आरक्षण के रण पर बेबाक बोल: हक-बंदी

 

भारतीय जनता पार्टी की सरकार में आरक्षण के मुद्दे पर सब कुछ ठीक नहीं है। हरियाणा महज इसका ताजा उदाहरण है। इसका कड़वा स्वाद पार्टी हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में चख चुकी है। लेकिन सबक सीखने का शायद भाजपा में रिवाज नहीं है। पिछले एक साल से भी ज्यादा समय में जो भी विवाद हुए उनसे पार्टी ने शायद ही कभी उबरने की कोशिश की हो, ज्यादातर मामलों में हठधर्मिता ही दिखाई है। यही हाल उसकी हरियाणा की राज्य सरकार का भी है। हरियाणा में भी केंद्र की तर्ज पर ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे मनोहर लाल खट्टर की अगुआई में सरकार बनाई गई जो गठन के बाद अपने ही फैसलों के जाल में उलझती चली गई। नतीजा यह रहा कि राज्य में उबाल आ गया और समुदायों के बीच जातीय आधार पर एक विभाजक रेखा खिंच गई। खट्टर के साथ विडंबना यह रही कि एक साल में उनके राजनीतिक समर्थकों और चुनिंदा ‘अपने’ नौकरशाहों ने उन्हें राज्य और उसकी नब्ज को पहचानने की नौबत ही नहीं आने दी। खुद मुख्यमंत्री भी ‘स्वयंसेवकों’ के भरोसे रहे। आरक्षण पर जो कुछ राज्य में हुआ वह अचानक नहीं था, वरन उसकी भूमिका पहले से बन रही थी। लेकिन खट्टर को जमीन से जुड़ने का मौका ही नहीं दिया गया। उनके अपने मंत्रियों ने उनसे सहयोग नहीं किया और उनकी खुफिया एजंसियां भी ऐतिहासिक नाकामी दिखा गर्इं। दहकती आग में घी डालने के लिए प्रदेश में कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोकदल तो थे ही। यही वजह रही कि हालात समझ में आने से पहले ही बेकाबू हो गए। लेकिन केंद्र की चिंता उससे कहीं आगे है। एक उग्र प्रदर्शन के आगे घुटने टेकने की जो फजीहत झेलनी पड़ रही है वह अलग और इस मामले में जो एक अनचाहा रास्ता निकालना पड़ा वह अलग। देश की सरकार तीन दिन तक इस प्रदर्शन का दमन करने का रास्ता खोजती रही और उसमें देश के जेम्स बांड का दर्जा पा चुके सुरक्षा सलाहकार से लेकर सेना और केंद्रीय गृह मंत्रालय के आला पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे। लेकिन हल कोई नहीं और अंत में प्रचंड बहुमत से बनी एक सर्वशक्तिमान सरकार को मिमियाते हुए समर्पण करना पड़ा। राज्य सरकार की अकर्मण्यता तो शायद फिर भी अपने लिए कोई सफाई ढूंढ़ ले लेकिन केंद्र के धुरंधर इससे कैसे बचाव का रास्ता तलाश करेंगे, यह देखने की बात होगी। जाटों को आरक्षण के मामले में पहले राज्य सरकार और बाद में केंद्र सरकार जाट नेताओं को वस्तुस्थिति समझाने में नाकाम रही। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने तो जाटों को आरक्षण देना मान ही लिया था। उससे पहले केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने जाटों को आरक्षण के नाम पर राजस्थान में वोट लूट लिए थे और अपनी सरकार जमा ली थी। राजस्थान में भाजपा को इसका भारी फायदा मिला। हरियाणा में जाटों ने आरक्षण लेने के लिए क्या-क्या नहीं किया!

