सौहार्द की विरासत – jansatta.com

सौहार्द की विरासत

सहारनपुर में महाराणा प्रताप जयंती कार्यक्रम से जो जातिवादी संघर्ष शुरू हुआ, उसने करोड़ों हृदयों को दुखी किया है। महाराणा प्रताप के पितामह राणा सांगा (संग्राम सिंह), उनकी पत्नी रानी रत्नकुवरी झाली और पुत्रवधू मीराबाई संत शिरोमणि रविदास के शिष्य थे। उनके आग्रह पर संतजी के जीवन के अंतिम बारह वर्ष चित्तौड़गढ़ के किले में बीते। वहीं उन्होंने अपना शरीर त्यागा। ‘रविदास की छतरी’ नाम से उनकी समाधि चित्तौड़ दुर्ग में ही है। मीरा के कुंभ श्याम मंदिर के परिसर में ही वह स्थित है। महाराणा प्रताप भी उस पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते थे। आज इन दोनों तेजस्वी महापुरुषों के वंशज-अनुयायी एक दूसरे पर हमला करें- इससे बढ़ कर संतापकारी बात क्या हो सकती है! रविदासजी ने कहा है- ‘रविदास न जाति पूछिए, अरे का जाति अरु पाती / ब्राह्मण-खत्री-वैस-सूद्र, सबह इक ही जाति।’
संपूर्ण हिंदू समाज को एक जाति मानने वाले हमारे महापुरुषों की आत्माओं को इस आपसी लड़ाई से मर्मांतक कष्ट हो रहा होगा। तत्काल रोकिये इसे।
’अजय मित्तल, मेरठ
किसलिए जश्न
केंद्र सरकार जिस तरह अपने कार्यकाल की तीसरी वर्षगांठ मना रही है उससे कुछ सवाल भी खड़े होते हैं। मसलन, आखिर इन तीन सालों में सरकार ने जनता के हित में क्या काम किया है? नोटबंदी के दौरान जनता ने इस उम्मीद में परेशानी झेली कि आगे इसका फायदा होगा। लेकिन वह फायदा कहीं दिख नहीं रहा है। महंगाई में भी कोई कमी नहीं आ रही है। विदेशों से काला धन वापस लाने के मोर्चे पर सरकार फेल हुई है। अगर आंतरिक सुरक्षा की बात की जाए तो देश में कई आतंकवादी घटनाओं ने सरकार की विफलता को उजागर किया है। रोजगार के मोर्चे पर भी सरकार बिल्कुल फिसड््डी साबित हो रही है।
ऐसे में सरकार को जश्न मनाने के बजाए कोशिश करनी चाहिए कि आने वाले दिनों में महंगाई, सुरक्षा, बेरोजगारी जैसे मुददों पर ध्यान केंद्रित कर तमाम समस्याओं का समाधान करे, वरना यह जनता है, सब कुछ जानती है।
’हिफजुर रहमान रिंकु, बैदा शेरघाटी, गया

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ऐसे थे हमारे साहेब काँशीराम जी

👏👏 *कांशीराम साहब का समाज के प्रति समर्पण भावना, लगन, निष्ठा तथा परिश्रमी स्वभाव का लोहा हर कोई मानता है।वे शुरू से ही कहा करते थे,’इस शरीर से जितना काम लेना हो ले लेना चाहिए, बाद में तो यह मिट्टी में ही मिलना है।अपनी साईकिल यात्रा के दौरान साहब कहा करते थे मेरे प्रत्येक कार्यकर्ता को प्रतिदिन20किलोमीटर पैदल या साईकिल पर चलना चाहिए और इस परिधि में पड़ने वाले प्रत्येक बहुजन से संपर्क करते हुए उसे आंबेडकरी मिशन की रुपरेखा बतानी चाहिए।चाहे चिलचिलाती धुप हो, चाहे थिकुरते जाड़े और चाहे मूसलाधार बारिश हो।साहब कभी रुके नही, झुके नही।बाहर मौसम की भयानक मार पड़ रही होती और साहब कहते नेचर अपना काम कर रही है और हमे अपना काम करना है।नही तो नेचर के बिरुद्ध हो जाएगा।प्रकृति जब आराम नही कर रही है,तब हम भी क्यों करे।साहब पल-पल का सदुपयोग करते।अकसर कहते जिनको बुद्ध फुले आंबेडकर के सपनो को साकार करना है उन्हें आराम की फुर्सत ही कहां?”*

🙏 *ऐसे थे हमारे साहेब काँशीराम जी जिनसे हमे सीख लेनी चाहिए* !
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💐 *साहब काँशीराम जी को सत् सत् नमन*💐
*जय भीम*

दुनिया के सबसे बड़ा धर्म प्रवर्तक – सिद्धार्थ गौतम बुद्ध

धर्म मनुष्‍य सभ्‍यता के शुरुआती दौर से ही अहम भूमिका निभाता रहा है। दुनिया की सबसे पुरानी और प्राचीन संस्‍कृतियों का संबंध किसी न किसी धर्म से रहा है और ये धर्म अपने प्रचलित धारणाओं के बूते पूरी मनुष्‍य सभ्‍यता, संस्‍कृति को प्रभावित करते रहे हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि सभ्‍यता के इतिहास में पैगम्‍बर, ईश्‍वरीय दूतों ने ही धर्म को शुरू किया और एक तरह से वे धर्म संस्‍थापकों भूमिका में रहे। चाहे फिर वह ईसा मसीह हो, मोहम्‍मद पैगम्‍बर हो, गुरुनानक हो या कोई दूसरा महापुरुष। सभी ने अपनी तरह से पूरी मानवजाति को एकता, भाईचारे और ईश्‍वरीय गुणों की ओर चलने के लिए प्रेरित किया।

भारत से था दुनिया का सबसे बड़ा धर्म प्रवर्तक, दिग्‍गज आधुनिक, विज्ञानवादी भी हुए अनुयायी..!

