बुद्ध के आंगन में ही उपेक्षित हैं धरोहरें

महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली पर ही उनकी अनमोल धरोहरों को संजोने में जिम्मेदार नाकाम साबित हो रहे हैं। हजारों वर्ष पुरानी बौद्धकालीन कई धरोहरें जिले में उपेक्षित पड़ी हैं। पुरातत्व विभाग ने इन धरोहरों को संरक्षित श्रेणी में रखा है, बावजूद उनकी सुरक्षा और नियमित देखरेख से बेपरवाह हैं।
जिम्मेदारों का पूरा ध्यान सिर्फ पिपरहवा में स्थित स्तूप पर ही टिका हुआ है। उसके आसपास स्थित अन्य बौद्धकालीन इमारतें उपेक्षित पड़ी हैं। खुले परिसर में सुरक्षा विहीन इन धरोहरों का तेजी से क्षरण हो रहा है, जिम्मेदार इससे बेखबर हैं।
नेपाल सीमा पर स्थित कपिलवस्तु के शाक्य गणराज्य की राजधानी और महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली होने के पुख्ता प्रमाण मिल चुके हैं। इसके आसपास के क्षेत्र में कई चरणों में हुई खुदाई के दौरान तमाम बौद्धकालीन अवशेष मिले हैं।
इसमें पिपरहवा स्थित स्तूप मुख्य है, जिसके नीचे से भगवान बुद्ध का अस्थि कलश भी बरामद हुआ था। इसी से चंद मीटर दूर गनवरिया में राजप्रासाद के अवशेष मिले थे। सलारगढ़ में बौद्धकालीन इमारत, पिपरी में टीले के नीचे से मंदिर के अवशेष खुदाई में प्राप्त हुए हैं।
लिहाजा इन क्षेत्रों को पुरातत्व विभाग ने विरासत मानते हुए संरक्षित घोषित किया है। प्रत्येक स्थल पर इसका बोर्ड भी लगा है, मगर इन संरक्षित क्षेत्रों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। पिपरहवा स्तूप को छोड़ दें तो अन्य तीनों स्थल उपेक्षा के शिकार हैं।
इनकी देखारेख, सुरक्षा और संरक्षण के माकूल इंतजाम नहीं है। सबसे बुरी स्थिति सलारगढ़ की है। जहां बौद्धकालीन इमारत की न तो घेरेबंदी की गई है और न ही सुरक्षा का ही कोई प्रबंध है। श्रावस्ती मंडल के पुरातत्व सर्वेक्षण प्रभारी यूएन तिवारी ने बताया कि क्षेत्र में मौजूद बौद्धकालीन इमारतों को संरक्षित घोषित किया गया है।
समय-समय पर इसकी देख-रेख होती रहती है। पिपरी में उत्खनन का काम अभी शेष है। इसकी निगरानी रखी जा रही है। सलारगढ़ की बाउंड्री का प्रस्ताव लंबित है। यहां बौद्धकालीन इमारतों का दायरा बड़ा है। ऐसे में एक-दो ईंट खिंसक भी जाए तो कोई विशेष बात नहीं।