इतिहास के पन्नों में जाटों के दमन और पीड़ा की खोज शुरू हुई। यों, जाट हैसियत में किसी से भी कम होने को तैयार नहीं। हरियाणा में चौधराहट कायम रखने के लिए इनके बीच गजब की एकता दिखती है जो खापों के फैसलों में अक्सर सामने आती है। बात केंद्र की चिंता की हो रही थी। इधर जाटों को आरक्षण लाभ दिया जाए तो उधर दूसरी जातियां भी विरोध का झंडा उठा कर सड़कों पर उतर आएंगी। दूसरे राज्यों की बड़ी जातियां भी अपने बल पर स्थिति को प्रभावित करने की कोशिश करेंगी तो केंद्र कहां-कहां घुटने टेकेगा? राजस्थान के गुज्जर तो चाहते हैं कि उन्हें ओबीसी से हटाकर अनुसूचित जनजाति घोषित किया जाए। ओबीसी की लगातार बढ़ती सूची में बड़ी जातियों की हिस्सेदारी भी तो कम होती जा रही है। ऐसे में उनकी घबराहट समझ में आती है। यहां यह भी जिक्र के लायक है कि गुज्जर समुदाय की मांग का दूसरी जातियां विरोध कर रही हैं। ठीक वैसे ही जैसे हरियाणा में जाटों को दूसरे समुदायों का विरोध झेलना पड़ रहा है। हरियाणा में यह आग किसने सुलगाई या किसने भड़काई, यह सवाल गौण है। प्रदेश की सत्तारूढ़ सरकार के विरोधियों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे सरकार के लिए समस्याएं खड़ी न करें। चूंकि विरोध और हिंसा का केंद्र रोहतक रहा, इसलिए निशाना हुड्डा पर और जाटों का समर्थन करने के लिए लोकदल पर या हरियाणा के भाजपा सांसद राज कुमार सैनी पर था, जिन्होंने जाटों को आरक्षण का पहले विरोध किया और फिर हिंसा भड़कने के बाद अपना बयान वापस लिया। यों तो केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह जो हरियाणा के मुख्यमंत्री के पद की दौड़ में लंबे समय से हैं, ने भी जाटों का समर्थन किया। सरकार इस जनाक्रोश से निपटने में अपनी नाकामी को ऐसे इल्जामों से बचा नहीं सकती। खट्टर सरकार को न सिर्फ यह समझना होगा कि कमी कहां थी, बल्कि उसे दुरुस्त भी करना होगा। वरना ऐसे हिंसक विरोध आम हो सकते हैं। इससे पहले रामपाल के आश्रम के बाहर भी सरकारी एजंसियां घुटने टेक चुकी हैं। एक हफ्ते तक ऐसा लगा कि आम लोग के साथ सरकार भी आंदोलनकारियों की बंधक ही है जिसे छुड़ाने के लिए केंद्र सरकार एक के बाद एक नाकाम कोशिश कर रही थी। सरकार के मंत्री और पुलिस अधिकारी अपनी जान बचा कर भाग रहे थे। रोहतक के एक मंत्री ने अपने परिवार को हेलिकॉप्टर से राज्य के बाहर निकाला तो एक आला अधिकारी मौके से किसी तरह चुपचाप भाग निकला। सरकार और प्रशासन ही दहशत में दिखे तो आम आदमी की क्या हस्ती थी! उकसाने वाली प्रतिक्रियाओं ने आंदोलन को और भड़काया। जिन लोगों को मुख्यमंत्री की आंखें खोलनी थी वही उन्हें लोरी सुनाते रहे। सेना की मौजूदगी में भी हिंसा बढ़ती ही गई। बिना सोच-विचार के सरकार ऐसे समाधान लाई जिसे प्रदर्शनकारियों ने सिरे से नकार दिया। जैसे ही सरकार के झुकने के संकेत आए आंदोलनकारी तो मौके पर फैसला लेने पर अड़ गए। यह हिंसक संघर्ष उस समय हुआ जब राज्य सरकार मुख्यमंत्री के हालिया चीन दौरे के परिणामों से फूली नहीं समा रही थी। सरकार का दावा है कि उसने चीन के बड़े औद्योगिक समूह डालियन वांडा के साथ सोनीपत के खरखौदा में 66 हजार करोड़ के निवेश का समझौता किया है। अपने ‘हैपनिंग हरियाणा’ अभियान के तहत मुख्यमंत्री दूरदराज के प्रदेशों में जाकर उद्योगपतियों को निवेश के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। लेकिन इस आंदोलन ने सरकार के इस बड़े अभियान को व्यावहारिक तौर पर शुरू होने से पहले ही एक जोरदार झटका दिया है जिससे उबरना आसान नहीं है। इस सदी के शुरुआती सालों में भी ऐसे ही कारणों से राज्य से उद्योगों का पलायन शुरू हो गया था। ऐसे में जाट आरक्षण से उठे संकट के देश व राज्यव्यापी दुष्परिणाम होना तय है। राज्य सरकार की बड़ी नाकामी यह भी रही कि वह लोगों को यह नहीं समझा पाई कि इस दिशा में प्रयास कभी रुके ही नहीं। हुड्डा ने 2014 में चुनावों के ऐन पहले जाटों को आरक्षण देने के लिए अधिसूचना जारी कर दी थी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया था। मौजूदा सरकार ने इस पर पुनर्विचार के लिए याचिका लगा रखी है। लेकिन सरकार के स्तर पर मामले को वहीं छोड़ दिया गया था। अब जब आंदोलन बेलगाम हुआ तब राज्यस्तरीय समितियां और विधेयक लाने की योजना बन रही है। लेकिन इसमें काफी