आरक्षण की गेंद

सरकार ने आरक्षण की बाबत एक अहम फैसला किया है। इस फैसले के तहत नेशनल कमीशन फॉर सोशियली ऐंड एजुकेशनली बैकवर्ड क्लासेस यानी राष्ट्रीय सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ा वर्ग आयोग (एनएसईबीसी) का गठन होगा, जो मौजूदा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की जगह लेगा। पहले भी, आरक्षण का आधार सामाजिक व शैक्षिक पिछड़ापन ही था, और जैसा कि खुद नाम से जाहिर है, नए आयोग के गठन के बाद भी वही होगा। इसमें कुछ गलत नहीं है, संविधान में भी और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में भी आरक्षण की बाबत यही नीति और नजरिया मान्य है। केंद्र सरकार के ताजा निर्णय में अगर कुछ नया है, तो एक यह कि इसके जरिए उसने आरक्षण की गेंद संसद के पाले में डाल दी है। दूसरे, प्रस्तावित एनएसईबीसी को संवैधानिक दर्जा दिया जाएगा, जैसा कि अनुसूचित जाति आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग को हासिल है।

पर यह दर्जा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को प्राप्त नहीं था। सवाल है कि सरकार के इस फैसले से आरक्षण को लेकर क्या फर्क पड़ेगा? सबसे खास बात यह होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर किस जाति को पिछड़े वर्ग में रखा जाए और किसे बाहर किया जाए, इसका फैसला केंद्र सरकार के बजाय संसद करेगी। एनएसईबीसी का एक अध्यक्ष होगा और एक उपाध्यक्ष, और तीन अन्य सदस्य होंगे। नागरिकों के किसी समूह को पिछड़े वर्ग में शामिल करना है या उससे बाहर करना है इस बारे में प्रस्तावित आयोग केंद्र सरकार को अपनी सिफारिश भेजेगा। आयोग की सलाह अमूमन केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी होगी। मगर इस बाध्यकारिता का कोई ज्यादा मतलब नहीं होगा, क्योंकि फैसला अंतत: संसद करेगी। अलबत्ता यह जरूर कहा जा सकता है कि निर्णय संसद में होने का व्यावहारिक अर्थ यह होगा कि सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन की भूमिका उसमें अहम होगी।

लेकिन जब ओबीसी आरक्षण के लिए जाट आंदोलन जैसी उलझन में डाल देने वाली स्थिति होगी, तो सरकार पल्ला झाड़ते हुए कह सकेगी कि हमारे हाथ बंधे हुए हैं, फैसला हमें नहीं संसद को करना है। पटेल औरकापु जैसी कई और ताकतवर जातियां भी आरक्षण मांग रही हैं। उनकी सियासी ताकत को देखते हुए, क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि संसद उनकी मांग पर सिर्फ सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के कोण से विचार करेगी? दूसरे, क्या इस बात की भी आशंका नहीं है कि कोई ऐसा समुदाय, जो संख्याबल में कमजोर हो और राजनीतिक नफे-नुकसान के लिहाज से ज्यादा मायने न रखता हो, उसके आवेदन या उसकी शिकायत को नजरअंदाज कर दिया जाए? आरक्षण को लेकर उभरने वाले विवादों के पीछे दो सबसे बड़ी वजहें हैं।

एक यह कि मांग की तुलना में रोजगार के नए अवसर बहुत कम पैदा हो रहे हैं। दूसरे, संगठित क्षेत्र की नौकरियों के बरक्स असंगठित क्षेत्र के रोजगार में पैसा भी बहुत कम मिलता है और असुरक्षा भी ज्यादा होती है। खेती के लगातार घाटे का धंधा बने रहने तथा अन्य स्व-रोजगार में अस्थिरता व दूसरी मुश्किलों के चलते सरकारी नौकरी सबका सपना हो गई है। यही कारण है कि जाट, पटेल और कापु जैसे समुदाय, जो कभी अपनी आत्मछवि पिछड़े के तौर पर नहीं देखते थे, अब आरक्षण के लिए आसमान सिर पर उठा लेते हैं। कोई भी पार्टी वोट के नुकसान के डर से आरक्षण की अनुचित मांग के खिलाफ मुंह नहीं खोलती। ऐसे में, संसद में सियासी समीकरणों से ऊपर उठ कर विचार होगा, इसकी ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती।

OBC आयोग को मिलेगा संवैधानिक दर्जा; संसद के पास होगा आरक्षण देने का अधिकार

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गुजरात के दलितों का मुद्दा संसद में गूँजा

गुजरात में दलितों की पिटाई के बाद वहां दलित समुदाय में भारी गुस्सा है और बुधवार को बुलाए गए गुजरात बंद के दौरान कुछ जगहों पर हिंसा की घटनाएँ हुई हैं.

