राष्ट्रवाद ने कैसे भारत के ‘भारतीय’ को हिन्दुस्तान का ‘हिन्दू’ बना डाला ?

राष्ट्रवाद ने कैसे भारत के ‘भारतीय’ को हिन्दुस्तान का ‘हिन्दू’ बना डाला ?

 

 

जिस वक़्त संविधान सभा भारत के लोगों के लिए उसका सर्वोच्च ग्रन्थ ‘भारत का संविधान’ तैयार कर रही थी, उसी वक़्त कम से कम तीन ताक़तें इसके ख़िलाफ़ गोलबन्द थीं. पहली ताक़त थी भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (CPI). इसके नेता बी टी रणदिवे ने तेलंगाना में विद्रोह कर दिया था. वो तेलंगाना में कम्यूनिस्ट ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ चाहते थे. नेहरु ने उनके विद्रोह को कुचल दिया. तीन साल बाद कम्यूनिस्टों ने अपनी नीति छोड़ दी और मुख्यधारा में आकर चुनावों में हिस्सा लिया. दूसरी ताक़त थी हिन्दुत्ववादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसका राजनीतिक चेहरा हिन्दू महासभा. आज़ादी के बाद संघ प्रमुख माधव सदाशिव उर्फ़ गुरु गोलवलकर ने जिस हिन्दू-राष्ट्रवाद की कल्पना की वो ‘धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र’ का विरोधी था. संघ ने महात्मा गांधी और कांग्रेस पर ‘मुसलिम तुष्टिकरण’ का आरोप लगाते हुए उनका जमकर विरोध किया.

संघ का ये विरोध इतना उन्मादी था कि जल्द ही संघ के पूर्व कार्यकर्ता नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी. तब गृहमंत्री सरदार पटेल ने संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया. 1949 में इसे तभी हटाया गया जबकि संघ ने बाक़ायदा लिखकर दिया कि वो भारत के संविधान को स्वीकार करते हैं तथा इसके प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेंगे. तीसरी ताक़त थी दक्षिण के तमिल भाषियों की, उत्तर पूर्व में नागाओं की और उत्तर पश्चिम में जम्मू-कश्मीर की. इन तीनों का मानना था कि उनकी राष्ट्रीयता अलग होनी चाहिए क्योंकि वो भारतीय नहीं हैं. लिहाज़ा, उन्हें आत्म निर्णय का हक़ मिलना चाहिए. ये लोग ख़ुद को संवैधानिक राष्ट्रवाद से अलग रखना चाहते थे. बाद में धीरे-धीरे इन लोगों ने भी ख़ुद को भारतीय राष्ट्रवाद और देशभक्ति के सिद्धान्तों से जोड़ लिया. इन्हें मुख्य राजनीतिक धारा से जोड़ने में भारतीय संविधान के ‘भेदभाव-विरोधी’ स्वरूप ने सबसे अहम भूमिका निभायी.

आज़ाद भारत के पहले राष्ट्रवादी सिद्धान्त को अम्बेडकर, नेहरु और उनकी कांग्रेस ने परिभाषित किया. इसने संविधान को स्वीकार करने वाली तमाम विचारधाराओं को अपने-अपने ढंग से फलने-फूलने का मौक़ा दिया. इसीलिए रूसी या चीनी मॉडल के द्वन्द में फंसी सीपीआई, पहले आम चुनाव में न सिर्फ़ लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल बनी बल्कि केरल में उसने सत्ता भी सम्भाली. लेकिन गांधी की हत्या के बाद नेहरु काल में संघ सुस्त ही पड़ा रहा. नेहरु का मानना था कि संघ का ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ एक ऐसी फासीवादी विचाराधारा है जो भारतवर्ष के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है. इसके बावजूद, उन्होंने संघ को राजनीतिक मुख्य धारा से जुड़ने और चुनाव में हिस्सा लेने का मौका दिया. नेहरु के जमाने में ही तमिल राष्ट्रवादी पेरियार ने तिरंगे और संविधान को जलाया भी. लेकिन देश ने इसे महज़ मज़ाक की तरह ही देखा. तमिल भाषी पेरियार को मलाल था कि नेहरु के राष्ट्रवाद में वो कभी ‘राष्ट्रीय’ पहचान नहीं पा सकते.