देर हो चुकी है। सरकार को सरगर्म करने के लिए कितने निर्दोषों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। क्या इसकी कोई भरपाई हो सकती है? आरक्षण पर किसी साहसिक फैसले की किसी सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। हरियाणा में फैली आरक्षण की आग और इसके भयावह परिणामों ने एक बार फिर से इस मुद्दे को चर्चा में ला दिया है। इसके कारण कई ऐसे सवाल उठ रहे हैं जिनके जवाब न मिलने की सूरत में सिर्फ अराजकता ही बचती है जो हरियाणा में हुआ भी। अहम सवाल यही है कि क्या देश में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का सिद्धांत मान्य होगा। हरियाणा में यही हुआ कि आंदोलन में डंडे के जोर पर अपनी बात मनवाई गई। निर्दोषों पर निशाना साधो, उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाओ और सरकारों को घुटने पर ले आओ। क्या ऐसे संकट से निपटने की सरकारी अक्षमता क्षम्य है? सिर्फ जान-माल का नुकसान नहीं हुआ, बल्कि समुदायों के बीच दूरियां बढ़ीं। क्या गारंटी है कि हरियाणा का जाट आंदोलन बाकी सवर्ण समुदायों के लिए प्रेरणास्रोत नहीं बनेगा? इसकी कामयाबी के कारण ही कानपुर में सवर्ण जातियां आरक्षण की मांग को लेकर आगे आ गर्इं। पाटीदारों का आंदोलन गुजरात सरकार को हिला चुका है। आंध्र में कापू समुदाय के आंदोलन की आग भड़की है। लिहाजा सरकार के पास क्या घुटने टेकने के अलावा कोई विकल्प बचेगा, अगर कल को दूसरी सवर्ण जातियां भी डंडा उठा लें। क्या हरियाणा में घुटने टेकना वाजिब था? अगर नहीं तो क्या केंद्र और राज्य सरकारों को भविष्य में यह जवाब देना पड़ेगा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? सवाल यह भी है कि क्या देश में भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई वगैरह मुद्दे हल हो गए हैं कि अवाम इस दिशा में चल पड़ा है। सरसंघचालक मोहन भागवत के आरक्षण पर एक बयान की बदौलत बिहार में मुंह की खाने वाली भारतीय जनता पार्टी से क्या कोई उम्मीद है कि वह मामले को सिर झुका कर स्वीकार करने के अलावा किसी तर्कसंगत तरीके से हल कर सके? अगर हर समुदाय को ऐसे ही धमका कर आरक्षण का लाभ लेना है तो आरक्षण को लेकर की गई संवैधानिक व्यवस्था का क्या औचित्य है? आरक्षण की व्यवस्था समाज के कमजोर और हाशिये के बाहर रह गए वर्गों के लिए की गई थी। सत्ता और तंत्र में जिन सामाजिक वर्गों की भागीदारी लगभग नहीं के बराबर थी, उन्हें मुख्यधारा की दौड़ में लाने के मकसद से यह विशेष व्यवस्था की गई थी। लेकिन सच यह है कि आरक्षण की व्यवस्था का यह यथार्थ व्यापक जनता को समझा पाने में सरकारें अब तक नाकाम रही हैं। यही वजह है कि कई बार आरक्षण को गरीबी कम करने या उससे निपटने के लिए की गई सरकारी व्यवस्था मान लिया जाता है। लेकिन गरीबी उन्मूलन या इससे निपटने के लिए सरकारें बहुत सारी दूसरी योजनाएं चलाती हैं। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि सत्ता और समूचे तंत्र में कई वजहों से पीछे छूट गए सामाजिक वर्गों-जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था में अगर आर्थिक आधार का घालमेल किया गया, तो आज पाटीदार या जाट जैसी सामाजिक-आर्थिक रूप से सक्षम जातियां आरक्षण में हिस्सेदारी की मांग उठा रही हैं, कल इस तरह के हालात और जटिल हो सकते हैं। सरकार का काम संविधान में की गई व्यवस्था को बचाना है, उस पर ठीक से अमल करना है, अपनी लापरवाहियों और राजनीतिक दलों के उकसावे में समाज में बराबरी के मकसद से की गई किसी विशेष व्यवस्था को अराजकता की आग में झोंके जाते चुपचाप देखना नहीं…! आरक्षण की मांग दो दशक पुरानी साल 1991 में गुरनाम सिंह आयोग की रिपोर्ट में जाटों के अलावा अन्य सात को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की सिफारिश थी। वहीं 1995 और 2011 में भी आयोग गठित हुए। 2004 में कांग्रेस सत्ता में आई तो तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने पहल की। 