ये मुद्दा संसद में भी गूंजा है. राज्यसभा में बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के सांसदों ने इस मुद्दे पर तत्काल बहस की मांग की है. राज्यसभा को कुछ देर के लिए स्थगित भी करना पड़ा है.

बसपा प्रमुख मायावती ने संसद के बाहर कहा, ”दलितों से जुड़ा कोई भी मामला जब बसपा उठाती है, तो आपस में मिले हुए कांग्रेस, भाजपा उस पर राजनीति करने लगते हैं.”

दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत ने संसद के बाहर कहा कि गुजरात सरकार ने मामला सामने आने के बाद तत्काल कड़ी कार्रवाई की है लेकिन विपक्ष न दो संसद में व्यवस्थित ढंग अपनी बात रखना चाहता है और ही सरकार की बात सुनना चाहता है.

उधर गुजरात से पत्रकार प्रशांत दयाल ने बताया है कि सौराष्ट्र में अमरोली, भावनगर, जूनागढ़ और राजकोट ज़िलों में बंद के दौरान बसों पर पथराव हो रहा है स्कूल कॉलेज बंद हैं.

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जूनागढ़ और अहमदाबाद में भी स्कूल कॉलेज बंद कराए गए हैं क्योंकि सरकारी बसों और दफ़्तरों को निशाना बनाया जा रहा है.

ये मुद्दा तब शुरू हुआ जब ग्यारह जुलाई को वेरावल ज़िले के ऊना में कथित गो रक्षकों ने जानवर की खाल उतार रहे चार दलितों की बेरहमी से पिटाई की थी.

इस घटना का वीडियो वायरल हो गया था.

इसके बाद भड़के प्रदर्शनों में पथराव हुए थे जिनमें एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई. विरोध प्रदर्शनों के दौरान 16 दलितों ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी.

इनमें से एक युवक की मौत हो गई है. हालांकि प्रशासन का कहना है कि मृत व्यक्ति ने व्यक्तिगत कारणों से ज़हर खाया था. लेकिन दलित संगठन प्रशासन के दावों को नकार रहे हैं.

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल Image 

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल इस मामले में जांच के आदेश दे चुकी हैं. वो पीटे गए दलित युवकों से मिलने ऊना पहुंच गई हैं.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी 21 जुलाई को और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल का 22 जुलाई को इन पीड़ितों से मिलने का कार्यक्रम है.

अमरेली में मंगलवार को दलितों के प्रदर्शन में हुई पत्थरबाज़ी में एसपी रैंक के एक अधिकारी समेत छह पुलिसकर्मी घायल हुए थे.

गुजरात में आंदोलन करते दलित.Image 

मुख्यमंत्री ने मंगलवार को एक ट्वीट कर बताया था कि ऊना की घटना के संबंध में अब तक 16 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है.

इन लोगों पर अपहरण, लोगों को बंधक बनाने और एसएसी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है.

 

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आज नवभारत टाइम्स के संपादकीय पन्ने पर

भारत टीना डाबी, आद्या मदी, रिंकू राजगुरु और इरा सिंघल का ही देश बने. किसी को डेल्टा मेघवाल, जीशा या रोहित वेमुला न बनना पड़े.

आमीन!

‘महिषासुर’ दलितों का हीरो था: बीजेपी सांसद

'महिषासुर' दलितों का हीरो था: बीजेपी सांसद

 

 

संसद के बजट सत्र के दौरान दानव ‘महिषासुर’ को लेकर बड़ा बवाल हो गया है. राज्यसभा में कल स्मृति ईरानी नेदेवी दुर्गा के अपमान और महिषासुर दिवस को लेकर राहुल गांधी पर हमला बोला. कांग्रेस ने स्मृति ईरानी के बयान पर आपत्ति जताते हुए जमकर हंगामा किया. खुलासा हुआ है कि 2013 में महिषासुर दिवस कार्यक्रम में बीजेपी के सांसद उदित राज शामिल हुए थे.