ज्ञान और आध्‍यात्‍म को लेकर पूरी दुनिया को यदि सबसे ज्‍यादा किसी ने दिया है तो वह भारत ने ही दिया है। ऐसे ही एक महान महापुरुष ने भारत से ही निकलकर पूरी दुनिया को अपने ज्ञान के प्रकाश से भर दिया।

भारतीय उपमहाद्वीप में भी ऐसा ही एक पैगम्‍बर या ईश्‍वरीय दूत रहा, जिसने पुरातन समय से लेकर आधुनिक युग तक पूरी दुनिया को सबसे ज्‍यादा प्रभावित किया और उसे एक तरह से लाइट ऑफ एशिया  कहा गया। इसका नाम था सिद्धार्थ गौतम बुद्ध, जिसने बौद्ध धर्म चलाया और पूरी दुनिया के सामने ईश्‍वर की नई अवधारणा को सामने रखा।

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईस्वी पूर्व हुआ था। गौतम विश्व के प्राचीनतम धर्मों में से एक बौद्ध धर्म के प्रवर्तक रहे। उनका जन्म क्षत्रिय कुल के शाक्य नरेश शुद्धोधन के घर में हुआ था। बुद्ध अपने बाल्‍यकाल से ही सभी को प्रभावित करने लगे और युवावस्‍था तक आते-आते विवाहोपरांत नवजात शिशु राहुल, पत्नी यशोधरा को त्यागकर संसार को जरा, मरण और दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग की तलाश में रात जंगल चले गए। यही वही कहानी है, जो पूरी दुनिया को गौतम के प्रति आज भी आकर्षित करती है।

राजपाट का वैभव छोड़ने के बाद सालों जंगलों, कंदराओं, पहाड़ों की खाक छानने के बाद आखिरकार बुद्ध को  बोधी वृक्ष के नीचे उस ज्ञान की प्राप्ति हुई, जिसने आगे चलकर बौद्ध धर्म का रूप ले लिया। बुद्ध का ज्ञान प्रचलित धर्मों और खासकर उस दौर के महत्‍वपूर्ण धर्मों हिंदू धर्म और जैन धर्म से बिल्‍कुल अलग था और इसमें सम्‍यक साधना के माध्‍यम से जीवन से दुखों की निवृत्‍ति का मार्ग बताया गया था।

बहरहाल, आज भी पूरी दुनिया में बौद्ध धर्म सर्वाधिक प्रचलित विश्‍व के सर्वाधिक प्राचीन धर्मों में से एक है। इस धर्म की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि यह सभी जातियों और पंथों के लिए खुला है। उसमें हर आदमी का स्वागत है। इस धर्म का दरवाजा जात-पात, ऊंच-नीच का कोई भेद-भाव से कोसो दूर रहा।

कमाल यह था कि बुद्ध की मृत्‍यु के बाद दिनों-दिन यह धर्म तेजी से फैलता रहा। सम्राट अशोक भी विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में अपनी अहम्‌ भूमिका निभाई। मौर्यकाल तक आते-आते भारत से निकलकर बौद्द धर्म चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, बर्मा, थाईलैंड, हिंद चीन, श्रीलंका आदि में फैल चुका था। आश्‍चर्य है कि इन देशों में बौद्ध धर्म बहुसंख्यक धर्म है और गौतम बुद्ध इनके भगवान।

http://khabar.ibnlive.com/news/history/khabar-history-2-478726.html

ये थे दुनिया में चर्चित सबसे महान भारतीय

समाज को बदलने और देश के इतिहास की धारा का रुख मोड़ने वाले कई बार ऐसी नारकीय परिस्‍थितियों के बीच से आते हैं, जहां उनके बचे और बने की रहने की संभावना ही लगातार खतरे में रहती है। ये परिस्‍थितियां ऐसी होती हैं, जहां मनुष्‍य की मनुष्‍य के रूप मे बने और बचे रहने की संभावना कभी छूने से धूमिल होती है, कभी देखने से धराशायी होती है, तो कभी साथ व पास होने से अपमानित होती रहती है।

लेकिन इन्‍हीं परिस्‍थितियों को बदलने के लिए ऐसे मनुष्‍य भी पैदा होते हैं, जो भाग्‍य के भरोसे नहीं, बल्‍कि इन्‍हीं नारकीय परिस्‍थितियों के बीच ऊपजे अपने जीवन संघर्ष से सबकुछ बदल देते हैं। समाज इनके पीछे चलता है और ये राष्‍ट्र के लिए दीपक की भूमिका निभाते हैं जबकि सैकड़ों  पीढ़ियां युगों तक इनके प्रकाश से मार्गदर्शन पाती रहतीहैं।

 

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर भारतीय सभ्‍यता और सामाजिक इतिहास के ऐसे ही एक महापुरुष हैं, जिसने जीवन की बेहद विकट, जटिल, अमानवीय और जातिवाद की कुंठित और लगातार अपमानित करने वाली स्‍थितियों के बीच खुदको जन-जन के बीच स्‍वीकृत और स्‍थापित किया, और एक दिन वे पूरे भारतीय समाज व राष्‍ट्र के लिए मिसाल बन गए।

14 अप्रैल, 1891 को जन्‍में बाबा साहेब एक विश्व स्तर के विधिवेत्ता थे। एक दलित राजनीतिक नेता और समाज पुनरुत्थानवादी इस महान व्‍यक्‍तित्‍व ने भारतीय संविधान के निर्माता की भी भूमिका निभाई।

