थैंक्स फॉर 90 वोट्स

मानवता के इतिहास में तमाम करुण कहानियां अनकही रही गई हैं. इरोम शर्मिला का अपनी मुसलसल हार के लिए जनता को धन्यवाद देना वैसी ही एक अनकही कहानी है.

इरोम शर्मिला. (फोटो: पीटीआई)

मणिपुर का मालोम बस स्टैंड. तारीख़ 2 नवंबर, 2000. एक महिला कवि बस स्टैंड पर खड़ी थी. सुरक्षाबलों का एक दस्ता पहुंचता है और दस युवाओं पर अंधाधुंध गोलियां बरसा कर उन्हें भून देता है. कवि हृदय रो पड़ता है. भारतीय संविधान में तो अपराधी या आतंकी को भी ऐसी सज़ा देने का प्रावधान नहीं है!

उस महिला कवि ने फ़ैसला किया कि वह इस काले क़ानून के ख़िलाफ़ लड़ेगी. इस तरह किसी को कैसे मारा जा सकता है? यह कौन सा क़ानून है? यह क़ानून है सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम यानी आफ्सपा, जो पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में लागू है. यह क़ानून सुरक्षा बलों को यह अधिकार देता है कि वह किसी को शक के आधार पर गोली मार सकते हैं.

उस युवा महिला कवि का नाम है इरोम शर्मिला चानू. इरोम ने अगले दिन से इस क़ानून के ख़िलाफ़ अनशन शुरू कर दिया. यह अनशन अन्ना हज़ारे का अनशन नहीं था. उन्होंने 16 साल तक एक अनसुना अनशन किया. कोर्ट के आदेश पर उन्हें आत्महत्या की कोशिश के आरोप में पुलिस हिरासत में रखकर नाक में नली डालकर तरल भोजन दिया जाता रहा. वे अनशन करती रहीं और हारती रहीं.

दिल्ली की एक अदालत में इरोम ने पिछले साल आंख में आंसू भरकर कहा था, ‘मैं ज़िंदा रहना चाहती हूं. मैं जीना चाहती हूं. शादी करना चाहती हूं, प्रेम करना चाहती हूं, लेकिन उससे पहले यह चाहती हूं कि हमारे प्रदेश से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हटा लिया जाए.’ वे 16 साल तक इस एक इच्छा के लिए लड़ती और हारती रहीं.

अंतत: इरोम ने तय किया कि वे चुनावी रास्ते से विधायिका में जाएंगी और इस क़ानून के ख़िलाफ़ लड़ेंगी. वे इस बार मणिपुर के मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ीं और 90 वोट पाकर हार गईं. जिस प्रदेश की जनता के जीने के अधिकार के लिए वे 16 वर्षों तक लड़ती रहीं, उस जनता ने उनके सियासी सपने को बेरहमी से मार दिया. इरोम ने आंखों में एक सपना लेकर चुनावी अखाड़े में प्रवेश किया था और आंखों में आंसुओं का सैलाब लेकर उस अखाड़े से बाहर निकल गईं, साथ में यह कहती गईं, ‘अब इधर कभी नहीं आना है.’ उन्होंने सियासी जीवन जिए बिना उससे संन्यास की घोषणा कर दी.

Imphal: Irom Sharmila coming out of JNIMS Security ward after her release in Imphal on Wednesday following a court order. PTI Photo (PTI8_20_2014_000230B)

(फोटो: पीटीआई)

अफ्स्पा को लेकर 16 वर्षों तक अनशन करने वाली इरोम शर्मिला वैसे ही हार गई हैं, जैसे मणिपुर में मनोरमा हार गई थी, जैसे मनोरमा कांड में न्याय पाने के लिए नग्न होकर प्रदर्शन करने वाली महिलाएं हार गई थीं, जैसे बस्तर में मड़कम हिड़मे और सुखमती हार गई. इस हार के बदले आज इरोम ने फेसबुक पर लिखा, थैंक्स फॉर 90 वोट्स.

इरोम 16 साल से लड़ रही हैं और बार-बार हार रही हैं. वे कह रही थीं कि सेना को वह अधिकार न दिया जाए, जिसके तहत वह किसी को शक के आधार पर गोली मार देने का अधिकार रखती है.

वे चाहती हैं कि सेना को इतना अधिकार न हो कि वह किसी मनोरमा का बलात्कार कर दे या चौराहे पर खड़े किन्हीं युवाओं को बिना कारण गोलियां बरसा कर भून दे, या किसी 12 साल के बच्चे को पेशेवर आतंकी घोषित करके उसकी मां के सामने उसका ‘एनकाउंटर’ कर दे.

