बौद्ध धम्म की जन्म तिथि :अषाढी पूर्णिमा

आज हैं – बौद्ध धम्म की जन्म तिथि :अषाढी पूर्णिमा
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गौतमबुद्ध के द्वारा प्रथम धम्म उपदेश- धम्मचक्र प्रवर्तन दिन के अवसर पर आप सब को हार्दिक बधाई, मंगल कामना ।
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बोधिसत्व सिद्धार्थ गौतम छः साल की साधना के बाद वैशाखी पूर्णिमा की रात को सम्यक संबोधि प्राप्त करके बुद्ध हुए ।बोधि वृक्ष के नीचे बुद्धत्व प्राप्त करने के पश्चात गौतमबुद्ध ने सोचा, जो ज्ञान मैंने पाया हैं, जिस दिव्य घटना का मैंने अनुभव किया हैं, वह इतने सूक्ष्म हैं कि शब्दों में उसको कहना कठिन हैं । उन्होंने सोचा कि जो मैंने पाया हैं, वह इतना सूक्ष्म हैं कि शब्दों में उसका बयान नहीं किया जा सकता, सिखाया नहीं जा सकता ।अतः मैं खामोश रहूँगा ।चुप रहूँगा । मैंने जो पाया हैं, वह स्वअनुभव से समझा जा सकता हैं और पाया जा सकता हैं ।अतः मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा ।

बाद में बुद्ध ने अपने ज्ञान को बांट ने का विचार किया ।
पहले आलार कालाम को ज्ञान देने का सोचा । बुद्ध ने अपने दिव्य चक्षु से देखा की आलार कालाम एक सप्ताह पहले मृत्यु प्राप्त कर चुके हैं ।
फिर सोचा कि मैं उद्दक रामपुत्त को ज्ञान बांटु । बुद्ध ने दिव्य ज्ञान से देखा कि उद्दक रामपुत्त अगली रात्रि को मृत्यु पाये हैं ।
फिर बुद्ध के मन में आया कि मेरे पहले पाँच साथी मुझे छोड़कर गये हैं उन्हें ज्ञान देना चाहिए क्योंकि उन्होंने मेरी खुब सेवा की हैं । बुद्ध ने जाना की पाँच साथी अभी वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाय में साधना कर रहे हैं । वे पाँच साथी ज्ञान के अधिकारी हैं ।

बुद्ध बोधगया से वाराणसी के तरफ चल पडे । 11 दिन की सफर के बाद बुद्ध अषाढी पूर्णिमा के दिन वाराणसी मृगदाय में पहुंचे ।

उसी दिन बुद्ध ने पंचवर्गिय परिव्राजक को प्रथम धम्म उपदेश दिया ।

जिसे इतिहास में धम्मचक्कप्पवत्तन के नाम से जाना जाता हैं ।

🌳धम्मचक्कप्पवत्तनसुत्त बौद्ध धम्म का सार तत्व हैं ।
🌳 इसी धम्मचक्कप्पवत्तनसुत्त को ही मज्झिमा पटिपदा और आर्य अष्टांगिक मार्ग तथा चार आर्य सत्य भी कहा जाता हैं ।

🔔बुद्ध ने कहा –

भिक्खुओ ! दो अतियों को छोड दो ।
दो अतियों का सेवन करना अनर्थ हैं, अज्ञानता हैं ।
🌿जैसे काम सुख में आसक्त हो लिप्त होना ।
🌿दूसरा, शरीर को अति पीड़ा देना, अति कष्ट देना ।
इन दो अतियों को छोड मैंने मध्यम मार्ग खोजा हैं जो आंख देने वाला हैं, सुख देने वाला हैं , शान्ति देने वाला हैं, ज्ञान देने वाला हैं, आनंद देने वाला हैं ।
मध्यम मार्ग ही आर्य अष्टांगिक मार्ग हैं –