एक गरीब दलित परिवार में जन्‍म लेने के कारण बाबा साहेब को सारा जीवन नारकीय कष्टों में बिताना पड़ा, लेकिन इन्‍हीं परिस्‍थितियों को बदलने के लिए उन्‍होंने सारा जीवन लगा दिया। उस समय में वे उन अछूतों में से एक थे, जिन्‍होंने कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रतिभा, बुद्धि और संघर्ष का ही नतीजा था कि कानून की डिग्री प्राप्त करने के साथ ही वे विधि, अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान में उच्‍च अध्ययन करने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स पहुंचे और कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। भारत लौटकर आंबेडकर ने कुछ साल तक तो कोर्ट की प्रैक्‍टिस की, लेकिन जातिवाद में बंटे भारतीय समाज की उन्‍हें चिंता हुई और उन्‍होंने दलितों के लिए काम करना शुरू किया।

बाबा साहेब ने सन् 1927  में छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू किया और सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पीने के पानी के सार्वजनिक संसाधनों को पूरे समाज के लिए खुलवाने की जंग शुरू की और अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने की नई लड़ाई छेड़ी। अंबेडकर ने दलितों के उद्धार के लिए न केवल जमीन पर, बल्‍कि किताबों, पत्रिकाओं के जरिये एक बौद्धिक लड़ाई भी छेड़ी।

भारत विभाजन के आलोचक रहे बाबा साहेब ने उस दौर में गांधी से लेकर नेहरू, व जिन्‍ना तक सभी नेताओं की आलोचना की। पाकिस्‍तान के विभाजन को लेकर वे राजी नहीं थे, इस पर उनकी पुस्‍तक थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी चर्चित है।

15 अगस्‍त 1947 को आजाद भारत के वे पहले कानून मंत्री बने और भारत के संविधान निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाई। वे संविधान सभा के अध्‍यक्ष मनोनित किए गए।

अपने जीवन की सांझ बेला में वे बौद्ध धर्म से बेहद प्रभावित हुए और उन्‍होंने 4 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अपने 50 हजार समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म को अपना लिया। मधुमेह की बीमारी से ग्रसित बाबा साहेब की 6 दिसम्बर 1956 की मृत्यु हो गई।

http://khabar.ibnlive.com/news/history/br-ambedkar-479034.html

बुद्ध के आंगन में ही उपेक्षित हैं धरोहरें

महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली पर ही उनकी अनमोल धरोहरों को संजोने में जिम्मेदार नाकाम साबित हो रहे हैं। हजारों वर्ष पुरानी बौद्धकालीन कई धरोहरें जिले में उपेक्षित पड़ी हैं। पुरातत्व विभाग ने इन धरोहरों को संरक्षित श्रेणी में रखा है, बावजूद उनकी सुरक्षा और नियमित देखरेख से बेपरवाह हैं।
जिम्मेदारों का पूरा ध्यान सिर्फ पिपरहवा में स्थित स्तूप पर ही टिका हुआ है। उसके आसपास स्थित अन्य बौद्धकालीन इमारतें उपेक्षित पड़ी हैं। खुले परिसर में सुरक्षा विहीन इन धरोहरों का तेजी से क्षरण हो रहा है, जिम्मेदार इससे बेखबर हैं।
नेपाल सीमा पर स्थित कपिलवस्तु के शाक्य गणराज्य की राजधानी और महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली होने के पुख्ता प्रमाण मिल चुके हैं। इसके आसपास के क्षेत्र में कई चरणों में हुई खुदाई के दौरान तमाम बौद्धकालीन अवशेष मिले हैं।
इसमें पिपरहवा स्थित स्तूप मुख्य है, जिसके नीचे से भगवान बुद्ध का अस्थि कलश भी बरामद हुआ था। इसी से चंद मीटर दूर गनवरिया में राजप्रासाद के अवशेष मिले थे। सलारगढ़ में बौद्धकालीन इमारत, पिपरी में टीले के नीचे से मंदिर के अवशेष खुदाई में प्राप्त हुए हैं।
लिहाजा इन क्षेत्रों को पुरातत्व विभाग ने विरासत मानते हुए संरक्षित घोषित किया है। प्रत्येक स्थल पर इसका बोर्ड भी लगा है, मगर इन संरक्षित क्षेत्रों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। पिपरहवा स्तूप को छोड़ दें तो अन्य तीनों स्थल उपेक्षा के शिकार हैं।
इनकी देखारेख, सुरक्षा और संरक्षण के माकूल इंतजाम नहीं है। सबसे बुरी स्थिति सलारगढ़ की है। जहां बौद्धकालीन इमारत की न तो घेरेबंदी की गई है और न ही सुरक्षा का ही कोई प्रबंध है। श्रावस्ती मंडल के पुरातत्व सर्वेक्षण प्रभारी यूएन तिवारी ने बताया कि क्षेत्र में मौजूद बौद्धकालीन इमारतों को संरक्षित घोषित किया गया है।
समय-समय पर इसकी देख-रेख होती रहती है। पिपरी में उत्खनन का काम अभी शेष है। इसकी निगरानी रखी जा रही है। सलारगढ़ की बाउंड्री का प्रस्ताव लंबित है। यहां बौद्धकालीन इमारतों का दायरा बड़ा है। ऐसे में एक-दो ईंट खिंसक भी जाए तो कोई विशेष बात नहीं।

‘अप्प दीपो भव’