जिस तरह चुनाव में नोटबंदी में मरे क़रीब 150 लोग कोई मुद्दा नहीं थे, जिस तरह उत्तर प्रदेश में कुपोषित आधी महिलाएं कोई मुद्दा नहीं थीं, जिस तरह डायरिया या इनसेफलाइटिस से मरने वाले लाखों बच्चे कोई मुद्दा नहीं होते, उसी तरह इरोम का 16 साल तक संघर्ष करके अपना जीवन दे देना कोई मुद्दा नहीं रहा.

जिस लोकतंत्र में अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी पत्नी की हत्या के केस में जेल में बंद रहकर चुनाव जीत जाते हों, माफ़िया मुख़्तार अंसारी जेल में रहकर चुनाव जीत जाते हों, बाहुबली सुशील कुमार, रघुराज प्रताप सिंह और विजय मिश्र आदि चुनाव जीत जाते हों, वहां पर हत्याओं के विरोध में ज़िंदगी खपा देने वाली इरोम की हार तो जैसे पहले से ही तय थी. तमाम बाहुबलियों को भारी बहुमत से जिता देने वाली जनता ने आंसुओं से गीली आंखों वाला, नाक में नली डाले एक कवयित्री का चेहरा पसंद नहीं किया.

इरोम ने 16 साल बाद अपना अनशन तोड़ा था और चुनावी राजनीति में उतरकर बदलाव लाने का फ़ैसला किया था. उन्होंने ‘पीपुल्स रिइंसर्जेंस एंड जस्टिस अलाएंस’ नाम की पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा, लेकिन मणिपुर के मतदाताओं ने इरोम को नोटा का विकल्प समझना भी मुनासिब नहीं समझा. उन्हें मात्र 90 वोट मिले. चुनाव परिणाम आने के बाद इरोम रोईं और राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर डाली.

रविवार को इरोम ने अपने फेसबुक पेज पर चार शब्द का स्टेटस लिखा, ‘Thanks for 90 Votes.’

Irom sharmila

इरोम शर्मिला का फेसबुक स्टेटस

इरोम के स्टेटस पर तमाम लोगों ने हमदर्दी भरे कमेंट किए हैं. गनीमत है कि उन्हें ट्रोल नहीं किया गया. शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने फ़ेसबुक पेज पर यह स्टेटस शेयर करते हुए लिखा, ‘इरोम शर्मिला का ये स्टेटस पढ़ रहा हूं और रोयां-रोयां कांप रहा है. कितनी हिम्मत जुटाई होगी उन उंगलियों ने Thanks for 90 Votes टाइप करने के लिए! मणिपुर के लोगों के लिए 16 साल का अनशन और तोहफे में 90 वोट! वाह रे लोकतंत्र!’

अदिति ने अपनी वॉल पर लिखा, ‘इरोम ने जनता को धन्यवाद नहीं दिया है, चार शब्दों में लोकतंत्र का शोकगीत लिखा है.’

रवि जोशी ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला को सिर्फ़ 90 वोट मिलना ये दिखाता है कि भारत के लोगों को राजनीति में अच्छे लोगों की कोई ज़रूरत नहीं है, उसे गुंडे, बलात्कारी ही अच्छे लगते है या नोट और शराब बाटने वाले!’

अंशू राजपूत ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला की हार से काफी लोग सदमे में हैं. इरोम को शायद 90 वोट मिले हैं. दरअसल, चुनाव का अपना डायनामिक्स होता है. जनता अपने तरीके से सोचती है. इरोम शर्मिला को छोड़िए… जिस शख्स ने 1950 में देश को इतना शानदार संविधान दिया, उस आंबेडकर को 1951-52 के लोकसभा चुनाव में बॉम्बे की जनता ने हरा दिया. आंबेडकर चौथे नंबर पर आए. और तो और, 1954 में वो भंडारा का उपचुनाव भी नहीं जीत सके. जिस राम मनोहर लोहिया के राजनीतिक दर्शन पर यूपी और बिहार में सरकारें बनती हैं उन लोहिया जी को यूपी में चंदौली के लोगों ने हरा दिया. लोहिया नेहरू जी के खिलाफ भी चुनाव हारे. आचार्य नरेंद्र देव, मोरारजी देसाई, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी- ये सबके सब हार चुके हैं. अगर इरोम शर्मिला में राजनीतिक क्षमता और योग्यता होगी तो उन्हें सियासी ताकत बनने से कोई नहीं रोक सकता है.’

