिसमें कानून के तहत प्रथम दोष सिद्ध के लिए कम से कम एक वर्ष का कारावास, किन्तु जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना. इसमें जमानत हो सकती है. अगर यही व्यक्ति दुबारा ऐसी ही घटना के लिए दोषी पाया जाता है तो इसके लिए कम से कम तीन वर्ष का कारावास जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना भी. इसमें आरोपी की जमानत भी नहीं हो सकती.
  • 354(घ) इसके तहत किसी लड़की या महिला का पीछा करना जैसी वारदातें शामिल हैं. जिसमें पहली बार अगर आरोपी पर दोष सिद्ध होता है तो उसको तीन वर्ष का कारावास और जुर्माना हो सकता है. वहीं अगर यही आरोपी दुबारा ऐसा करता है और उस पर दोष सिद्ध होता है तो इसके लिए पांच वर्ष तक का कारावास और जुर्माना हो सकता है. वहीं आरोपी की जमानत भी नहीं हो सकती.

source

भारतीय ऑनलाइन अख़बार एक ही जगह पर

 

भारत के सभी प्रमुख अखबार अब ऑनलाइन उपलब्ध है पर सबके वेबपते ढूंढना और याद रखना संभव नहीं है ।
एक वेबसाइट है जो भारत के विभिन्न भाषाओ के अख़बारों को ऑनलाइन पढ़ने की सुविधा एक ही जगह पर उपलब्ध कराती है ।

इस वेबसाइट में आप हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, कोंकणी, मलयालम, तमिल, तेलुगु, उर्दू, पंजाबी और ओडिया अख़बार पढ़ सकते है ।
इसमें राज्य या जिले के अनुसार अखबार चुनने का भी विकल्प है ।

एक उपयोगी वेबसाइट शायद आपके काम आये ।

इस वेबसाइट पर जाने यहाँ क्लिक करें ।

अगर आपके खिलाफ कोई झूठी शिकायत पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है?

१. सबसे पहले झूठी शिकायत देने के लिए शिकायतकर्ता के खिलाफ एक काउंटर शिकायत सम्बंधित या नजदीकी पुलिस स्टेशन में दें या उनके उच्चाधिकारी को दें। याद रखें शिकायत दर्ज कराने के लिए किसी सबूत को साथ देने की जरूरत नहीं होती। ये जांच अधिकारी की जिम्मेवारी होती है कि वो शिकायत की जांच करे, गलत पाये जाने पर शिकायत बंद कर दे या फिर सही पाये जाने पर सम्बंधित धारा के तहत केस दर्ज करे।
२. झूठी शिकायतकर्ता के खिलाफ एक प्राईवेट शिकायत इलाके के मजिस्ट्रेट को सीआरपीसी की धारा १९० (ए) के तहत भी दी जा सकती है। जो आपकी शिकायत पर धारा २०० के तहत कारर्वाई करेंगे।
३. सी आर पी सी की धारा १५६(३) के तहत मजिस्ट्रेट को शिकायत देकर पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने वास्ते निवेदन किया जा सकता है।
४. अगर उपरोक्त झूठी शिकायत कोर्ट में जाती है तो आप कोर्ट से “नोटिस ऑफ़ एक्वाजेशन” की मांग कर उस झूठी शिकायत को कांटेस्ट करने की इच्छा जताएं। जैसे ही आप कॉन्टेस्ट की बात रखेंगे तो अगली पार्टी को एक निश्चित समय सीमा के भीतर आपके खिलाफ सबूत एवं गवाह पेश करने होंगे। उस सबूत एवं गवाह को आप कोर्ट में क्रॉस परीक्षण कर सकते है एवं अपने पक्ष को रखते हुए सच्चाई कोर्ट के सामने ला सकते है।
५. झूठे शिकायतकर्ता को यूँ ही ना छोड़े। विभिन्न धाराओं के तहत उनके ऊपर भी केस दर्ज कराने कि प्रक्रिया शुरू करे। अपने साथ हुए ज्यादती एवं मानसिक परेशानी व मानहानि का मुआवजा मांगे। याद रखे कि झूठे शिकायतकर्ता क़ानून का मालिक नहीं है बल्कि वो तो क़ानून की कमियों का फायदा उठानेवाला मेनुपुलेटर है।
हमारे देश में क़ानून का सबसे बड़ा मालिक हमारे देश की संसद है और सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय उस क़ानून का संरक्षक। इन संविधानिक कोर्ट को किसी भी तरह के झूठी शिकायत या केस को ख़ारिज कर झूठी शिकायतकर्ता को समुचित दंड देने का पर्याप्त अधिकार है।
याद रखे लड़ाई आपको ही लड़नी है हम तो सिर्फ आपको रास्ता बता सकते है उसपर निर्भीक रूप से आपको आगे बढ़ना है, तभी इस तरह के झूठे शिकायतकर्ता को एक कड़ा सन्देश जाएगा जो कि एक तरह से जरूरी भी है |