जिस महिषासुर को लेकर संसद में हंगामा मचा है और आज कांग्रेस ने संसद ठप करने की धमकी दी है. उसको लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है. जेएनयू में महिषासुर शहादत दिवस मनाने वालों को राहुल गांधी के समर्थन पर स्मृति ईरानी ने सवाल उठाए थे उसी महिषासुर शहादत दिवस के एक कार्यक्रम में बीजेपी के सांसद उदित राज भी शामिल हुए थे. उदित राज 2013 में महिषासुर पर हुए कार्यक्रम में पहुंचे थे.

ABP न्यूज से बातचीत में उदित राज ने माना है कि वो महिषासुर की शहादत के कार्यक्रम में गए थे. उदित राज ने आंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि वो भी मानते हैं कि महिषासुर दलितों का हीरो थे.

अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ के हवाले से खबर है कि दिल्ली से बीजेपी के सांसद उदित राज अक्टूबर 2013 में महिषासुर दिवस कार्यक्रम में शामिल हुए थे. अखबार के मुताबिक उदित राज ने महिषासुर दिवस कार्यक्रम में शामिल होने की बात मानी भी है. 2013 में उदित राज बीजेपी में नहीं थे, 2014 में पार्टी ज्वाइन की थी.

इससे पहले कल हंगामे के कारण स्मृति ईरानी का बयान पूरा होने से पहले ही सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी थी. कांग्रेस ने इस मुद्दे पर कल संसद नहीं चलने देने का एलान भी कर दिया है.लोकसभा-राज्यसभा में महिषासुर मुद्दे का बार-बार जिक्र करने पर कांग्रेस ने स्मृति ईरानी को घेरा था. साथ ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री से माफी की मांग की थी.

सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा सरकार महिषासुर मुद्दे पर राजनीति कर रही है. स्मृति ने परसों और कल जेएनयू में कुछ छात्रों द्वारा जेएनयू के अंदर देवी दुर्गा के अपमान और महिषासुर दिवस मनाए जाने का जिक्र किया था.

 

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बाबा साहब कहते थे जाति व्यवस्था है मानसिक रोग

बसपा सुप्रीमो मायावती ने लखनऊ से बयान जारी करके कहा, बाबा साहब कहते थे, जाति व्यवस्था एक मानसिक रोग है। ये अंतरजातीय खान-पान या एक-दो अंतर्जातीय शादियां हो जाने से खत्म हो जाने वाली नहीं है।

बाबा साहब के मुताबिक हिंदूत्व आधारित शिक्षाएं इसकी मुख्य वजह हैं। कड़वी चीज को कभी मीठा नहीं बनाया जा सकता। किसी चीज का स्वाद तो बदला जा सकता है लेकिन जहर को अमृत नहीं बनाया जा सकता। बहनजी ने कहा, जातिवादी उत्पीड़न की वजह से हैदराबाद के छात्र रोहित ने आत्महत्या की है, ये मामला अभी शांत भी नहीं हुआ और देश के उच्च संवैधानिक पद पर बैठी महिला के बयान ने आग में घी का काम किया है।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने मोदी सरकार को याद दिलाया की बीते दिनो संसद और राज्यसभा में स्मृति ईरानी द्वारा रोहित को लेकर जो बयान बाजी की गई वो सब महज एक छलावा हैं जिस तरह से रोहित की मौत को दबाया जा रहा हैं वो सब एक मोदी सरकार द्वारा पुराना हथकंडा हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती ने नरेंद्र मोदी पर एक बार फिर निशाना साधा और कहा कि अगर रोहित को न्याय न मिला तो माना जाएगा कि रोहित की मौत पर उनका भावुक होना नाटकबाजी थी और उनके आंसू घड़ियाली आंसू थे।
बता दें क‌ि बीते द‌िनों लखनऊ आए नरेंद्र मोदी छात्र रोह‌ित की आत्महत्या का ज‌िक्र करके भावुक हो गए थे। उन्होंने कहा जिस देश में जन्म के आ‌धार पर जातिवादी व्यवहार किया जाता हो वहां इसके सं‌वैधानिक निदान को खत्म करने की बात करना अन्याय है। ऐसा करना शोषण, उत्पीड़न और अन्याय को बढ़ावा देना होगा।

 