एके मिश्रा ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला का 90 वोट पाना और राजा भैया का 1,30,000 वोट पाना ही लोकतंत्र है. सलाम जनादेश!’ बाबूराम यादव का कहना था, ‘बेहद दुखद. इरोम शर्मिला के हिस्से 90 वोट, किस जनता के लिए आपने 16 साल अनशन किया?’

Irom Sharmila

(फोटो साभार: बाबूराम यादव की फेसबुक वॉल से)

तरुण शेखर ने लिखा, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला को नोटा के 166 वोट से भी कम 90 वोट मिले. अच्छे काम की इससे बड़ी किरकिरी क्या होगी! मणिपुर में 16 साल से आंदोलन कर रही ईरोम ने 2016 में अनशन तोड़ा था. 16 साल तक अफ्स्पा हटाने के खिलाफ इरोम सत्याग्रह के रास्ते पर चली थीं, 44 साल की आयरन लेडी इरोम पिछले 16 साल से नेजल ट्यूब के साथ अनशन पर थीं. सत्याग्रह करने वाली शर्मिला के शरीर में अन्न जल पहुंचाने का यही अकेला तरीका था.’

गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला चुनाव हार गई, सोनी सोरी चुनाव हार गई, दयामनी बारला चुनाव हार गईं, मेधा पाटकर चुनाव हार गईं. खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते. तो उस फ़कीर ने कहा कि तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है, पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिए इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है. धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं. उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं.’

चुनाव हारने के बाद इरोम ने बयान दिया, ‘मैं इस राजनीतिक प्रणाली से आजिज आ चुकी हूं. मैंने सक्रिय राजनीति छोड़ने का फैसला लिया है. मैं दक्षिण भारत चली जाउंगी क्योंकि मुझे मानसिक शांति चाहिए. लेकिन मैं आफस्पा के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखूंगी, जबतक वह हटा ना लिया जाए, लेकिन मैं सामाजिक कार्यकर्ता की भांति लड़ती रहूंगी.’

यानी इरोम फिर उसी अनशन की अंधी गली में लौट जाएगी, जिसमें घुप्प अंधेरा है, डरावना सन्नाटा है और इरोम अकेली है.

गुजरात के दलितों का मुद्दा संसद में गूँजा

गुजरात में दलितों की पिटाई के बाद वहां दलित समुदाय में भारी गुस्सा है और बुधवार को बुलाए गए गुजरात बंद के दौरान कुछ जगहों पर हिंसा की घटनाएँ हुई हैं.

ये मुद्दा संसद में भी गूंजा है. राज्यसभा में बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के सांसदों ने इस मुद्दे पर तत्काल बहस की मांग की है. राज्यसभा को कुछ देर के लिए स्थगित भी करना पड़ा है.

बसपा प्रमुख मायावती ने संसद के बाहर कहा, ”दलितों से जुड़ा कोई भी मामला जब बसपा उठाती है, तो आपस में मिले हुए कांग्रेस, भाजपा उस पर राजनीति करने लगते हैं.”

दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत ने संसद के बाहर कहा कि गुजरात सरकार ने मामला सामने आने के बाद तत्काल कड़ी कार्रवाई की है लेकिन विपक्ष न दो संसद में व्यवस्थित ढंग अपनी बात रखना चाहता है और ही सरकार की बात सुनना चाहता है.

उधर गुजरात से पत्रकार प्रशांत दयाल ने बताया है कि सौराष्ट्र में अमरोली, भावनगर, जूनागढ़ और राजकोट ज़िलों में बंद के दौरान बसों पर पथराव हो रहा है स्कूल कॉलेज बंद हैं.

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जूनागढ़ और अहमदाबाद में भी स्कूल कॉलेज बंद कराए गए हैं क्योंकि सरकारी बसों और दफ़्तरों को निशाना बनाया जा रहा है.

ये मुद्दा तब शुरू हुआ जब ग्यारह जुलाई को वेरावल ज़िले के ऊना में कथित गो रक्षकों ने जानवर की खाल उतार रहे चार दलितों की बेरहमी से पिटाई की थी.

इस घटना का वीडियो वायरल हो गया था.

इसके बाद भड़के प्रदर्शनों में पथराव हुए थे जिनमें एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई. विरोध प्रदर्शनों के दौरान 16 दलितों ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी.