2011 के अप्रैल में आंदोलन हुआ, इसके बाद राज्य सरकार ने केसी गुप्ता आयोग गठित किया। आयोग ने 2012 की अपनी सिफारिश में जाटों के अलावा जट सिख, रोड़, त्यागी और बिश्नोई समुदाय को विशेष पिछड़ा वर्ग में शामिल करने का उल्लेख किया। सरकार ने इसे मानते हुए दस फीसद कोटा मंजूर कर लिया। लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया था। मामला पुनर्विचार के लिए अब भी है। याद आया 1984 का मंजर आरक्षण आंदोलन में आगजनी, लूटपाट और हिंसक घटनाओं ने ’84 के सिख दंगों जैसी सिहरन पैदा कर दी। आंकड़ों को नजरअंदाज कर दें तो यहां भी कमोबेश वही हुआ। राज्य सरकार ने जाटों को आरक्षण देने और बेकसूर लोगों को इंसाफ देने की घोषणा की है। देखते हैं पहले क्या होता है? क्या प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी आरोपियों का पता लगा सकेंगे? आंदोलन में एक विशेष समुदाय ने अन्य को निशाना बनाया है। पीड़ितों के बयानों को कैसे झुठलाया जा सकता है जिसमें उन्होंने अपने ही लोगों को पेट्रोल बम और देसी हथियारों से घरों में हमला और आगजनी करते देखा। आंदोलन के कर्ताधर्ता लूटपाट और आगजनी करने वालों को असामाजिक तत्त्व बता रहे हैं। पर ये तत्व कौन थे? आंदोलन समर्थकों ने उन्हें रोका क्यों नहीं? बेलगाम आंदोलन, असहाय सरकार: हरियाणा में आंदोलन का प्रभाव जाट बहुल इलाकों में ज्यादा रहा। विशेषकर रोहतक, सोनीपत, झज्जर, जींद व भिवानी में। डीएचओ हरियाणा के मुताबिक, आंदोलन के दौरान हुई झड़पों में 30 लोगों की मौत हुई। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि इन झड़पों के दौरान 200 से ज्यादा लोग घायल हुए। 33 बसें जलाई गर्इं, 99 क्षतिग्रस्त हुर्इं। हरियाणा रोडवेज को 15 करोड़ का नुकसान हुआ। रेल सेवा ठप होने से विभाग को 100 करोड़ का नुकसान हुआ। स्टेट बैंक ऑफ पटियाला की रोहतक शाखा उपद्रवियों ने खाक कर दी। आंदोलन के दौरान आगजनी और तोड़फोड़ से 20 हजार करोड़ का नुकसान हुआ। एसोचैम ने इसे 34 हजार करोड़ का नुकसान बताया है। रास्ता जाम से शुरू हुआ आंदोलन दूसरे दिन हिंसक हो गया। आगजनी और लूटपाट की घटनाओं से कानून व्यवस्था ठप हुई। रोहतक में आंदोलन के पहले दिन भीड़ में से किसी ने गोली चलाई, जिससे अर्द्धसैनिक जवान जख्मी हो गया और फिर उसके बाद हालात बिगड़े। जवाबी कार्रवाई में एक आरक्षण समर्थक की मौत के बाद आंदोलन की जैसे दिशा ही बदल गई। जाट संगठनों के प्रमुख नेताओं की जगह कमान युवकों के हाथ में आ गई। आंदोलन में हरियाणा पुलिस मूकदर्शक रही। कहीं कोई कार्रवाई नहीं की। पुलिस महानिदेशक यशपाल सिंघल शुरू से ही पुलिस के बजाए अर्द्धसैनिक बलों का जिक्र करते रहे। सेना आने के बाद पुलिस वैसे ही गौण हो गई। रोहतक में सबसे पहले उग्र भीड़ ने वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु के आवास को निशाना बनाया। वहां आगजनी और तोड़फोड़ के समय उपद्रवियों को रोकने वाला कोई नहीं था। रोहतक भाजपा दफ्तर में आगजनी के बाद गोहाना में विधायक जगबीर मलिक के घर के बाहर तीन दुकानों में आग लगा दी गई। रोहतक में बीस से ज्यादा प्रतिष्ठानों को आग के हवाले कर दिया गया। शॉपिंग माल से लेकर कारों के शोरूम आंदोलनकारियों के निशाने पर रहे। हुंडई, टोयटा और अन्य कंपनियों के शोरूमों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई। करोड़ों रुपए की नई कारें खाक कर दी गर्इं। 26 पेट्रोल पंपों में आग लगा दी गई। आगजनी के शिकार पानीपत टोल प्लाजा और रेलवे के अनुसार एक दर्जन स्टेशनों में आग लगा दी गई। तीन रेल इंजिन क्षतिग्रस्त हुए और कुछ स्थानों पर रेल पटरियों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ। चार जिलों में कर्फ्यू, देखते ही गोली मारने के आदेश के बावजूद हिंसक घटनाएं होती रहीं। हरियाणा में आने वाले सभी राष्ट्रीय राजमार्ग पूरी तरह से बंद होने की वजह से हजारों वाहन जहां-तहां फंस गए। भीड़ ने हरियाणा रोडवेज की दर्जनों बसों के अलावा सड़कों पर खड़े निजी वाहनों में आग लगा दी। आरक्षण की मांग पर प्रदेश का यह पहला बड़ा आंदोलन रहा जिसमें व्यापक स्तर पर जान-माल का नुकसान हुआ। सरकारी तौर पर आरक्षण की मांग मानने की घोषणा के बाद भी उपद्रव होते रहे। प्रमुख दलों इंडियन नेशनल लोकदल और कांग्रेस नेताओं ने शांति की अपील से पहले सरकार पर दोषारोपण कर जैसे आग में घी का काम किया। इनेलो ने कानून व्यवस्था भंग होने के कारण प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की मांग की। कुरुक्षेत्र से भाजपा सांसद राजकुमार सैनी के बयान से जाटों में गुस्सा फैला। सैनी इससे पहले भी समुदाय को आरक्षण देने पर विरोध जता चुके हैं।

