ये थे दुनिया में चर्चित सबसे महान भारतीय

समाज को बदलने और देश के इतिहास की धारा का रुख मोड़ने वाले कई बार ऐसी नारकीय परिस्‍थितियों के बीच से आते हैं, जहां उनके बचे और बने की रहने की संभावना ही लगातार खतरे में रहती है। ये परिस्‍थितियां ऐसी होती हैं, जहां मनुष्‍य की मनुष्‍य के रूप मे बने और बचे रहने की संभावना कभी छूने से धूमिल होती है, कभी देखने से धराशायी होती है, तो कभी साथ व पास होने से अपमानित होती रहती है।

लेकिन इन्‍हीं परिस्‍थितियों को बदलने के लिए ऐसे मनुष्‍य भी पैदा होते हैं, जो भाग्‍य के भरोसे नहीं, बल्‍कि इन्‍हीं नारकीय परिस्‍थितियों के बीच ऊपजे अपने जीवन संघर्ष से सबकुछ बदल देते हैं। समाज इनके पीछे चलता है और ये राष्‍ट्र के लिए दीपक की भूमिका निभाते हैं जबकि सैकड़ों  पीढ़ियां युगों तक इनके प्रकाश से मार्गदर्शन पाती रहतीहैं।

 

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर भारतीय सभ्‍यता और सामाजिक इतिहास के ऐसे ही एक महापुरुष हैं, जिसने जीवन की बेहद विकट, जटिल, अमानवीय और जातिवाद की कुंठित और लगातार अपमानित करने वाली स्‍थितियों के बीच खुदको जन-जन के बीच स्‍वीकृत और स्‍थापित किया, और एक दिन वे पूरे भारतीय समाज व राष्‍ट्र के लिए मिसाल बन गए।

14 अप्रैल, 1891 को जन्‍में बाबा साहेब एक विश्व स्तर के विधिवेत्ता थे। एक दलित राजनीतिक नेता और समाज पुनरुत्थानवादी इस महान व्‍यक्‍तित्‍व ने भारतीय संविधान के निर्माता की भी भूमिका निभाई।

एक गरीब दलित परिवार में जन्‍म लेने के कारण बाबा साहेब को सारा जीवन नारकीय कष्टों में बिताना पड़ा, लेकिन इन्‍हीं परिस्‍थितियों को बदलने के लिए उन्‍होंने सारा जीवन लगा दिया। उस समय में वे उन अछूतों में से एक थे, जिन्‍होंने कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रतिभा, बुद्धि और संघर्ष का ही नतीजा था कि कानून की डिग्री प्राप्त करने के साथ ही वे विधि, अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान में उच्‍च अध्ययन करने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स पहुंचे और कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। भारत लौटकर आंबेडकर ने कुछ साल तक तो कोर्ट की प्रैक्‍टिस की, लेकिन जातिवाद में बंटे भारतीय समाज की उन्‍हें चिंता हुई और उन्‍होंने दलितों के लिए काम करना शुरू किया।

बाबा साहेब ने सन् 1927  में छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू किया और सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पीने के पानी के सार्वजनिक संसाधनों को पूरे समाज के लिए खुलवाने की जंग शुरू की और अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने की नई लड़ाई छेड़ी। अंबेडकर ने दलितों के उद्धार के लिए न केवल जमीन पर, बल्‍कि किताबों, पत्रिकाओं के जरिये एक बौद्धिक लड़ाई भी छेड़ी।

भारत विभाजन के आलोचक रहे बाबा साहेब ने उस दौर में गांधी से लेकर नेहरू, व जिन्‍ना तक सभी नेताओं की आलोचना की। पाकिस्‍तान के विभाजन को लेकर वे राजी नहीं थे, इस पर उनकी पुस्‍तक थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी चर्चित है।

15 अगस्‍त 1947 को आजाद भारत के वे पहले कानून मंत्री बने और भारत के संविधान निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाई। वे संविधान सभा के अध्‍यक्ष मनोनित किए गए।

अपने जीवन की सांझ बेला में वे बौद्ध धर्म से बेहद प्रभावित हुए और उन्‍होंने 4 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अपने 50 हजार समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म को अपना लिया। मधुमेह की बीमारी से ग्रसित बाबा साहेब की 6 दिसम्बर 1956 की मृत्यु हो गई।

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