इनमें से एक युवक की मौत हो गई है. हालांकि प्रशासन का कहना है कि मृत व्यक्ति ने व्यक्तिगत कारणों से ज़हर खाया था. लेकिन दलित संगठन प्रशासन के दावों को नकार रहे हैं.

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल Image 

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल इस मामले में जांच के आदेश दे चुकी हैं. वो पीटे गए दलित युवकों से मिलने ऊना पहुंच गई हैं.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी 21 जुलाई को और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल का 22 जुलाई को इन पीड़ितों से मिलने का कार्यक्रम है.

अमरेली में मंगलवार को दलितों के प्रदर्शन में हुई पत्थरबाज़ी में एसपी रैंक के एक अधिकारी समेत छह पुलिसकर्मी घायल हुए थे.

गुजरात में आंदोलन करते दलित.Image 

मुख्यमंत्री ने मंगलवार को एक ट्वीट कर बताया था कि ऊना की घटना के संबंध में अब तक 16 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है.

इन लोगों पर अपहरण, लोगों को बंधक बनाने और एसएसी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है.

 

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आज हम उस ईश्वर से मुक्त हुए

रोहित वेमुला के भाई राजा वेमुला और उनकी मां राधिका वेमुला ने गुरुवार को मुंबई के एक कार्यक्रम में बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया.

बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद राजा वेमुला ने एक बयान जारी किया है. यहां पढ़िए वो बयान.

”जय भीम

अगर मेरा भाई रोहित जिंदा होता तो उसे हमारे आज के फ़ैसले पर गर्व होता. आज से मेरी मां राधिका वेमुला और मैं वैसा जीवन शुरू करने जा रहे हैं जिसका रोहित ने हमेशा सपना देखा था.

वैसा जीवन जैसा बाबासाहेब आंबेडकर चाहते थे कि हम जिएं. बिना अंधविश्वास का जीवन. एक जीवन जिसमें आस्था मानवता के प्रति हो, न कि एक अज्ञात भगवान के प्रति. जीवन जो दूसरे मनुष्यों के लिए करुणा और सम्मान पर आधारित हो. गरिमा और आत्मसम्मान से भरा जीवन. हिंदू जाति व्यवस्था से परे जीवन.

आज से मेरी मां और मैं पूरी तरह मुक्त हैं. शर्मिंदगी से मुक्त, रोज़ के अपमान से मुक्त. उस ईश्वर से मुक्त जिसके नाम पर हमारे लोगों पर सदियों से अत्याचार होते रहे.

rohit vemula's brother raja vemula's statement after converting to buddhism

आज से मैं और मेरी मां हमेशा याद रखेंगे कि बाबासाहेब के जन्मदिन पर हमें जाति व्यवस्था से आज़ादी मिली थी.

मेरा भाई चाहता था कि हम गौतम बुद्ध के दिखाए रास्ते पर चलें. पिछले साल नवंबर में जब मेरा भाई अपने सबसे करीबी दोस्त रियाज़ की शादी में शामिल होने आया था तो उसने सफ़ेद कपड़े पहन रखे थे.

जब मेरी मां ने उससे उसके कपड़ों के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वो गौतम बुद्ध से बहुत प्रभावित है, इसी वजह से उसने बौद्धों की तरह सफ़ेद कपड़े पहन रखे हैं.

रोहित ने विस्तार से बताया कि 1956 में कैसे बाबासाहेब ने बौद्ध धर्म अपनाया था. उसने हमें इस बात का मतलब समझाया कि बाबासाहेब ने क्यों कहा था कि वे भले ही हिंदू पैदा हुए हों, हिंदू के रूप में नहीं मरना चाहते.

उस वक़्त हमें अपने भाई की बात की अहमियत समझ में नहीं आई, मगर उसकी मौत ने हमारी आंखें खोल दी हैं. मैं एक बहुत ही साधारण आदमी हूं, मैं आपके सामने इसलिए खड़ा हूं क्योंकि मेरे भाई रोहित वेमुला ने बहुत बड़ा बलिदान दिया है.

अब जब मैं आपके सामने हूं, मैं उन लोगों को चेतावनी देना चाहता हूँ जो मेरे भाई की मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं, मैं अपनी अंतिम सांस तक लड़ता रहूंगा. और मैं अकेला नहीं हूं, एक पूरी पीढ़ी और पूरा देश रोहित की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए उठ खड़ा हुआ है.

सब लोग जो मेरे भाई को न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे हैं, वे मिलकर एक सीधा सवाल पूछ रहे हैं. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति अप्पा राव के बारे में एक शब्द भी क्यों नहीं कहा?