अफजल गुरु नहीं, रोहित वेमुला मेरा आदर्श है: कन्हैया

जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने आज शुक्रवार दोपहर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर फिर मोदी सरकार पर हमला किया। देशद्रोह के आरोपी कन्हैया जेल से बाहर आने के बाद दूसरी बार लोगों से मुखातिब होते हुए कहा कि जेएनयू को बदनाम करने की साजिश रची गई। कन्हैया ने कहा कि मेरा आदर्श अफजल गुरु नहीं, बल्कि रोहित वेमुला है। जेएनयू लोकतंत्र के साथ खड़ा होने वाला एतिहासिक संस्थान है। जेएनयू से पढ़ने वाला कभी देशद्रोही नहीं हो सकता।

अफजल गुरु पर पूछे गए सवाल के जवाब में कन्हैया ने कहा कि अफजल गुरु इस देश का नागरिक था। वह अखंड भारत के हिस्से जम्मू-कश्मीर का निवासी था। उसे भारतीय कानून के मुताबिक सजा दी गई थी। मेरे लिए अफजल गुरु आइकन नहीं है, रोहित वेमुला है। कन्हैया ने कहा कि तुम कितने रोहित मारोगे, घर घर रोहित निकलेगा।

अफजल गुरु नहीं, रोहित वेमुला मेरा आदर्श है: कन्हैया

जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने आज शुक्रवार दोपहर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर फिर मोदी सरकार पर हमला किया। कन्हैया ने कहा कि मेरा आदर्श अफजल गुरु नहीं, बल्कि रोहित वेमुला है।

आरक्षण के रण पर बेबाक बोल: हक-बंदी

 

भारतीय जनता पार्टी की सरकार में आरक्षण के मुद्दे पर सब कुछ ठीक नहीं है। हरियाणा महज इसका ताजा उदाहरण है। इसका कड़वा स्वाद पार्टी हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में चख चुकी है। लेकिन सबक सीखने का शायद भाजपा में रिवाज नहीं है। पिछले एक साल से भी ज्यादा समय में जो भी विवाद हुए उनसे पार्टी ने शायद ही कभी उबरने की कोशिश की हो, ज्यादातर मामलों में हठधर्मिता ही दिखाई है। यही हाल उसकी हरियाणा की राज्य सरकार का भी है। हरियाणा में भी केंद्र की तर्ज पर ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे मनोहर लाल खट्टर की अगुआई में सरकार बनाई गई जो गठन के बाद अपने ही फैसलों के जाल में उलझती चली गई। नतीजा यह रहा कि राज्य में उबाल आ गया और समुदायों के बीच जातीय आधार पर एक विभाजक रेखा खिंच गई। खट्टर के साथ विडंबना यह रही कि एक साल में उनके राजनीतिक समर्थकों और चुनिंदा ‘अपने’ नौकरशाहों ने उन्हें राज्य और उसकी नब्ज को पहचानने की नौबत ही नहीं आने दी। खुद मुख्यमंत्री भी ‘स्वयंसेवकों’ के भरोसे रहे। आरक्षण पर जो कुछ राज्य में हुआ वह अचानक नहीं था, वरन उसकी भूमिका पहले से बन रही थी। लेकिन खट्टर को जमीन से जुड़ने का मौका ही नहीं दिया गया। उनके अपने मंत्रियों ने उनसे सहयोग नहीं किया और उनकी खुफिया एजंसियां भी ऐतिहासिक नाकामी दिखा गर्इं। दहकती आग में घी डालने के लिए प्रदेश में कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोकदल तो थे ही। यही वजह रही कि हालात समझ में आने से पहले ही बेकाबू हो गए। लेकिन केंद्र की चिंता उससे कहीं आगे है। एक उग्र प्रदर्शन के आगे घुटने टेकने की जो फजीहत झेलनी पड़ रही है वह अलग और इस मामले में जो एक अनचाहा रास्ता निकालना पड़ा वह अलग। देश की सरकार तीन दिन तक इस प्रदर्शन का दमन करने का रास्ता खोजती रही और उसमें देश के जेम्स बांड का दर्जा पा चुके सुरक्षा सलाहकार से लेकर सेना और केंद्रीय गृह मंत्रालय के आला पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे। लेकिन हल कोई नहीं और अंत में प्रचंड बहुमत से बनी एक सर्वशक्तिमान सरकार को मिमियाते हुए समर्पण करना पड़ा। राज्य सरकार की अकर्मण्यता तो शायद फिर भी अपने लिए कोई सफाई ढूंढ़ ले लेकिन केंद्र के धुरंधर इससे कैसे बचाव का रास्ता तलाश करेंगे, यह देखने की बात होगी। जाटों को आरक्षण के मामले में पहले राज्य सरकार और बाद में केंद्र सरकार जाट नेताओं को वस्तुस्थिति समझाने में नाकाम रही। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने तो जाटों को आरक्षण देना मान ही लिया था। उससे पहले केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने जाटों को आरक्षण के नाम पर राजस्थान में वोट लूट लिए थे और अपनी सरकार जमा ली थी। राजस्थान में भाजपा को इसका भारी फायदा मिला। हरियाणा में जाटों ने आरक्षण लेने के लिए क्या-क्या नहीं किया!