किसने क्या कहा:

साजिश का भी पता लगाएंगे: आंदोलन में हिंसक घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण हैं। आगजनी और लूटपाट करने वालों की पहचान के बाद कार्रवाई होगी। आकलन के बाद नुकसान की भरपाई करेगी सरकार। आंदोलन के पीछे साजिश का भी पता लगाएंगे। (मनोहर लाल खट्टर, मुख्यमंत्री, हरियाणा)

मिलेगा इंसाफ: सरकार आरक्षण आंदोलन में आगजनी और लूटपाट से नुकसान उठा चुके लोगों के साथ है। आकलन के बाद उन्हें पर्याप्त मुआवजा दिलाया जाएगा। निर्दोष लोगों के साथ बेइंसाफी नहीं होने दी जाएगी। (अनिल विज, स्वास्थ्य मंत्री, हरियाणा)

बातचीत की राह ही सही: किसी भी मांग के लिए हिंसा सही रास्ता नहीं। बातचीत से समस्या सुलझाना सही मार्ग है। आंदोलन के दौरान जो हुआ उससे मन बड़ा व्यथित है। (कैप्टन अभिमन्यु, वित्त मंत्री, हरियाणा)

नुकसान की भरपाई करे केंद्र: केंद्र सरकार आंदोलन के दौरान आर्थिक नुकसान उठा चुके लोगों की भरपाई करे। लोग संयम और भाईचारा बनाकर रखें यही राज्य के हित में है। (भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री, हरियाणा)

हिंसा होना दुर्भाग्यपूर्ण: सरकार राज्य में शांति और सौहार्द के लिए हरसंभव प्रयास करेगी। आरक्षण आंदोलन का हिंसक हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। (राव इंद्रजीत सिंह, केंद्रीय मंत्री)

प्रजातंत्र की मौत: हरियाणा में प्रजातंत्र की मौत हुई। आरक्षण समर्थकों ने डंडे के जोर पर मांग मनवाई। पार्टी छोड़ने के अपने पूर्व के बयान पर कायम हूं। विवादित बयान पर कारण बताओ नोटिस की जानकारी नहीं है। (राजकुमार सैनी, भाजपा सांसद, कुरुक्षेत्र) – source