वे मेरे भाई के नाम पर आंसू बहा सकते हैं, लेकिन उसकी मौत के लिए ज़िम्मेदार लोगों के बारे में एक ठीक-सा बयान क्यों नहीं दे सकते.

हमारी मांग बहुत साधारण है, हम चाहते हैं कि अप्पा राव को पद से हटाया जाए, उनकी गिरफ़्तारी हो. हम चाहते हैं कि तेलंगाना सरकार का विशेष जांच दल रोहित की मौत से जुड़ी परिस्थितियों की जांच करे.

मोदी सरकार ने जो एक सदस्यीय आयोग गठित किया है उसमें हमारा कोई विश्वास नहीं है.

हमें उम्मीद है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री रोहित की मौत के सच को जानने की कोशिश में शामिल होंगे. राजनीतिक तौर पर असली ज़िम्मेदार वेंकैया नायडू, स्मृति ईरानी और प्रधानमंत्री ख़ुद हैं.

हम जानते हैं कि ये लड़ाई लंबी और कठिन होगी, लेकिन हम मज़बूत और आशावादी हैं क्योंकि आंबेडकर, बुद्ध और मेरे भाई रोहित की शक्ति हमारे साथ है.

जय भीम

राजा वेमुला

14 अप्रैल, 2016”

राम नहीं, केवल अंबेडकर को मानते हैं दलित: मायावती

बसपा सुप्रीमो मायावती ने दलितों के मुद्दे पर गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लिया। उन्‍होंने कहा कि पीएम मोदी ने अपनी सरकार के दो सालों में दलितों के लिए कुछ नहीं किया। यूपी चुनावों के नजदीक आने के बाद वे दलितों और पिछड़ों के लिए कई वादे कर रहे हैं। डॉक्‍टर भीमराव अम्‍बेडकर की 125वीं जयंती पर अम्‍बेडर मेमोरियल पर आयोजित सभा में मायावती ने कहा कि उनकी रैली में लाखों लोग अपने दम पर आए हैं। जबकि एमपी में उनकी सरकार और भाजपा ने 200 कॉलेजों के छात्रों को महू में मोदी की रैली में आने के लिए मजबूर किया ताकि किराए की भीड़ जुटाई जा सके। उन्‍होंने आरोप लगाया कि भाजपा और कांग्रेस दलित वोटों के लिए अंबेडकर के नाम का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। हाल ही में नियुक्‍त यूपी के भाजपा अध्‍यक्ष केशव प्रसाद मौर्य का कम्‍युनल और क्रिमिनल रिकॉर्ड है। वे ओबीसी से आते हैं लेकिन भाजपा और आरएसएस से जुड़े रहें हैं। उन्‍होंने कहा कि अगर भाजपा दलित या ओबीसी को अपना सीएम या पीएम उम्‍मीदवार घोषित कर दे तो भी वे लोग इन समुदायों के लिए कुछ नहीं कर सकेंगे। पीएम मोदी इसका उदाहरण है। वह हमेशा कहते हैं कि वह ओबीसी है लेकिन उस समुदाय के लिए कुछ नहीं किया। यहां तक कि उन्‍होंने चाय बेचने वालों के लिए भी कुछ नहीं किया। मायावती ने कहा कि दलित राम या किसी और देवी-देवता को नहीं मानते। वे केवल अंबेडकर को मानते हैं जो उनके अधिकारों के लिए लड़े थे। उनके तीर्थ स्‍थान अयोध्‍या, मथुरा, वृंदावन,द्वारका नहीं है। उनका तीर्थ लखनऊ का अंबेडकर मेमोरियल है। उन्‍होंने आरएसएस पर भी हमला बोलते हुए कहा कि वह केंद्र सरकार की नाकामियों को छिपाने के लिए लव जिहाद, बीफ और भारत माता की जय जैसे प्रयास कर रहे हैं। ओवैसी जैसे लोग भी अप्रत्‍यक्ष रूप से भाजपा की मदद कर रहे हैं। कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए मायावती ने कहा कि हाल ही में सोनिया गांधी ने रोहित वेमुला की तुलना अंबेडकर से की। यह उनकी अज्ञानता दर्शाता है। अंबेडकर से तुलना करनी है तो दक्षिण अफ्रीका के नेलसन मंडेला से करनी चाहिए। जब हैदराबाद यूनिवर्सिटी में आठ दलित छात्रों ने आत्‍महत्‍या की थी तो उस समय कांग्रेस सरकार थी। लेकिन कांग्रेस ने कुछ नहीं किया। – Source