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रद्द होगा मारपीट के दोषी वकीलों का रजिस्ट्रेशन

पटियाला हाउस कोर्ट में बुधवार को हुए वकीलों के हंगामे और मारपीट के मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष ने माफी मांगी है। इसके साथ ही उन्होंने इस मामले में शामिल वकीलों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की भी बात कही है। बार काउंसिल अध्यक्ष ने कहा कि पटियाला हाउस कोर्ट में जो हुआ वह शर्मनाक है। घटना में जो भी वकील शामिल थे उनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाएगा।
बुधवार को हुए हंगामे पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की है। कोर्ट ने कहा कि मामले को लेकर जिस तरह अव्यवस्था और बवाल जारी है उससे कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चिंता है।कोर्ट ने जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के विरोध में पैरवी कर रहे वकीलों को भी निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने कहा, ‘बिना वजह के बयान देकर माहौल न बिगाड़ें.’ कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की है जब एक वकील ने सुनवाई के दौरान बताया कि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर ने कन्हैया की पेशी से पहले बयान दिया था कि वे उसकी जमानत याचिका का विरोध नहीं करेंगे।
पटियाला हाउस कोर्ट में प्रदर्शन करने वाले वकीलों का समर्थन कर रहे वकील आरपी लूथरा ने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे चेलमेस्वर की बेंच के सामने एक एप्लीकेशन देकर कहा था कि कन्हैया की जमानत याचिका का विरोधी न करने संबंधी बयान देकर दिल्ली पुलिस ने लोगों के गुस्से को भड़काने का काम किया था. जिसके बाद कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति ऐसे बयान न दे जिससे माहौल खराब हो।
Team NewsPoint360

 

रोहित वेमुला के पिता ने अनुग्रह राशि ठुकराई

रोहित वेमुला के पिता ने पूछा, पीएम मोदी 5 दिनों तक कुछ क्यों नहीं बोले? अनुग्रह राशि ठुकराई

 

छात्रावास में कथित तौर पर खुदकुशी करने वाले दलित छात्र रोहित वेमुला के परिजनों ने शनिवार को हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी की तरफ से की गयी अनुग्रह राशि की पेशकश को ठुकरा दिया। इतना ही नहीं उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की आलोचना भी की। उन्होंने पूछा कि जवाब देने में उन्हें पांच दिन का समय क्यों लग गया।

गौरतलब है कि लखनऊ में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला के खुदकुशी मामले पर दुख व्यक्त करते हुए कहा था कि वे रोहित के परिवार की पीड़ा को समझते हैं। पीएम मोदी ने भारी मन से कहा कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, एक मां ने अपना बेटा खोया है। इस बात को कहते हुए पीएम मोदी भावुक हो गए थे। इस दौरान वे थोड़ी देर तक चुप रहे। उन्होंने कहा था कि मां भारती ने अपना एक लाल खोया है।

पीटीआई के अनुसार रोहित के पिता ने कहा, ‘प्रधानमंत्री ने कहा है कि वह (रोहित) भारत मां का बेटा था। मैं उनके (पीएम) बारे में कुछ भी कहने में समर्थ नहीं हूं। लेकिन वे पांच दिनों तक कुछ क्यों नहीं बोले?’