बौद्ध दर्शन का एक सूत्र वाक्य है-
‘अप्प दीपो भव’
अर्थात अपना प्रकाश स्वयं बनो।
तथागत सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के कहने का मतलब यह है कि किसी दूसरे से उम्मीद लगाने की बजाये अपना प्रकाश (प्रेरणा) खुद बनो। खुद तो प्रकाशित हों ही, लेकिन दूसरों के लिए भी एक प्रकाश स्तंभ की तरह जगमगाते रहो।
भगवान गौतम बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द से उसके यह पूछने पर कि जब सत्य का मार्ग दिखाने के लिए आप या कोई आप जैसा पृथ्वी पर नहीं होगा तब हम कैसे अपने जीवन को दिशा दे सकेंगे?
तो भगवान बुद्ध ने ये जवाब दिया था – “अप्प दीपो भव” अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो ।कोई भी किसी के पथ के लिए सदैव मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकता केवल आत्मज्ञान के प्रकाश से ही हम सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।
भगवान बुद्ध ने कहा, तुम मुझे अपनी बैसाखी मत बनाना। तुम अगर लंगड़े हो, और मेरी बैसाखी के सहारे चल लिए-कितनी दूर चलोगे?मंजिल तक न पहुंच पाओगे। आज मैं साथ हूं, कल मैं साथ न रहूंगा, फिर तुम्हें अपने ही पैरों पर चलना है। मेरी साथ की रोशनी से मत चलना क्योंकि थोड़ी देर को संग-साथ हो गया है अंधेरे जंगल में। तुम मेरी रोशनी में थोड़ी देर रोशन हो लोगे; फिर हमारे रास्ते अलग हो जाएंगे। मेरी रोशनी मेरे साथ होगी, तुम्हारा अंधेरा तुम्हारे साथ होगा। अपनी रोशनी पैदा करो। अप्प दीपो भव!
– अप्प दीपो भव :
जिसने देखा, उसने जाना ।
जिसने जाना, वो पा गया ।
जिसने पाया, वो बदल गया,
अगर नहीं बदला तो समझो कि
उसके जानने में ही कोई खोट था ।
भगवान बुद्ध को जाना तो बुद्दत्व तक पहुचेंगे तुम नहीं तुम भगवान बुद्ध की पूजा करने से नहीं पहुचोगे न ही किसी अन्य की पूजा करने से या चेला बनने से|तुम खुद जानोगे तभी तुम पहुचोगे।
भारत वर्ष में भगवान बुद्ध का विरोध क्यों हुआ? इसलिए, क्योंकि उन्होंने तीनों वेदों(बुद्ध के समय ब्राह्मणों के पास केवल तीन वेद ही थे) और ब्राह्माणवादी मान्यताओं को खारिज कर दिया।
यदि संसार में किसी ने सबसे पहले यह सवाल उठाया कि मनुष्यों में उच्च नीच वर्ण क्यों है? तों ऊँच-नीच की मान्यता का विरोध और खंडन केवल भगवान बुद्ध ने किया है ।
भगवान बुद्ध ने आगे कहा वह ईश्वर के होने या न होने के प्रश्न को अनावश्यक बताया ।इश्वर पर निर्भर न रहकर अपने मार्ग और भला खुद ही करने की शिक्षा दी है |भगवान बुद्ध के अनुसार धर्म का अर्थ ईश्वर , आत्मा, स्वर्ग , नर्क , परलोक नही होता ? बुद्ध ने वैज्ञानिक तरीके से ईश्वर , आत्मा , स्वर्ग , नर्क , परलोक , के अस्तित्व को ही नकारा और ध्वस्त किया है |
संसार भर के इतिहास में भगवान बुद्ध एक मात्र ऐसे धम्म प्रचारक है जो व्यक्ति को तर्क और विज्ञान के विपरीत किसी भी बात में विश्वास करने से रोकते है | भगवान बुद्ध कहते है , जिसे ईश्वर कहते है उससे मेरा कोई लेना -देना (सम्बन्ध ) नही है ?
किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार मत करो क्यो कि मैंने इसे करने को कहा है I इसलिये भी मत स्वीकार करो कि किसी धर्म ग्रन्थ में लिखा है। इसलिए भी स्वीकार मत करो कि ये प्राचीन परम्परा है। किसी भी बात को मानने से पहले अपनी तर्कबुद्धि से परखो अगर उचित है तो उसका अनुकरण करो नही तो त्याग दो |भगवान बुद्ध के जैसे स्वतंत्रता किसी भी अन्य धर्म ने नही दी है | भगवान बुद्ध ने स्वयं को मार्ग दर्शक कहा है और कभी भी विशेष दर्जा नही दिया | बुद्ध धम्म में नैतिकता पर ज्यादा जोर दिया गया है।
****अन्य धम्म में जो स्थान ईश्वर का है वही स्थान बुद्ध धम्म में नैतिकता का है | भगवान बुद्ध का कहना है *** अप्प् दीपो भव् ** अर्थात …अपना प्रकाश खुद बनो ….!!!!
।।।।नमो बुद्धाय।।।।

The story of India’s caste blues

If you want a house, you may build one. If you want a new shirt, you’ll buy one. If your child is of school-going age, man, you’ll send him to school. But in the small hillside town of Dasgaon in the Raigad district of Maharashtra, overrun by the British military in the late 19th century, these were bold ideas with threat to life and limb. For a Dalit.
By erecting a single-storey house, Vitthal Hate Joshi, a Mahar, who made his living as a typist, passed into local legend. To his fellow-men, he became ‘Madi-wala Joshi’ — the man with the single-storey. His relative, Babaji More, was sent to jail on the charge of stealing wood to build it.
His son, Ramchandra Babaji More, born an untouchable and, given up to rebellion, perhaps in the same hour, began sending letters, by the age of 11, to the government to cancel grants to his school for denying him admission for being a Dalit. Till the late Twenties, he worked with BR Ambedkar. By the Thirties, he had joined the undivided Communist Party of India.
Dr Ambedkar (seated fourth from left) with prominent leaders of the first Mahad satyagraha in Bombay, 1927. RB More (circled) of Dasgaon suggested the idea of a conference at Mahad to Ambedkar. From the Thirties, More joined the undivided Communist Party of India. (Photo courtesy: Subodh More)
Surbanana Tipnis, an upper-caste, had been RB More’s classmate. His was a 33-year-old working relationship with Ambedkar, says his grandson Milind Tipnis, 60, a social worker. In spite of being a landlord, he joined the Ambedkar-led anti-landlord (‘Khot’) agitation, the first instance of a successful peasant agitation leading to a law. The Congress opposed the movement due to its Brahmin/landlord base then.