हरियाणा में एससी बीसी के 16000 पद खाली

हरियाणा सरकार ने नौकरियों में भले ही नए सिरे से आरक्षण तय कर दिया है, लेकिन अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग का बैकलाग आज तक पूरा नहीं हो पाया है। सरकारी विभागों, अर्ध सरकारी विभागों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में अनुसूचित जाति (एससी) और पिछड़े वर्ग (बीसी) के हजारों पद खाली पड़े हुए हैं। प्रदेश
सरकार को इन पदों के लिए उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं। इसके अभाव में सरकार ने खाली पदों को भरने की समय सीमा बताने से साफ इनकार कर दिया है।
विशेष पिछड़ा वर्ग में ग्रुप ए और ग्रुप बी की नौकरियों में आरक्षण का कोटा एक-एक प्रतिशत बढ़ाने से हालांकि पद पहले से अधिक सृजित होंगे, लेकिन सरकार आज तक पिछला बैकलाग ही पूरा नहीं कर पाई है। अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के करीब 16 हजार पद खाली चल रहे हैं।
सरकारी व अर्ध सरकारी विभागों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में अनुसूचित जाति के करीब साढ़े 9 हजार पद खाली हैं। इनमें ग्रुप ए व ग्रुप बी 77 पद और ग्रुप सी और ग्रुप डी के 8781 पद का बैकलाग अधूरा पड़ा है। पिछड़े वर्ग में ग्रुप ए व ग्रुप के मात्र 71 पद खाली हैं, जबकि ग्रुप सी और ग्रुप डी के 6260 पद खाली पड़े हुए हैं।
चीफ सेक्रेटरी की ओर से भेजे जा चुके तीन पत्र: कांग्रेस विधायक उदय भान ने विधानसभा में बैकलाग भरने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी मांगी थी, जिसके जवाब में अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग कल्याण राज्य मंत्री कृष्ण कुमार बेदी ने मुख्य सचिव के 24 सितंबर 2013, 27 मई 2014 और 11 सितंबर 2015 के तीन पत्रों का हवाला देते हुए कहा कि सभी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों तथा विश्वविद्यालयों को बैकलाग पूरा करने की हिदायतें जारी की जा चुकी हैं। इन हिदायतों का अभी असर देखने को नहीं मिला है।
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आरक्षण के बदले प्रारूप पर अभी गवर्नर के हस्ताक्षर नहीं: विधानसभा में पारित नए आरक्षण विधेयक पर अभी राज्यपाल के हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। उनके हस्ताक्षर के बाद आरक्षण के नए प्रावधानों पर आधारित अधिसूचना जारी होगी। पिछड़ा वर्ग ब्लाक ए में 71 जातियां शामिल हैं। ग्रुप सी और डी के पदों के लिए 16 प्रतिशत तथा ग्रुप ए व बी के पदों के लिए 11 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। पहले ग्रुप ए व बी के पदों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण मिलता था। पिछड़ा वर्ग ब्लाक बी में ग्रुप सी व डी पदों के लिए 11 प्रतिशत तथा ग्रुप ए व बी के लिए 6 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। ग्रुप ए व बी के लिए पहले 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था। पिछड़े वर्ग ब्लाक सी की नई कैटेगरी बनाई गई है, जिसमें ग्रुप सी व डी के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण तथा ग्रुप ए व बी के लिए 6 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। ग्रुप ए व बी के लिए पहले 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था।

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भारत को बारीकी से जानना हो तो ये 8 डॉक्यूमेंट्री जरूर देखना

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देश में सबसे चर्चित और मानी जाने वाली डॉक्यूमेंट्री में गिना जाता है। नाम है ‘द स्टोरी ऑफ इंडिया’। इतिहासकार माइकल वुड ने इसका ‌निर्देशन किया है, वही इसके लेखक भी हैं। बीबीसी की इस डॉक्यूमेंट्री के कुल छह एपिसोड हैं और इसमें बेहतरीन ढंग से बताया गया है कि सालों से इस देश ने खुद को कैसे बदला है और ऐसा क्या है यहां जो इसे सबसे अलग बनाता है।

 