परिसर पहुंची वेमुला की मां राधिका, बहन नीलिमा और भाई राजू ने मांग की कि रोहित की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों पर मामला दर्ज किया जाए।

नीलिमा ने कहा, ‘एचसीयू, जहां उसकी मौत हुई, यदि वह हमें आठ लाख नहीं बल्कि आठ करोड़ रुपये भी देगी, तो वो भी मंजूर नहीं।’ गौरतलब है कि एचसीयू ने गुरुवार को रोहित के परिवार को आठ लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की थी।

उन्होंने कहा, ‘स्मृति ईरानी..पांच दिन के बाद उन्होंने कॉल किया। पांच दिन क्यों लगा? आप भी एक औरत हैं..आप भी एक मां हैं ..:परिवार को फोन करने और मौत पर शोक जताने में पांच दिन लग गए।’

उन्होंने कहा, ‘मैं जानना चाहती हूं क्यों उसकी मौत हुई। उसे मारा गया या उसकी मौत हुई? उसे क्यों निलंबित किया गया? जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार कर दंडित किया जाना चाहिए। केवल यही चीज मुझे चाहिए।’

 

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मद्रास हाईकोर्ट के जज करनन ने कहा- भारत में पैदा होने पर शर्मिंदा हूं

जस्टिस सीएस करनन।

मद्रास हाईकोर्ट के जज सीएस करनन ने विवादित बयान दिया है। मद्रास हाईकोर्ट से कलकत्ता हाईकोर्ट ट्रांसफर किए जाने से नाखुश करनन ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘मुझे निशाना बनाया गया क्योंकि मैं दलित हूं। मैं शर्मिंदा हूं कि मेरा जन्म भारत में हुआ है। मैं ऐसे देश में जाना चाहता हूं जहां जातिप्रथा न हो।’ बता दें कि जस्टिस जगदीश सिंह केहर और आर भानुमति की डिविजन बेंच ने सोमवार को यह आदेश दिया कि जस्टिस करनन को कोई भी केस न दिया जाए। इस पर विवादित जज ने सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों के खिलाफ एससी/एसटी (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटी) एक्ट के तहत FIR दर्ज कराएंगे। ट्रांसफर का आदेश पर करनन ने क्या कहा…

– कोर्ट के निर्देश से पहले जस्टिस करनन ने सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जारी किए गए उनके ट्रांसफर के आदेश पर खुद ही स्टे लगा दिया। करनन ने ट्रांसफर करने के लिए CJI टीएस ठाकुर से लिखित सफाई भी मांगी।
– सुप्रीम कोर्ट के उन्हें केस दिए जाने पर रोक लगाए जाने पर करनन का कहना है, ‘मेरा ज्यूडिशियल पावर अब भी मेरा पास है।’
– जज ने कहा, ‘मैं इस मामले में खुद संज्ञान लेते (सुओ-मोटो) चेन्नई पुलिस कमिश्नर को निर्देश दूंगा कि वे एफआईआर दर्ज कराएं।’
– करनन ने मद्रास हाईकोर्ट के सीनियर जज, चीफ जस्टिस संजय कौल पर प्रताड़ना और अपमान करने के मामले में केस दर्ज करने की धमकी देने का आरोप लगाया था।
– गौरतलब है कि पिछले हफ्ते CJI की अध्यक्षता वाले एक पैनल ने जस्टिस करनन का मद्रास हाई कोर्ट से कोलकाता हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने लिया एक्शन
– अपने ट्रांसफर पर खुद स्टे लगाने वाले करनन को लेकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया टीएस ठाकुर की अगुवाई वाली बेंच ने निर्देश दिया है कि उन्हें किसी भी तरह का कोई केस नहीं सौंपा जाए।

जस्टिस करनन ने कहा- मेरा ट्रांसफर सिफारिशी आदेश

– जस्टिस करनन ने अपने ट्रांसफर के फैसले पर चीफ जस्टिस को लिखा- योर लॉर्डशिप, मैं अनुरोध करता हूं कि आप अपने सहयोगियों के माध्यम से 29 अप्रैल तक अपना लिखित स्टेटमेंट भी सबमिट करें। तब तक मेर ट्रांसफर आदेश पर स्टे लगाना ठीक रहेगा।

– उन्होंने अपने ट्रांसफर ऑर्डर को अस्थायी ‘सिफारिश आदेश’ करार देते हुए लिखा- सीजेआई को उनके न्यायाधिकार में दखल नहीं देना चाहिए। क्योंकि मैं योग्यता के आधार के एक आदेश को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में हूं।