🔔सम्यक दृष्टि,
🔔 सम्यक संकल्प,
🔔 सम्यक वचन,
🔔 सम्यक कर्म,
🔔 सम्यक आजीविका,
🔔सम्यक व्यायाम,
🔔सम्यक स्मृति,
🔔 सम्यक समाधि ।
💐 💐 💐

बुद्ध ने उन्हें चार आर्य सत्य का ज्ञान दिया ।

उन्होंने बताया कि-
दु:ख हैं,
दु:ख का कारण हैं,
दुःख का निरोध हैं और
दु:ख निरोध का मार्ग हैं ।

बुद्ध ने आज अषाढी पूर्णिमा के दिन धम्म चक्क गतिमान किया और आदि कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी और अंत में भी कल्याणकारी धम्म सर्वे प्राणीओं के हित के लिए, मंगल के लिए, सुख के लिए, निर्वाण के लिए प्रकाशित किया ।

आज के युग में भी बुद्ध का धम्म कल्याणकारी हैं, सिर्फ धम्म के मार्ग पर हमें चलना हैं ।
🍀बुद्ध का धम्म हमारे में विकसित हो और हम दु:ख के छुटकारा पाये यही मंगल कामना के साथ धम्मचक्कप्पवत्तन दिन की मंगल कामना -बधाई ।🍀
💐नमो बुद्धाय 💐
💐नमो धम्माय 💐
💐नमो संघाय 💐
🎄🎄सुप्रभात 🎄🎄

‘अप्प दीपो भव’

बौद्ध दर्शन का एक सूत्र वाक्य है-
‘अप्प दीपो भव’
अर्थात अपना प्रकाश स्वयं बनो।
तथागत सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के कहने का मतलब यह है कि किसी दूसरे से उम्मीद लगाने की बजाये अपना प्रकाश (प्रेरणा) खुद बनो। खुद तो प्रकाशित हों ही, लेकिन दूसरों के लिए भी एक प्रकाश स्तंभ की तरह जगमगाते रहो।
भगवान गौतम बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द से उसके यह पूछने पर कि जब सत्य का मार्ग दिखाने के लिए आप या कोई आप जैसा पृथ्वी पर नहीं होगा तब हम कैसे अपने जीवन को दिशा दे सकेंगे?
तो भगवान बुद्ध ने ये जवाब दिया था – “अप्प दीपो भव” अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो ।कोई भी किसी के पथ के लिए सदैव मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकता केवल आत्मज्ञान के प्रकाश से ही हम सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।
भगवान बुद्ध ने कहा, तुम मुझे अपनी बैसाखी मत बनाना। तुम अगर लंगड़े हो, और मेरी बैसाखी के सहारे चल लिए-कितनी दूर चलोगे?मंजिल तक न पहुंच पाओगे। आज मैं साथ हूं, कल मैं साथ न रहूंगा, फिर तुम्हें अपने ही पैरों पर चलना है। मेरी साथ की रोशनी से मत चलना क्योंकि थोड़ी देर को संग-साथ हो गया है अंधेरे जंगल में। तुम मेरी रोशनी में थोड़ी देर रोशन हो लोगे; फिर हमारे रास्ते अलग हो जाएंगे। मेरी रोशनी मेरे साथ होगी, तुम्हारा अंधेरा तुम्हारे साथ होगा। अपनी रोशनी पैदा करो। अप्प दीपो भव!
