जाति की क्रूरता

राजस्थान के डूंगरपुर जिले की एक घटना ने हमारी सामाजिक प्रगति पर गहरा सवालिया निशान लगाया है। गौरतलब है कि डूंगरपुर के पचलासा गांव में विजातीय विवाह करने वाली एक महिला को उसके भाइयों और परिवार के अन्य सदस्यों ने दिनदहाड़े गांव के चौराहे पर केरोसिन छिड़क कर जिंदा जला दिया। जाति से जुड़े रूढ़ कायदों या चलन का दबाव कितना गहरा होता है यह किसी से छिपा नहीं है। जिसे इस तरह की कट््टरता का पता नहीं, उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि उसे भारत का सबसे कड़वा यथार्थ मालूम नहीं है। जाति का अहंकार और जाति का दंश, दोनों अपने देश में किसी भी अन्य मनोभाव से ज्यादा स्थायी और गहरे हैं।

ये मानसिक बेड़ियों की तरह हैं। यही नहीं, ये हमारे समाज की सबसे गहरी दरारें भी हैं। समाज को कथित ऊंच-नीच की श्रेणियों में बांटने वाली व्यवस्था सबसे ज्यादा दो चीजों पर टिकी रही है। एक, खानपान का संबंध, और दूसरा, विवाह का संबंध। रोटी के रिश्ते की वर्जनाएं बहुत हद तक टूट चुकी हैं। पर जाति के बाहर विवाह आमतौर पर अब भी नहीं होते। जो थोड़े-से होते हैं वे ज्यादातर संबंधित परिवारों की बगैर मर्जी के। ऐसे मामले अपवाद ही कहे जाएंगे जिनमें विवाह अंतर्जातीय होने के बावजूद परिवारों की सहमति और भागीदारी रहती हो। अंतर्जातीय विवाह वाले बहुत-से युगलों को अपना घर-परिवेश छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ता है। अलग-थलग पड़ जाने के कारण, और कहीं-कहीं डर की वजह से भी। पर कई मामलों में यह भी होता है कि उनके परिजन देर-सबेर मान जाते हैं, या कम से कम उनका गुस्सा ठंडा पड़ जाता है। पर ऐसे युगल भी मिलेंगे जिन्हें अपने परिजनों या गांववालों के भय से भागना पड़ा और वे कभी लौट नहीं पाए।

पचलासा की घटना में जान गंवाने वाली महिला को विजातीय विवाह किए आठ साल हो चुके थे। उसकी एक तीन साल की बच्ची भी है। रमा कुंवर ने आठ साल पहले अपने गांव के अन्य जाति के एक युवक से विवाह किया था। विवाह के बाद दोनों कहीं और रहने लगे। पिछले हफ्ते वह अपने गांव में ससुराल आई थी। जब उसके भाई और मायके के अन्य लोगों को पता चला तो उन्होंने उसे घर से खींच कर बाहर निकाला, उसकी पिटाई की और सबके सामने जिंदा जला दिया। बेशक यह एक परिवार की बर्बरता है, जिसकी जड़ें एक खास मानसिकता में हैं, पर इसी लिहाज से इसमें बाकी समाज की भी क्रूरता प्रतिबिंबित होती है।

आखिर दिनदहाड़े बीच गांव में यह कांड होने के बावजूद उस महिला को बचाया क्यों नहीं जा सका? पर ऐसा समाज क्या एक गांव तक सीमित है? अंतर्जातीय विवाह की हिम्मत दिखाने वालों का साथ देने के लिए कितने लोग आगे आते हैं? कई मामलों में तो उन्हें कानून या प्रशासन का संरक्षण भी नहीं मिल पाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में देश भर के पुलिस महकमों को निर्देश दिया था कि अंतर्जातीय विवाह करने वालों को अगर कहीं परेशान किया जाता है, तो उन्हें सुरक्षा दी जाए। पर उत्पीड़न के अधिकतर मामलों में इस निर्देश का अनुपालन नहीं होता। पर उससे भी बड़ा सवाल समाज के सलूक का है।

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