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All other media pander to elite Brahminised minorities

Bahujan activist and contributing editor, Round Table India, Kuffir, talks to HT on the alternative media scenario in India. Round Table India (RTI) was started in 2009 by bloggers to put together a Dalit Bahujan socio-political online platform in the backdrop of the maturing Bahujan movement. RTI has neither tried to be ‘media’ nor its ‘alternative,’ even as it is a point of reference in discussions and interventions in the world of alternative media.

What were the reasons why Round Table India was started? Has there been a shift in the way it was first conceived to the present, given that there is a proliferation of alternative media spaces, all of whom talk or discuss Dalit issues?

Round Table India was started around the time when the internet had started acquiring a more ‘social’ face, when blogs and networking sites began to make their appearance. The political trigger was the maturing of the Bahujan movement initiated by Manyawar Kanshi Ram saheb. The movement for social transformation that he had started had come to infuse a sense of confidence among the Bahujans and a whole host of groups and individuals had started taking up a lot of causes – all revolving around the theme of Bahujan assertion, mobilisation and politicisation.

One of those efforts was the ‘Insight Youth Voices’ magazine started around 2004-5 by Anoop Kumar and other Dalit students in the JNU campus. It was a youth magazine aimed at Dalit, Adivasi, Bahujan students around universities across India. At the same time, a few Dalit Bahujan bloggers were making their their presence felt. And it was a very small group of these bloggers – Bhanu Pratap Singh, a techie, Dr Anu Ramdas, a scientist, and myself – who came together to visualise a much bigger Dalit Bahujan online platform, which would serve multiple functions, be a mouthpiece for articulation on contemporary discourses, a resource for accessing archived material on atrocities, policies affecting Bahujans and a library of sorts for archiving historic texts by Dalit Bahujan anti-caste leaders – Babasaheb Ambedkar, Phule etc.

Round Table India was started on January 3, 2009, on the birth anniversary of Savitribai Phule, a social reformer, who alongwith her husband, Jyotirao Phule, played an important role in improving women’s rights in India during British rule (Savitraibai Phule Trust)

RTI was started on January 3, 2009, on the birth anniversary of Savitribai Phule. The organised backlash against Mandal 2 also provided a kind of political urgency to the effort. RTI has been evolving over the years, trying to deepen its reach across regions, issues and perspectives. All with the aim to help in the building of an ‘informed Ambedkar age’.. to build a Bahujan civil society. That also is the key difference between us and all Brahminised sites – whether they call they call themselves ‘mainstream’ or ‘alternative’ media: they wish to ‘cover’ caste issues. we believe we talk of the mainstream – the Dalit, Bahujan, Adivasi majority of india… that is why we’re a mainstream media platform.

Unlike other alternative media, Round Table seems to set its publishing agenda not with an eye to mainstream media. Is that correct? Many alternative media also say that they welcome the traffic between mainstream and alternative media — how do u see this intersection?

A. Please see answer above. We’re not an ‘alternative’ or an ‘intersection’.. we try, with all our resource limitations or our utter lack of resources more precisely, to provide a platform for the mainstream – the Bahujan society of India. All other media pander to elite Brahminised minorities.

What, according to you, is the kind of alternative media that is really needed? Round Table’s focus seems to be not the dissemination of news like some other sites, but to use the site to set off a political renaissance so to speak and create a culture or school of Dalit theorisation.

Right now, given our resource situation too, we don’t aim to focus on mere news dissemination. The Brahminised media now is totally absorbed in converting every bit of news into some kind of macabre entertainment. We try to provide views and analysis which will help the Dalit Bahujans to separate all the tonnes of chaff from this grain.. and these efforts are totally community driven – it’s our huge number of readers and writers who actually perform this task – it is totally their intellect and articulation which impels this renaissance that you speak of.

Now with mainstream media also including features – videos, opinion pieces, blogs, niche writing — in their web versions, is there a danger of a shrinking of space for alternative media?

What’s most important is perspective, and the social-political position that you speak from. Big media can’t cook up an ‘alternative’ to itself. They’re anchored in big capital and high birth. They can chuck neither.

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“जय भीम” शब्द के जनक कौन थे?

“जय भीम” शब्द के जनक कौन थे?”जय भीम” आज बहुजन अस्मिता और एकता का प्रतीक बन चुका है. ।हर बहुजन युवा उत्साह से “जय भीम” के साथ एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं. ।”जय भीम” शब्द की उत्पत्ति महाराष्ट्र में हुई. इस “जय भीम” शब्द के जनक बाबू हरदास एल. एन. थे, जो 1921 में बाबासाहब डा. अम्बेडकर के साथ सामाजिक आंदोलन में उतरे. बाबू हरदास का परिवार पढ़ा-लिखा था।. पिता लक्ष्मण उरकुडा नगराले रेलवे विभाग में बाबू थे. उस समय देश में वर्णभेद और जाति भेद के कारण भीषण सामाजिक और आर्थिक विषमता फैली हुई थी. सन 1922 में महाराष्ट्र के अछूत संत चोखामेला के नाम पर उन्होंने एक छात्रावास शुरू किया. 1924 में उन्होंने एक प्रिंटिंग प्रेस खरीदी थी और सामाजिक जागृति के लिये “मंडई महात्म्य” नामक किताब सामाजिक जागृति के लिये लिखी थी, साथ ही”चोखामेला विशेषांक” भी निकाला था.।बाबासाहब के आंदोलनों में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. 1930 के नासिक कालाराम मंदिर सत्याग्रह तथा 1932 में पूना पैक्ट के दौरान उन्होंने बाबासाहब के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.।”जय भीम” का संबोधन पहली बार उनके मन में एक मुस्लिम व्यक्ति को देखकर आया. उस समय कार्यकर्त्ताओं के साथ घूमते हुये रास्ते में एक मुस्लिम को दूसरे मुस्लिम से “अस्सलाम-अलेकुम” कहते हुये सुना. ।जवाब में दूसरे व्यक्ति ने भी “अलेकुम-सलाम” कहा. ।तब बाबू हरदास ने सोचा कि हमें एक दूसरे से क्या कहना चाहिये? उन्होंने कार्यकर्त्ताओं से कहा, “मैं ‘जय भीम’ कहूँगा और आप ‘बल भीम’ कहिये. उस समय से ये अभिवादन शुरू हो गया, पर बाद में ‘बल भीम’ प्रचलन से गायब हो गया, केवल ‘जय भीम’ ही प्रचलन में रहा.1933-34 में बाबू हरदास ने समता सैनिक दल को ‘जय भीम’ का नारा नागपुर में दिया. इस तरह ‘जय भीम’ हर जगह छा गया. बाद में डाॅ अम्बेडकर ने खुद भी 1949 में अपने पत्रों में जय भीम लिखना और कहना शुरू कर दिया था. 12 जनवरी 1939को उनका परिनिर्वाण हो गया था. उस दिन उनको श्रद्धांजलि देते समय बाबासाहब ने कहा था, “बाबू हरदास के रूप में मेरा दाहिना हाथ चला गया.”जय भीम”

