इस गांव में ‘दलित’ लिखा देख फेंक देते हैं बीपीएल कार्ड

राशन कार्ड होने के बावजूद दलितों को पिछले 10 सालों से नहीं मिला राशन।

 

बुंदेलखंड में दलित होना आज भी किसी सजा से कम नहीं है। इसकी ताजा बानगी मऊरानीपुर गांव में देखने को मिली। यहां उनकी जाति की वजह से भेदभाव किया जाता है। आलम यह है कि दलितों को पिछले 10 साल से बीपीएल कार्ड के तहत राशन भी नहीं मिला है। कार्ड पर उनकी जाति देखकर ही उन्हें भगा दिया जाता है। यही नहीं, जॉब कार्ड होने के बावजूद उन्हें काम नहीं मिलता है।
झांसी से करीब 65 किमी दूर मऊरानी नाम का गांव है। चार हजार की आबादी वाले इस बड़ागांव को कई हिस्सों में बांटा गया है। यहां दलितों की भी अलग टोली है, जिनकी आबादी 1500 से ज्यादा है। गांव में दलितों के साथ बड़े पैमाने पर भेदभाव किया जाता है।
दलित होने की वजह से नहीं मिलता राशन
दलित मोहनलाल बताते हैं कि उनका राशन कार्ड 2005 में बना था, जिस पर जाति वाले कॉलम में उनकी जाति ‘चमार’ लिखी हुई है। बस, इसी वजह से उन्हें राशन नहीं मिलता है। गांव के अन्य दलितों का भी यही हाल है। बता दें कि बीपीएल कार्ड पर चावल और गेहूं बेहद कम दरों पर मिलता है, लेकिन दलितों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है।
123 लोगों के ही बने हैं बीपीएल कार्ड
गांव में ज्यादातर दलित किसान हैं और बेहद तंगी में जिंदगी बसर कर रहे हैं। इनमें से सिर्फ 123 लोगों के ही बीपीएल कार्ड बने हैं। इस कार्ड के आधार पर सात रुपए के हिसाब से 15 किलो गेहूं और 10 किलो चावल मिलना तय हुआ है, लेकिन दलितों को कुछ नहीं दिया जाता है। दलित बताते हैं कि सवर्ण जाति की सांठ-गांठ से उनके एपीएल कार्ड बना दिए गए हैं।
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