– अप्प दीपो भव :
जिसने देखा, उसने जाना ।
जिसने जाना, वो पा गया ।
जिसने पाया, वो बदल गया,
अगर नहीं बदला तो समझो कि
उसके जानने में ही कोई खोट था ।
भगवान बुद्ध को जाना तो बुद्दत्व तक पहुचेंगे तुम नहीं तुम भगवान बुद्ध की पूजा करने से नहीं पहुचोगे न ही किसी अन्य की पूजा करने से या चेला बनने से|तुम खुद जानोगे तभी तुम पहुचोगे।
भारत वर्ष में भगवान बुद्ध का विरोध क्यों हुआ? इसलिए, क्योंकि उन्होंने तीनों वेदों(बुद्ध के समय ब्राह्मणों के पास केवल तीन वेद ही थे) और ब्राह्माणवादी मान्यताओं को खारिज कर दिया।
यदि संसार में किसी ने सबसे पहले यह सवाल उठाया कि मनुष्यों में उच्च नीच वर्ण क्यों है? तों ऊँच-नीच की मान्यता का विरोध और खंडन केवल भगवान बुद्ध ने किया है ।
भगवान बुद्ध ने आगे कहा वह ईश्वर के होने या न होने के प्रश्न को अनावश्यक बताया ।इश्वर पर निर्भर न रहकर अपने मार्ग और भला खुद ही करने की शिक्षा दी है |भगवान बुद्ध के अनुसार धर्म का अर्थ ईश्वर , आत्मा, स्वर्ग , नर्क , परलोक नही होता ? बुद्ध ने वैज्ञानिक तरीके से ईश्वर , आत्मा , स्वर्ग , नर्क , परलोक , के अस्तित्व को ही नकारा और ध्वस्त किया है |
संसार भर के इतिहास में भगवान बुद्ध एक मात्र ऐसे धम्म प्रचारक है जो व्यक्ति को तर्क और विज्ञान के विपरीत किसी भी बात में विश्वास करने से रोकते है | भगवान बुद्ध कहते है , जिसे ईश्वर कहते है उससे मेरा कोई लेना -देना (सम्बन्ध ) नही है ?
किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार मत करो क्यो कि मैंने इसे करने को कहा है I इसलिये भी मत स्वीकार करो कि किसी धर्म ग्रन्थ में लिखा है। इसलिए भी स्वीकार मत करो कि ये प्राचीन परम्परा है। किसी भी बात को मानने से पहले अपनी तर्कबुद्धि से परखो अगर उचित है तो उसका अनुकरण करो नही तो त्याग दो |भगवान बुद्ध के जैसे स्वतंत्रता किसी भी अन्य धर्म ने नही दी है | भगवान बुद्ध ने स्वयं को मार्ग दर्शक कहा है और कभी भी विशेष दर्जा नही दिया | बुद्ध धम्म में नैतिकता पर ज्यादा जोर दिया गया है।
****अन्य धम्म में जो स्थान ईश्वर का है वही स्थान बुद्ध धम्म में नैतिकता का है | भगवान बुद्ध का कहना है *** अप्प् दीपो भव् ** अर्थात …अपना प्रकाश खुद बनो ….!!!!
।।।।नमो बुद्धाय।।।।