संकीर्ण पंथनिरपेक्षता

तवलीन सिंह का कॉलम वक्त की नब्ज

 

पहले कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद के मुंह से बात सुनी कि आइएस या दाएश और आरएसएस की सोच एक जैसी है। इतना हंगामा हुआ उनकी इस बात को लेकर कि उनको राज्यसभा में अपने भाषण की सीडी पेश करके सफाई देनी पड़ी। स्पष्ट किया कि उनको दोनों संस्थाओं की सोच से तकलीफ है। लेकिन इतने में उनके पुराने साथी दिग्विजय सिंह ने ट्वीट करके कह दिया कि वे पूरी तरह सहमत हैं आजाद साहब के बयान से। ये वही दिग्विजय सिंह हैं, जिन्होंने ‘26/11: आरएसएस की साजिश’ नामक किताब का समर्थन किया था। जबसे जिहादी आतंकवाद का जहर दुनिया में फैलना शुरू हुआ है तबसे कांग्रेस पार्टी की सेक्युलर सोच रही है कि इस जहर से कहीं ज्यादा खतरनाक है हिंदुत्व का जहर। याद रखिए कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने किसी अमेरिकी राजदूत को पांच वर्ष पहले यह बात कही थी। यह खबर हमको विकिलीक्स द्वारा उस वक्त मिली थी। उस समय आइएस था नहीं। उस समय मालूम नहीं था कि आइएस औरतों को गुलाम बना कर बाजारों में बेचेगा। उस समय मालूम नहीं था कि इस्लाम के इस नए खिलाफत में बच्चों को काफिरों की हत्या करने की ट्रेनिंग दी जाएगी। मालूम नहीं था कि छोटे ‘काफिर’ बच्चों को बेरहमी से मार दिया जाएगा, सिर्फ इसलिए कि उनकी जुबान पर कुरान शरीफ की आयतें नहीं चढ़ती हैं। आज दुनिया जानती है कि ऐसी चीजें होती हैं सरेआम उस मुल्क में, जिसको इस्लामिक स्टेट कहा जाता है। क्या दिग्विजय सिंह और गुलाम नबी आजाद बता सकते हैं कि इस तरह की बर्बर हरकतें संघ ने इस देश के कौन-से हिस्से में की हैं? क्या बता सकते हैं कि दुनिया की कौन-सी राजधानी में संघ के आतंकवादियों ने वैसे हमले किए हैं जैसे हाल में पेरिस में हुए थे? दुनिया मान चुकी है कि दाएश इस दौर का उतना ही बड़ा खतरा है जितना कभी नाजी जर्मनी का खतरा था। इस बात को लेकिन हम भारत में नहीं कह सकते हैं ऊंची आवाज में, क्योंकि ऐसा कहने से हमारे माथे पर फौरन चिपक जाता है सांप्रदायिक होने का बिल्ला। आगे बढ़ने से पहले मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि मैं संघ की कोई बहुत बड़ी समर्थक नहीं हूं। मुझे सख्त तकलीफ होती है जब संघी देश में घूम कर मुसलमानों को निशाना बनाते हैं बीफ के बहाने। इससे भी ज्यादा तकलीफ होती है जब संघी प्राचीन भारत की महान विरासत को एक घटिया-सा हिंदू-मुसलिम विवाद बनाते हैं। इस देश की सेवा करने की भावना अगर वास्तव में संघियों के दिल में है तो और बहुत कुछ है करने को। भारत को जरूरत है ऐसे नौजवानों की, जो देश की सेवा करने के नाते स्वच्छ भारत और बेटी बचाओ जैसे कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए निकलने को तैयार हों। स्वछ भारत का दायरा इतना विशाल है कि सरकारी अधिकारी इस काम को अकेले कर ही नहीं सकते हैं। हमारे शहर, हमारे गांव, हमारी नदियां, हमारे मंदिर और हमारे तीर्थ स्थान इतने गंदे हैं कि भारत का हर नागरिक अगर इनको साफ करने में लग जाए तो भी सफाई को लग जाएंगे कई दशक। ऊपर से है हमारी दकियानूसी सामाजिक सोच, जो सिखाती है कि बेटी एक इतना बड़ा बोझ है कि उसको जितनी जल्दी खत्म कर दिया जाए उतना ही अच्छा है। भ्रूण हत्या को रोकने के सख्त से सख्त कानून इस शर्मनाक प्रथा को बदल नहीं पाए हैं। सो, आरएसएस जैसी समाज कल्याण संस्था का मुख्य काम होना चाहिए इस देश के अशिक्षित, जाहिल लोगों को समझाना कि बेटियां बेटों से कम नहीं हैं। ऐसे कार्यों में संघी कम दिखते हैं और घर वापसी जैसे कार्यों में ज्यादा। धर्म परिवर्तन रोकने के लिए निकल पड़ते हैं संघी सीना तान के। बीफ खाने वालों को जान से मारने के लिए भी निकल पड़ते हैं जैसे कि देश के लिए कोई बहुत नेक काम कर रहे हों। दुख के साथ स्वीकार करना पड़ेगा कि नरेंद्र मोदी जबसे प्रधानमंत्री बने हैं, संघियों का हाथ ऐसे कार्यों में जरूरत से ज्यादा दिखने लगा है। जितनी बदनामी उन्होंने मोदी सरकार की की है शायद संघ के बड़े नेता खुद नहीं जानते। ऐसा कहने के बाद लेकिन यह भी कहना जरूरी है कि आरएसएस की तुलना आइएस से करना न सिर्फ गलत, बल्कि महान मूर्खता है। इसलिए कि इस देश के वर्तमान प्रधानमंत्री भी उसी आरएसएस से निकल कर आए हैं, सो जब देश की सबसे पुराने राजनीतिक दल के प्रवक्ता इस तरह की बातें करते हैं तो दुनिया यह समझ लेती है कि हिंदुत्व और जिहादी इस्लाम में कोई फर्क नहीं है। इसी गलतफहमी की वजह से अमेरिका के राष्ट्रपति मोदी के मेहमान बन कर आए थे भारत पिछले साल और जाते-जाते उपदेश दे गए अपने प्रधानमंत्री को कि उन्हें धर्मनिरपेक्षता को कायम रखना चाहिए। हाल में किसी अमेरिकी संस्था ने इजाजत मांगी थी भारत आने की, इस मकसद से कि वे धर्म-मजहब की स्वतंत्रता का जायजा लेना चाहते हैं। इतना बदनाम किया है भारत को कांग्रेस के सेक्युलर नेताओं ने कि दुनिया भूल गई है कि इस जिहादी आतंकवाद के इस दौर में जितने सुरक्षित भारत में मुसलमान हैं, शायद ही किसी दूसरे गैर-इस्लामी मुल्क में होंगे। ऐसा अगर है तो इसलिए कि सनातन धर्म का बुनियादी सिद्धांत है कि हर व्यक्ति को अधिकार है अपने तरीके से भगवान की वंदना करने का और अगर न भी मानना चाहे भगवान को तो भी कोई समस्या नहीं है। ऐसा बुनियादी सिद्धांत न इस्लाम में है और न ही ईसाई धर्म में। हमारी समस्या यह है कि कांग्रेस पार्टी समझ बैठी है कि सेक्युलरिज्म उनके राजनेताओं की देन है। – source