कोलेजियम ने की है बड़ी संख्या में हाईकोर्ट जजों के ट्रांसफर की सिफारिश

– सूत्रों के मुताबिक NJAC (नेशनल ज्यूडिशियल अपाइंटमेंट कमीशन) को रद्द करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम ने बड़ी संख्या में हाई कोर्ट जजों के ट्रांसफर की सिफारिश की है।
– यह सिफारिश ज्यूडिशियरी में करप्शन , भाई भतीजावाद की बढ़ती शिकायतों के बाद की गई है।
– ट्रांसफर लिस्ट दिल्ली, कर्नाटक, मद्रास और आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट के जजों के नाम हैं।
– बताया जा रहा है कि इनमें विवादों में रहे मद्रास हाई कोर्ट के जज जस्टिस सीएस करनन का भी नाम शामिल है।
– उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ अवमानना के मामले की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया था।
– CJI की अगुवाई में SC के कोलेजियम ने इन तबादलों की सिफारिश सरकार से कर दी है।

इस गांव में ‘दलित’ लिखा देख फेंक देते हैं बीपीएल कार्ड

राशन कार्ड होने के बावजूद दलितों को पिछले 10 सालों से नहीं मिला राशन।

 

बुंदेलखंड में दलित होना आज भी किसी सजा से कम नहीं है। इसकी ताजा बानगी मऊरानीपुर गांव में देखने को मिली। यहां उनकी जाति की वजह से भेदभाव किया जाता है। आलम यह है कि दलितों को पिछले 10 साल से बीपीएल कार्ड के तहत राशन भी नहीं मिला है। कार्ड पर उनकी जाति देखकर ही उन्हें भगा दिया जाता है। यही नहीं, जॉब कार्ड होने के बावजूद उन्हें काम नहीं मिलता है।
झांसी से करीब 65 किमी दूर मऊरानी नाम का गांव है। चार हजार की आबादी वाले इस बड़ागांव को कई हिस्सों में बांटा गया है। यहां दलितों की भी अलग टोली है, जिनकी आबादी 1500 से ज्यादा है। गांव में दलितों के साथ बड़े पैमाने पर भेदभाव किया जाता है।
दलित होने की वजह से नहीं मिलता राशन
दलित मोहनलाल बताते हैं कि उनका राशन कार्ड 2005 में बना था, जिस पर जाति वाले कॉलम में उनकी जाति ‘चमार’ लिखी हुई है। बस, इसी वजह से उन्हें राशन नहीं मिलता है। गांव के अन्य दलितों का भी यही हाल है। बता दें कि बीपीएल कार्ड पर चावल और गेहूं बेहद कम दरों पर मिलता है, लेकिन दलितों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है।
123 लोगों के ही बने हैं बीपीएल कार्ड
गांव में ज्यादातर दलित किसान हैं और बेहद तंगी में जिंदगी बसर कर रहे हैं। इनमें से सिर्फ 123 लोगों के ही बीपीएल कार्ड बने हैं। इस कार्ड के आधार पर सात रुपए के हिसाब से 15 किलो गेहूं और 10 किलो चावल मिलना तय हुआ है, लेकिन दलितों को कुछ नहीं दिया जाता है। दलित बताते हैं कि सवर्ण जाति की सांठ-गांठ से उनके एपीएल कार्ड बना दिए गए हैं।
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राजनाथ सख्त, ‘देशविरोधी नारे लगाने वालों को माफ नहीं करूंगा’

जेएनयू में संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी मनाने को लेकर पैदा हुए विवाद पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ा रुख अपनाया है। राजनाथ सिंह ने कहा है कि देश में रहकर राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वालों को किसी भी सूरत में माफ नहीं किया जाएगा। राजनाथ सिंह के मुताबिक इस मामले में उन्होंने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को कहा कि वो दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करें। उन्होंने कहा कि देशविरोधी काम करने वालों से सरकार सख्ती से निपटेगी।

राजनाथ ने कहा कि जो देश में रहकर भारत विऱोधी नारे लगाता है,  भारत की एकता अखंडता पर सवालिया निशान लगाता है उसे किसी भी सूरत में माफ नहीं किया जाएगा।  पुलिस कमिश्नर दिल्ली को निर्देश दिए गए हैं कि कठोर कारर्वाई होनी चाहिए और होगी। ये दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसे नारे लगाने वालों को माफ नहीं करूंगा। वहीं स्मृति ईरानी ने कहा कि भारत मां का अपमान राष्ट्र कभी सह नहीं सकता।

बता दें कि इस मामले में दिल्ली से बीजेपी सांसद महेश गिरि ने देशद्रोह का केस दर्ज कराया है। महेश गिरि ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि वो जेएनयू के कुलपति को कार्यक्रम के आयोजकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दें। वहीं, एबीवीपी ने इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है।

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