सारा खेल मन का है, कैसे हम देखते हैं!

बुद्ध का एक शिष्य हुआ पूर्ण काश्यप। वह निश्चित ही पूर्ण हो गया था, इसलिए उसे बुद्ध पूर्ण कहते हैं। फिर एक दिन बुद्ध ने उससे कहा कि पूर्ण, अब तू पूर्ण सच में ही हो गया। अब मेरे साथ-साथ डोलने की कोई जरूरत न रही। अब तू जा। अब तू गांव-गाव, नगर-नगर घूम और डोल। मेरी खबर ले जा। मेरे पास तूने जो पाया है, उसे लुटा।
पूर्ण ने कहा : भगवान, किस दिशा में जाऊं? आप इशारा कर दें।
बुद्ध ने कहा : तू खुद ही चुन ले। अब तू खुद ही समर्थ है। अब मेरे इशारे की भी कोई जरूरत न रही।
तो पूर्ण ने कहा कि जाऊंगा–‘सूखा’ नाम का एक इलाका था बिहार में-वहां जाऊंगा। बुद्ध ने कहा, तू खतरा मोल ले रहा है। वह जगह भली नहीं। लोग सज्जन नहीं। लोग बड़े दुष्ट हैं और लोग सताने में रस लेते हैं। लोग तुझे परेशान करेंगे। इन पीत-वस्त्रों में उन्होंने भिक्षु कभी देखा नहीं। वे बड़े जंगली हैं। तू वहा मत जा।
पर पूर्ण ने कहा, इसीलिए तो उनको मेरी जरूरत है। किसी को तो जाना ही होगा। कब तक वे जंगली रहें? कब तक उनको पशुओं की तरह रहने दिया जाए? मुझे जाना होगा। आशा दें।
बुद्ध ने कहा, जा; मगर मेरे दो-तीन सवालों के जवाब दे दे। पहला – अगर वे तुझे गालियां दें, अपमान करें, तो तुझे क्या होगा ‘ तो पूर्ण ने कहा, यह भी आप मुझसे पूछते हैं, क्या होगा? आप भलीभांति जानते हैं कि मैं प्रसन्न होऊंगा। क्योंकि मेरे मन में यह भाव उठेगा, कितने भले लोग हैं, सिर्फ गालियां देते हैं, मारते नहीं। मार भी सकते थे।
बुद्ध ने कहा, ठीक। मगर अगर मारे न, मारने ही लगें, तो तेरे मन में क्या होगा? पूर्ण ने कहा, आप पूछते हैं? आप भलीभांति जानते हैं कि पूर्ण प्रसन्न होगा, कि धन्यभाग कि मारते हैं, मार ही नहीं डालते। मार भी डाल सकते थे।
बुद्ध ने कहा, आखिरी सवाल, पूर्ण। अगर मार ही डालें, तो मरते वक्त तेरे मन में क्या होगा? पूर्ण ने कहा, आप, और पूछते हैं? आपको भलीभांति मालूम है कि जब मैं मर रहा होऊंगा तो मेरे मन में होगा, धन्यभाग, उस जीवन से छुटकारा दिला दिया जिसमें कोई भूल-चूक हो सकती थी।
बुद्ध ने कहा, अब तू जा। अब तुझे जहां जाना है, तू जा। अब तुझे कोई गाली नहीं दे सकता। अब तुझे कोई मार नहीं सकता। अब तुझे कोई मार डाल नहीं सकता। ऐसा नहीं कि वे तुझे गाली न देंगे; गाली तो वे देंगे, लेकिन तुझे अब कोई गाली नहीं दे सकता। ऐसा नहीं कि वे तुझे मारेंगे नहीं; मारेंगे, लेकिन तुझे अब कोई मार नहीं सकता। और कौन जाने, कोई तुझे मार भी डाले; लेकिन अब तू अमृत है। अब तेरी मृत्यु संभव नहीं।
सारा खेल मन का है, कैसे हम देखते हैं!
‘उसने मुझे डांटा, उसने मुझे मारा, मुझे जीत लिया, मेरा लूट लिया-जो ऐसी गांठें मन में नहीं बनाए रखते हैं, उनका वैर शात हो जाता है।’
ओशो
एस धम्मो सनंतनो, भाग -1, प्रवचन -1

सबकी समझ अपनी अपनी होती है : गौतम बुद्ध

भगवान बुद्ध सांध्यकालीन प्रवचन देकर हमेशा की तरह तीन बार बोले – अब अपना २ कार्य संपन्न करें!और उठ कर अपने विश्राम स्थल की और बढ़ गए ! आनंद भी उनके पीछे २ वहाँ पहुँच गया ! आज आनंद ने आख़िर बुद्ध से पूछ ही लिया की आप एक ही बात को तीन बार क्यूँ दोहराते हैं ?

 

बुद्ध की आदत थी की हर बात वे अपने शिष्यों को तीन बार समझा देते थे ! अब आनंद को ये शायद फालतू की बात ही लगती होगी की अब रोज रोज ये क्या तीन बार दोहराना की जावो अब अपना अपना काम करो ! अरे भाई स्वाभाविक और समझी हुई बात है की, बुद्ध के भिक्षू हो तो , सांध्य कर्म और सभा के बाद सब ईश्वर चिंतन और ध्यान करो ! अब ये भी कोई रोज  रोज समझाने की बात है भला ?