जाति की क्रूरता

राजस्थान के डूंगरपुर जिले की एक घटना ने हमारी सामाजिक प्रगति पर गहरा सवालिया निशान लगाया है। गौरतलब है कि डूंगरपुर के पचलासा गांव में विजातीय विवाह करने वाली एक महिला को उसके भाइयों और परिवार के अन्य सदस्यों ने दिनदहाड़े गांव के चौराहे पर केरोसिन छिड़क कर जिंदा जला दिया। जाति से जुड़े रूढ़ कायदों या चलन का दबाव कितना गहरा होता है यह किसी से छिपा नहीं है। जिसे इस तरह की कट््टरता का पता नहीं, उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि उसे भारत का सबसे कड़वा यथार्थ मालूम नहीं है। जाति का अहंकार और जाति का दंश, दोनों अपने देश में किसी भी अन्य मनोभाव से ज्यादा स्थायी और गहरे हैं।

ये मानसिक बेड़ियों की तरह हैं। यही नहीं, ये हमारे समाज की सबसे गहरी दरारें भी हैं। समाज को कथित ऊंच-नीच की श्रेणियों में बांटने वाली व्यवस्था सबसे ज्यादा दो चीजों पर टिकी रही है। एक, खानपान का संबंध, और दूसरा, विवाह का संबंध। रोटी के रिश्ते की वर्जनाएं बहुत हद तक टूट चुकी हैं। पर जाति के बाहर विवाह आमतौर पर अब भी नहीं होते। जो थोड़े-से होते हैं वे ज्यादातर संबंधित परिवारों की बगैर मर्जी के। ऐसे मामले अपवाद ही कहे जाएंगे जिनमें विवाह अंतर्जातीय होने के बावजूद परिवारों की सहमति और भागीदारी रहती हो। अंतर्जातीय विवाह वाले बहुत-से युगलों को अपना घर-परिवेश छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ता है। अलग-थलग पड़ जाने के कारण, और कहीं-कहीं डर की वजह से भी। पर कई मामलों में यह भी होता है कि उनके परिजन देर-सबेर मान जाते हैं, या कम से कम उनका गुस्सा ठंडा पड़ जाता है। पर ऐसे युगल भी मिलेंगे जिन्हें अपने परिजनों या गांववालों के भय से भागना पड़ा और वे कभी लौट नहीं पाए।

पचलासा की घटना में जान गंवाने वाली महिला को विजातीय विवाह किए आठ साल हो चुके थे। उसकी एक तीन साल की बच्ची भी है। रमा कुंवर ने आठ साल पहले अपने गांव के अन्य जाति के एक युवक से विवाह किया था। विवाह के बाद दोनों कहीं और रहने लगे। पिछले हफ्ते वह अपने गांव में ससुराल आई थी। जब उसके भाई और मायके के अन्य लोगों को पता चला तो उन्होंने उसे घर से खींच कर बाहर निकाला, उसकी पिटाई की और सबके सामने जिंदा जला दिया। बेशक यह एक परिवार की बर्बरता है, जिसकी जड़ें एक खास मानसिकता में हैं, पर इसी लिहाज से इसमें बाकी समाज की भी क्रूरता प्रतिबिंबित होती है।