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दुनिया का सबसे बड़ा मेला और लोगों का जमघट हमारे देश में ही लगता है। महाकुंभ के दौरान करोड़ों की संख्या में लोग इलाहाबाद में संगम स्नान करने एकत्रित होते हैं। महाकुंभ को दुनिया का सबसे बड़ा त्योहार भी कहा जाता है। इसकी पूरी सुंदरता और सच्चाई को नेशनल जियोग्राफिक ने अपनी डॉक्यूमेंट्री ‘महाकुंभ मेला’ में सटीक ढंग से दिखाया है। 55 दिनों तक चलने वाला ये मेला हर बारह साल में एक बार लगता है।

 

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‘इंडिया अनटच्ड’ का नाम सुना है आपने? ये एक ऐसी भारतीय डॉक्यूमेंट्री है जिसे फिल्ममेकर स्टालिन के ने बनाया है। ये डॉक्यूमेंट्री हमारे देश में जातिवाद और छुआछूत की समस्या को दिखाता है। उनकी फिल्म ने ना सिर्फ पूरी दुनिया का ध्यान देश की जातिवाद की समस्या पर खींचा बल्कि इस डॉक्यूमेंट्री ने कई अवॉर्ड भी जीते।

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भारत में दो चीजों को लोग सर्वोपरि रखते हैं। एक क्रिकेट और दूसरा बॉलीवुड। ‘बॉलीवुड-द ग्रेटेस्ट लव स्टोरी एवर टोल्ड’ एक ऐसी ही डॉक्यूमेंट्री है जिसे राकेश ओमप्रकाश मेहरा और जेफ जिंबालिस्ट ने बनाया है। ये डॉक्यूमेंट्री भारतीय सिनेमा की सुंदरता और ताकत को दिखाती है। ये दिखाती है कि कैसे सिनेमा ने पूरे देश को एक डोर में बांधकर रखने का काम किया है। बॉलीवुड के फैन आप भी हैं तो देखिए कैसे करोड़ों के दिलों में बॉलीवुड धड़कन का काम करता है।

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क्या आप जानते हैं कि एशिया का सबसे बड़ा वेश्यालय अपने ही देश में है? जी हां, कोलकाता के सोनागाची में सबसे बड़ा वेश्यालय है। यूं तो इस जगह पर कैमरे का जाना आसान नहीं है फिर भी इस पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई है। जाना ब्रिस्की और रॉस कॉफमैन ने इस डॉक्यूमेंट्री को निदेर्शित ‌किया है। ये डॉक्यूमेंट्री दिखाई है इस रेड लाइट एरिया में जन्म लेने वाले बच्चों की कहानी। डॉक्यूमेंट्री का नाम है ‘बॉर्न इंटू ब्रॉथेल्स’।

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आपने ‘चिल्ड्रेन ऑफ पायर’ देखी? ये डॉक्यूमेंट्री है कहानी है उन सात बच्चों की जो बनारस के मर्णिकर्णिका घाट पर दाह-संस्कार का काम करते हैं। इनका पूरा बचपन ही लाशों को संस्कार के कामों में दफ्न हो जाता है। इसे राकेश एस जाला ने बनाया है। इस डॉक्यूमेंट्री को कई अवॉर्ड भी मिल चुके हैं।

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निष्ठा जैन की फिल्म ‘गुलाबी गैंग’ संपत पाल देवी और उनके निडर औरतों के गैंग की कहानी को डॉक्यूमेंट करती है। ये गैंग महिला सशक्तिकरण का काम करती है। इसके अलावा जातिवाद और लिंग-भेद के खिलाफ भी लड़ती हैं।

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‘स्माइल पिंकी’ डॉक्यूमेंट्री तो आपने भी देखी ही होगी। इसे मीगन मायलन ने बनाया है। ये डॉक्यूमेंट्री दिखाती है एक ऐसी बच्ची की कहानी जिसके होंठ जन्म से कटे हैं। ये उसके लुक को तो खराब कर ही रहे थे साथ ही उसे बोलने में दिक्कत भी देते हैं। उसे इसकी वजह से सामाजिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती थी। लेकिल पिंकी को फ्री सर्जरी मिली और उसके होंठों को ठीक कर दिया। उसकी जिंदगी ही इस सफल सर्जरी के बाद ठीक हो जाती है।

 

दलितों के अपमान का जश्न है होली : राज आदिवाल

हमारा होली का त्योहार भी हमारे देश के महान मूलनिवासी राजाओ और विदेशी आर्य लुटेरो के बीच हुए संघर्ष की एक गाथा है , प्राचीन काल मे हमारे देश के कश्यप राजा रहे हिरण्यकश्यप और उसके परिवार की कहानीकहता है हमारा होली का त्योहार ।ऐतेहासिक गाथा के अनुसार हमारे मूलनिवासी राजा”हिरण्यकश्यप” बहुत पराक्रमी हुआ करते थे ,