अब बुद्ध ने कहा – आनंद तुम कहते तो ठीक हो की भिक्षु को रोज रोज क्या समझाना की जावो अब अपना २ काम करो ! पर तुमने शायद ध्यान नही दिया की यहाँ धर्म सभा में आस-पास की बस्तियों के भी काफी सारे लोग आते हैं ! और वो शायद पहली बार भी आए हुए हो सकते हैं !  सो उनकी सहूलियत के लिए भी ये जरुरी हो जाता है ! पर आनंद के हाव भाव से महात्मा बुद्ध को ऐसा लगा की वो इस बात से शायद सहमत  नही है !

अब बुद्ध बोले – आनंद अब तुम एक काम करो ! आज  की ही सभा में जितने लोग बैठे थे उनमे एक वेश्या और एक चोर भी प्रवचन सुनने आए थे ! और संन्यासी तो खैर अनेको थे ही ! अब तुम एक काम करना की सुबह इन तीनो ( संन्यासी, वेश्या और चोर ) से जाकर  पूछना की कल रात्री धर्म-सभा में बुद्ध ने जो आखिरी वचन कहे उनसे वो क्या समझे ? अब आनंद के आश्चर्य का कोई ठिकाना नही रहा ! उसको ख़ुद नही मालुम की इतनी बड़ी हजारों की धर्म-सभा में कौन आया और कौन नही आया ? और भगवान् बुद्ध एक एक आदमी को जानते हैं ! और उसे आश्चर्य हुवा की वो कैसे पहचान गए की वो वेश्या है और वो चोर है ! घोर आश्चर्य हुवा आनंद को ! और बुद्ध से उनके नाम पते लेकर मुश्किल में रात्री काटी और सुबह होते ही तहकीकात में लग गया की वाकई वो वही हैं जो बुद्ध ने बताए हैं या बुद्ध आनंद के मजे ले रहे हैं ?

सुबह होते ही आनंद के सामने जो पहला संन्यासी पडा उससे आनंद ने पूछा – आपने रात्री सभा में बुद्ध ने जो आखिरी वचन कहे की अब जाकर अपना २ काम करो ! उन शब्दों से आपने क्या समझा ? भिक्षु बोला – इसमे समझने वाली क्या बात है ? भिक्षु का नित्य कर्म है की अब शयन पूर्व का ध्यान करते २ विश्राम करो ! आनंद को इसी उत्तर की अपेक्षा थी अत: वो अब तेजी से नगर की और चल दिया !

आनंद सीधे चोर के घर पूछते २ पहुँच गया और चोर तो भिक्षु आनंद को देखते ही गद गद हो गया और उनकी सेवा में लग गया ! आनद को बैठाकर उनसे आने का प्रयोजन पूछा ! आनंद ने अपना सवाल दोहरा दिया ! और चोर बड़े ही विनम्र शब्दों में बोला – भिक्षु , अब आपको क्या बताऊँ ? कल रात पहली बार बुद्ध की धर्मसभा में गया और उनके प्रवचन सुन कर जीवन
सफल हो गया ! फ़िर भगवान् ने कहा की अब अपना २ काम करो ! तो मैं तो चोर हूँ अब बुद्ध के प्रवचन सुनने के बाद झूँठ तो बोलूंगा नही ! कल रात मैं वहाँ से चोरी करने चला गया और इतना तगड़ा हाथ मारा की जीवन में पहली बार इतना तगड़ा दांव लगा है की आगे चोरी करने की जरुरत ही नही है ! आनंद को बड़ा आश्चर्य हुवा और वो वहाँ से वेश्या के घर की तरफ़ चल दिया !