आखिर दिनदहाड़े बीच गांव में यह कांड होने के बावजूद उस महिला को बचाया क्यों नहीं जा सका? पर ऐसा समाज क्या एक गांव तक सीमित है? अंतर्जातीय विवाह की हिम्मत दिखाने वालों का साथ देने के लिए कितने लोग आगे आते हैं? कई मामलों में तो उन्हें कानून या प्रशासन का संरक्षण भी नहीं मिल पाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में देश भर के पुलिस महकमों को निर्देश दिया था कि अंतर्जातीय विवाह करने वालों को अगर कहीं परेशान किया जाता है, तो उन्हें सुरक्षा दी जाए। पर उत्पीड़न के अधिकतर मामलों में इस निर्देश का अनुपालन नहीं होता। पर उससे भी बड़ा सवाल समाज के सलूक का है।

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जाति की जड़ना

तमिलनाडु में अंतरजातीय विवाह करने वाले जोड़े को भरे बाजार में जाति-व्यवस्था के पोषकों ने अपना शिकार बना डाला। दलित पृष्ठभूमि से आने वाले शंकर की मौत हो गई और एक अति पिछड़ी जाति की कौशल्या बुरी तरह घायल हो गई। भारत में आए दिन इस तरह की घटनाएं, खासकर उत्तर भारत के हरियाणा और दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में होती रहती हैं, जिन पर सरकार के कड़े-कानून भी बौने दिखते हैं। वास्तव में जाति-व्यवस्था भारतीय समाज की एक कड़वी सच्चाई है जो वर्ण-व्यवस्था के रूप में काफी पुरानी है। ‘मनु’ की सोच को चुनौती देने का उपक्रम किया जाता रहा है, लेकिन जहां प्रेम विवाह की बात आती है, वहां मानो समूची व्यवस्था उसी रूढ़िवादी वर्ण-व्यवस्था की समर्थक-सी दिखने लगती है। तुलसी के ‘रामचरितमानस’ में भी कई जगह पर इस वर्ण-व्यवस्था का समर्थन है, लेकिन चूंकि इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं, इसलिए किसी को इस पर आपत्ति नहीं होती। गांधी की रामराज्य-परिकल्पना में भी उस जाति-व्यवस्था को ही समर्थन मिलता है, यह बात अलग है कि दलितों को वे ‘हरिजन’ नाम देकर उनके प्रति अपनी संवेदनशीलता भी प्रकट करते हैं। लेकिन सवाल है कि अगर सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं तो फिर इस तरह का जातिगत-अलगाव क्यों! निम्न कही जाने वाली जाति भी अपने नीचे कही जाने वाली कोई न कोई जाति खोज कर खुद को उच्च दिखाने का उपक्रम करती है। यह भावना जब तक है, तब तक इस ‘नासूर’ को भरने में मुश्किलें आती रहेंगी। शिक्षा का हथियार भी इस जड़ता को काटने में अपने आपको भोथरा महसूस करता है। शिक्षित व्यक्ति भी ‘प्रेम-विवाह’ के संबंध में अपनी बेटी या बेटा का विवाह निम्न कही जाने वाली जाति में करने से हिचकता है। हालांकि शहरों की तस्वीर सिर्फ दिखने में ही इन जड़ताओं से मुक्त लगता है, लेकिन वास्तविक स्थिति कुछ और है। ग्रामीण इलाकों में तो स्थिति और भयंकर है। एक शिक्षित व्यक्ति अगर चाहे तो भी जातिगत बंधनों से बाहर नहीं जा सकता। सामाजिक दबाव उसे ऐसा करने से रोकते हैं। हजारों साल पुरानी इस व्यवस्था को तोड़ने में और कितने साल लगेंगे! अब इस सवाल पर हमें सोचना ही होगा। ’अनीता यादव, दिल्ली विश्वविद्यालय – See more at: http://www.jansatta.com/chopal/incase-of-race/79227/?utm_source=JansattaHP&utm_medium=referral&utm_campaign=chopal_story#sthash.t8QgZ0z9.dpuf

ईश्वर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता, जब वह कोई पाप कर रहा हो?

 

 

भगत सिंह का शहीदी दिवस है आज. भगत सिंह का जिक्र सब करते हैं. तमाम पंथों वाले. अपने हिसाब से. किसी को विचार दिखते हैं, कोई उनके हाथ में बंदूक बस देख पाता है. धर्म के नाम पर भरे बैठे भी भगत सिंह को अपना आदर्श बताते हैं. ये जाने बिना कि वो हाथ में बंदूक लेने के अलावा भी बहुत कुछ कह गए हैं. ये जाने बिना कि वो नास्तिक थे. नास्तिक आपके धर्म के खिलाफ नहीं होते. नास्तिकता क्या है. आप यहां से जान सकते हैं. ये एक प्रतिनिधि पत्र है, जिससे आपको नास्तिकता का मोटा-मोटी हिसाब लग जाता है. पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून है. आप धर्म के खिलाफ कुछ बोलो-लिखो या करो तो जेल हो जाती है. हिंदुस्तान में ऐसा कुछ नहीं है. बेहतर है. लेकिन आस्तिकों और नास्तिकों में कनफ्लिक्ट तो चलते ही हैं.

‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ का जिक्र अक्सर होता है. भगत सिंह ने जेल में रहते हुए इसे लिखा था. तब 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के ‘द पीपल’ अखबार में ये छपा था. इस आर्टिकल में भगत सिंह ने ईश्वर की उपस्थिति पर अनेक लॉजिकल सवाल उठाए थे.भगत सिंह ने ये आर्टिकल तब लिखा था जब भगवान को मानने वाले एक दूसरे स्वतंत्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह ने उनकी नास्तिकता की वजह उनकी पॉपुलरिटी को बताया था. उसी बात के जवाब में भगत सिंह ने ये लेख लिखा था.


मैं नास्तिक क्यों हूं

एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है. क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूं? मेरे कुछ दोस्त, शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूं. मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूं और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है. Continue reading “ईश्वर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता, जब वह कोई पाप कर रहा हो?”