राजा हिरण्यकश्यप ने विदेशी हिंसक ग्रंथ वेद-पुराणों की नीति को अपने यहा लागू नहीं होने दिया और अपना प्राचीन मूलनिवासी और नागवंशी धर्म ही मानते रहे जिसकी वजह से विदेशी आर्य लुटेरे उनके राज्य पर कब्जा नहीं कर पा रहे थे तो उन्होने अपनी हमेशा की छल और बहरूपिये वाली नीति अपनाने की कोशिश की जिसके सहारे वो हमारे देश मे घुसे थे । उन्होने राजा हिरण्यकश्यप के साथ छल/धोखा करके उनकी हत्या तो कर दीलेकिन उस राज्य की प्रजा ने भी विदेशी आर्य लुटेरों की सत्ता को स्वीकारने से इंकार कर दिया ।
तो उन्होने”हिरण्यकश्यप” के अल्पायु पुत्र “प्रहलाद” को ही राजाबनाने की योजना बनाई लेकिन साथ ही उन्होने ये सोचा कीप्रहलाद को विदेशी आर्य ग्रंथो वेद-पुराणों की शिक्षा देकर उसे अपने वश मे कर लेंगे जिससे प्रजा की नज़र मे तो राजा प्रहलाद ही रहेगा लेकिन वो काम उन लुटेरों के फ़ायदे का करेगा । लेकिन उनके इस षड्यन्त्र का पता “होलिका” को चल गया था तो वो प्रहलाद को बचाने के लिए उसको अपने साथ लेकर सुरक्षित स्थान की ओर चल दी लेकिन उन आर्य लुटेरों कीकुटिल नजरों से वो नहीं बच पाई और

उन आर्य लोगो ने निहत्थी होलिका को जिंदा जलाकर उसको मार डाला ।हम होली अपने महान राजा हिरण्यकश्यप और वीर होलिका के बलिदान को याद रखने हेतु शोक दिवस के रूप मे मनाते थे और जिस तरह मृत व्यक्ति की चिता की हम आज भी परिक्रमा करते है और उस पर गुलाल डालते है ठीक वही काम हम होली मे होलिका की प्रतीकात्मक चिता जलाकर और उस पर गुलाल डालकर अपने पूर्वजो को श्रद्धांजलि देतेआ रहे थे ताकि हमे याद रहे की हमारी प्राचीन सभ्यता और मूलनिवासी धर्म की रक्षा करते हुए हमारे पूर्वजो ने अपने प्राणो की आहुति दी थी । लेकिन इन विदेशी आर्य लुटेरों ने हमारे इस ऐतेहासिक तथ्य को नष्ट करने के लिए उसको तोड़ मरोड़ दिया और उसमे काल्पनिक”विष्णु” और उसका बहरूपिये पात्र “नृसिंह अवतार” की कहानी घुसेड़ दी । और जिसकी वजह से आज हम अपने ही पूर्वजो को बुरा और राक्षस मानते आ रहे है , और इन लुटेरों को भगवान मानते आ रहे है ।
ये विदेशी आर्य असल मे अपने आपको “सुर” कहते थे और हमारे भारत के लोगो और हमारे पूर्वज राजाओ की बेइज्जती करने के लिए उनको “असुर” कहा करते थे । और इनलुटेरों/डकैतो की टोली के मुख्य सरदारो को इन्होने भगवान कह दिया और अलग अलग टोलियो/सेनाओ के मुखिया/सेनापतियों को इन्होने भगवान का अवतार दिखा दिया अपने इन काल्पनिक वेद-पुराणों मे ।

और इस तरह ये विदेशी आर्य हमारे भारत के अलग-अलग इलाको मे अपने लुटेरों की टोली भेजते रहे और हमारे पूर्वज राजाओ को मारकर उनका राजपाट हथियाते रहे । और उसी क्रम मे इन्होने हमारे अलग-अलग क्षेत्र के राजाओ को असुर घोषित कर दिया और वहाँ जीतने वाले सेनापति को विभिन्न अवतार बता दिया ।और आज इससे ज्यादा दुख की बात क्या होगी की पूरा देश यानि की हम लोग इनके काल्पनिक वेद-पुराणों मे निहित नकली भगवानों याने हमारे पूर्वजो के हत्यारो को पूज रहे है और अपने ही पूर्वजो को हम राक्षस और दैत्य मानकर उनका अपमान कर रहे है ।

 

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