वेश्या के घर पहुंचते ही वो तो भिक्षु आनद को देखते ही टप टप प्रेमाश्रु बहाते हुए उनके लिए भिक्षा ले आई और अन्दर आकर बैठने के लिए आग्रह किया ! आनंद अन्दर जाकर बैठ गया और अपना सवाल दोहरा दिया !  वेश्या ने कहना शुरू किया – भिक्षु ये भी कोई पूछने की बात है ? भगवान बुद्ध ने कहा की अब जावो अपना २ काम करो ! सो उनके वचन टालने का तो कोई प्रश्न ही नही है ! मेरा काम तो नाचना गाना है सो वहाँ से प्रवचन सुन कर आने के बाद तैयार हुई और महफ़िल सजाई ! यकीन मानो कल जैसी महफ़िल तो कभी सजी ही नही ! और सारे मेरे ग्राहक जिनमे बड़े २ राजे महाराजे भी थे ! वो इतने प्रशन्न हो के गए
की अपना सब कुछ यहाँ लुटा कर चले गए ! अब मुझे धन के लिए ये कर्म करने की कभी आवश्यकता ही नही पड़ेगी ! बुद्ध की कृपा से एक रात में इतना सब कुछ हो गया !  आनंद बड़ा आश्चर्य चकित हो कर वहाँ से वापस बुद्ध के पास लौट गया !

आनंद ने जाकर बुद्ध को प्रणाम किया और सारी बात बताई ! अब बुद्ध बोले – आनंद .. इस संसार में जितने जीव हैं उतने ही दिमाग हैं ! और बात तो एक ही होती है पर हर आदमी अपनी २ समझ से उसके मतलब निकाल लेता है ! अब तुम समझ ही गए होगे की बात तो एक ही थी पर सबकी समझने की बुद्धि अलग २ थी ! और इसीलिए मैं एक बात को तीन बार कहता हूँ की कोई गलती नही हो जाए पर उसके बाद भी सब अपने हिसाब से ही समझते हैं ! और इसका कोई उपाय नही है ! ये सृष्टि ही ऎसी है !  source

एक महिला ने गौतम बुद्घ से कहा

एक महिला ने गौतम बुद्घ से कहा – मैं आपसे
शादी करना चाहती हूँ”।
गौतम बुद्ध ने पूछा- “क्यों देवी ?
महिला ने जवाब दिया -“क्योंकि मुझे आपके जैसा
ही एक पुत्र चाहिए, जो पूरी दुनिया में मेरा नाम
रौशन करे और वो केवल आपसे शादी
करके ही मिल सकता है मुझे”।
गौतम बुद्ध कहते हैं – “इसका और एक उपाय है”
महिला पूछती है -“क्या”?
गौतम बुद्ध ने मुस्कुराते हुए कहा -“आप मुझे ही अपना
पुत्र मान लीजिये और आप मेरी माँ बन जाइए ऐसे में
आपको मेरे जैसा पुञ मील जायेगा.
महिला हतप्रभ होकर गौतम बुद्ध को ताकने लगी
और रोने लग गयी,
ये होती है महान लोगो की विचार धारा ।
“पूरे समुंद्र का पानी भी एक जहाज को नहीं डुबा
सकता, जब तक पानी को जहाज अन्दर न आने दे।
इसी तरह दुनिया का कोई भी नकारात्मक विचार
आपको नीचे नहीं गिरा सकता, जब तक आप उसे अपने
अंदर आने की अनुमति न दें।”
🙏🏻

गौतम बुद्ध और उनका धम्म

बुद्ध कहते हैं:

“तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो मानना या न मानना बाद की बात है। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यह तुम्हारी ही अंतर्मन का भवन है।”

 

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गौतम बुद्ध वास्तव में कौन हैं, उनकी शिक्षा क्या है, उनका मकसद और उपलब्धि क्या है अदि समझने के लिए उनके बारे में ओशो द्वारा बताई प्रस्तुत  सात प्रमुख बातें जरूर पढ़ें या विडियो सुने |मूल लेख “भगवान् बुद्ध मेरी दृस्टि में – ओशो” वाकई बाबा साहब आंबेडकर को छोड़कर अब तक के सभी भारतीय विद्वानों में बुद्धा को ओशो ने ही सही से समझा पाया है|

नोट: हम ओशो के सभी बातों के लिए समर्थक नहीं किन्तु ओशो जी ने जो भी सही और जायज बात बौद्ध धम्म के लिए कही है हम उसके लिए उनके आभारी हैं

पहली, गौतम बुद्ध दार्शनिक नहीं, द्रष्टा हैं।:   

दार्शनिक वह, जो सोचे। द्रष्टा वह, जो देखे। सोचने से दृष्टि नहीं मिलती। सोचना अज्ञात का हो भी नहीं सकता। जो ज्ञात नहीं है, उसे हम सोचेंगे भी कैसे? सोचना तो ज्ञात के भीतर ही परिभ्रमण है। सोचना तो ज्ञात की ही धूल में ही लोटना है। सत्य अज्ञात है। ऐसे ही अज्ञात है जैसे अंधे को प्रकाश अज्ञात है। अंधा लाख सोचे, लाख सिर मारे, तो भी प्रकाश के संबंध में सोचकर क्या जान पाएगा! आंख की चिकित्सा होनी चाहिए। आंख खुली होनी चाहिए। अंधा जब तक द्रष्टा न बनें, तब तक सार हाथ नहीं लगेगा।

तो पहली बात बुद्ध के संबंध में स्मरण रखना, उनका जोर द्रष्टा बनने पर है। वे स्वयं द्रष्टा हैं। और वे नहीं चाहते कि लोग दर्शन के ऊहापोह में उलझें।
दार्शनिक ऊहापोह के कारण ही करोड़ों लोग दृष्टि को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। प्रकाश की मुफ्त धारणाएं मिल जाएं, तो आंख का महंगा इलाज कौन करे! सस्ते में सिद्धान्त मिल जाएं, तो सत्य को कौन खोजे! मुफ्त, उधार सब उपलब्ध हो, तो आंख की चिकित्सा की पीड़ा से कौन गुजरे! और चिकित्सा कठिन है। और चिकित्सा में पीड़ा भी है।बुद्ध ने बार-बार कहा है कि मैं चिकित्सक हूं। उनके सूत्रों को समझने में इसे याद रखना। बुद्ध किसी सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं कर रहे हैं।

वे किसी दर्शन का सूत्रपात नहीं कर रहे हैं। वे केवल उन लोगों को बुला रहे हैं जो अंधे हैं और जिनके भीतर प्रकाश को देखने की प्यास है। और जब लोग बुद्ध के पास गए, तो बुद्ध ने उन्हें कुछ शब्द पकड़ाए, बुद्ध ने उन्हें ध्यान की तरफ इंगित और इशारा किया। क्योंकि ध्यान से है खुलती आंख, ध्यान से खुलती है भीतर की आंख।विचारों से तो पर्त की पर्त तुम इकट्ठी कर लो, आंख खुली भी हो तो बंद हो जाएगी। विचारों के बोझ से आदमी की दृष्टि खो जाती है। जितने विचार के पक्षपात गहन हो जाते हैं, उतना ही देखना असंभव हो जाता है। फिर तुम वही देखने लगते हो जो तुम्हारी दृष्टियां होती है। फिर तुम वह नहीं देखते, जो है। जो है, उसे देखना हो तो सब दृष्टियों से मुक्त हो जाना जरूरी है।इस विरोधाभास को खयाल में लेना, दृष्टि पाने के लिए सब दृष्टियांे से मुक्त हो जाना जरूरी है। जिसकी कोई भी दृष्टि नहीं, जिसका कोई दर्शनशास्त्र नहीं, वही सत्य को देखने में समर्थ हो पाता है।

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गौतम बुद्ध के कुछ प्रमुख सूत्र

गौतम बुद्ध प्रज्ञा पुरुष थे। उन्होंने धर्म को पारंपरिक स्वरूप से मुक्त कराकर उसे ज्ञान की तलाश से जोड़ा। उन्होंने विवेक को धर्म के मूल में रखा और तमाम रुढ़ियों को खारिज किया। उन्होंने ज्ञान को सर्वोच्च महत्व दिया और उनके इन विचारों की प्रासंगिकता आज भी है।

  • पुष्प की सुगंध वायु के विपरीत कभी नहीं जाती लेकिन मानव के सदगुण की महक सब ओर फैलती है।
  • तीन चीजों को लम्बी अवधि तक छुपाया नहीं जा सकता, सूर्य, चन्द्रमा और सत्य।
  • हजार योद्धाओं पर विजय पाना आसान है, लेकिन जो अपने ऊपर विजय पाता है वही सच्चा विजयी है।
  • हमारा कर्तव्य है कि हम अपने शरीर को स्वस्थ रखें, अन्यथा हम अपने मन को सक्षम और शुद्ध नहीं रख पाएंगे।
  • हम आपने विचारों से ही अच्छी तरह ढलते हैं, हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं। जब मन पवित्र होता है तो खुशी परछाई की तरह हमेशा हमारे साथ चलती है।
  • हजारों दीपों को एक ही दिए से, बिना उसके प्रकाश को कम किए जलाया जा सकता है। खुशी बांटने से कभी कम नहीं होती।
  • अप्रिय शब्द पशुओं को भी नहीं सुहाते हैं।
  • अराजकता सभी जटिल बातों में निहित है। परिश्रम के साथ प्रयास करते रहो।
  • आप को जो भी मिला है उसका अधिक मूल्यांकन न करें और न ही दूसरों से ईर्ष्या करें। वे लोग जो दूसरों से ईर्ष्या करते हैं, उन्हें मन को शांति कभी प्राप्त नहीं होती।
  • अतीत पर ध्यान केंद्रित मत करो, भविष्य का सपना भी मत देखो, वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करो।
  • आप चाहे कितने भी पवित्र शब्दों को पढ़ लें या बोल लें, लेकिन जब तक उन पर अमल नहीं करते उसका कोई फायदा नहीं है।इच्छा ही सब दु:खों का मूल है।
  • जिस तरह उबलते हुए पानी में हम अपना, प्रतिबिम्ब नहीं देख सकते उसी तरह क्रोध की अवस्था में यह नहीं समझ पाते कि हमारी भलाई किस बात में है।
  • चतुराई से जीने वाले लोगों को मौत से भी डरने की जरुरत नहीं है।
  • वह व्यक्ति जो 50 लोगों को प्यार करता है, 50 दुखों से घिरा होता है, जो किसी से भी प्यार नहीं करता है उसे कोई संकट नहीं है।

– डॉ. निखिलेश शास्त्री  (source)

 

 

आप दीपक बनो

भगवान बुद्ध जब मृत्युशय्या पर अंतिम सांसें गिन रहे थे कि किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। गौतम बुद्ध ने अपने नजदीक बैठे शिष्य आनंद से पूछा, ‘आनंद कौन रो रहा है।’

आनंद ने कहा, ‘भंते! भद्रक आपके अंतिम दर्शन के लिए आया है।’ बुद्ध ने कहा, ‘तो उसको मेरे पास बुला लो। आते ही भद्रक फूट-फूट कर रोने लगा, उसने कहा आप नहीं रहेंगे तो हमें ज्ञान का प्रकाश कौन दिखाएगा।’

बुद्ध ने भद्रक से कहा, ‘भद्रक प्रकाश तुम्हारे भीतर है, उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। जो अज्ञानी है इसे देवालयों, तीर्थों, कंदराओं या गुफाओं में भटकते हुए खोजने का प्रयत्न करते हैं। वे अंत में निराश होते हैं। इसके विपरीत मन, वाणी और कर्म से एकनिष्ठ होकर जो साधना में निरंतर लगे रहते हैं।’

उनका अंतः करण स्वयं दीप्त हो उठता है। इसलिए भद्रक, ‘आप दीपक बनो।’ यही मेरा जीवनदर्शन है जिसे मैं आजीवन प्रचारित करता रहा।