नेहरु-काल में ही ये स्थापित हुआ कि व्यक्ति, समाज और क्षेत्रवाद से जुड़े तमाम छोटे-बड़े स्वार्थों से ऊपर है देश या राष्ट्र. संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान – इसी ‘राष्ट्रभक्ति और देशभक्ति’ के प्रतीक बने. प्रतिमान बना कि हमें देश की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर रहना चाहिए. यानी महाभारत काल और रजवाड़ों के दौर में जो स्वामी-भक्ति, राजा के प्रति रखी जाती थी, वही अब संविधान के प्रति रखनी है. साफ़ है कि अम्बेडकर की राष्ट्रवाद की परिकल्पना के प्रति शुरुआत में संघ, कम्यूनिस्टों तथा नगालैंड और जम्मू-कश्मीर के लोगों की धारणा एक जैसी नहीं थी. लेकिन कालान्तर में सभी ने संविधान के प्रति आस्था रखने को ही ‘राष्ट्रभक्ति और देशभक्ति’ के रूप में स्वीकार किया.

नेहरु काल में ‘राष्ट्रभक्ति और देशभक्ति’ के स्वरूप ने 1962 में भारत-चीन युद्ध के वक़्त भी बदलाव देखा. उस वक़्त कम्यूनिस्टों को इसलिए जेल में डाल दिया गया क्योंकि ये शक़ था कि वो चीनियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं. नेहरु के निधन के बाद 1965 में पाकिस्तान ने युद्ध छेड़ दिया. इन दो युद्धों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया. 1967 में नक्सलवादी विरोध के रूप में नये एक राष्ट्रवाद ने अपना सिर उठाया. बेरोज़गारी ने इसे हवा दी. शिवसेना ने क्षेत्रीयता की बदौलत शहरी जनमानस को भड़काने की कोशिश शुरू की. लेकिन इससे पहले लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान जय किसान’ के नारे की बदौलत जैसे राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाया उसका नाम था राष्ट्र-निर्माण. इससे सैनिक और किसान दोनों के कर्त्तव्यों को श्रेष्ठ राष्ट्रभक्ति के प्रतीक की तरह देखा गया. इसी दौर में पहली हरित क्रान्ति के बीज पड़े.

लेकिन इन्दिरा गांधी के काल में राष्ट्रवाद ने फिर करवट ली. बांग्लादेश युद्ध के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें दुर्गा कहा तो देवकान्त बरुआ ने नारा दे दिया, ‘इंडिया इज़ इन्दिरा’. फिर इन्दिया गांधी ने वामपन्थियों के विरोध के कुचलने के लिए उनके पीछे विदेशी ताक़तों का हाथ होने का आरोप लगाया. फिर भी हालात क़ाबू में नहीं आये तो तानाशाही दिखाते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी और गांधीवादियों समेत तमाम विरोधियों को राष्ट्रविरोधी बताते हुए जेलों में डाल दिया गया. इन्दिरा को लगा था कि धार्मिक चरमपन्थी (संघ) और पूंजीपतियों का गठजोड़ भारत के लिए ख़तरा है.

तभी जयप्रकाश नारायण ने ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का आह्वान करके देश को वैकल्पिक राष्ट्रवाद की राह दिखायी. 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी. इसमें हिन्दुत्ववादी संघ भी शामिल था. इससे संघ के विचारों को वैधानिकता मिली. जनता पार्टी ने संविधान में दिये गये नागरिक अधिकारों और उसके बुनियादी चरित्र (Basic Structure) को बहाल किया. लेकिन इसी दौर में राष्ट्रवाद के विरोधाभासी चेहरे ने फिर आकार लिया. अब एक ओर नेहरु के राष्ट्रवाद के समर्थक थे तो दूसरी ओर हिन्दूवादी संघ.

1980 के बाद भारतीय राष्ट्रवाद में ज़बरदस्त भूचाल आया. पंजाब, असम और जम्मू-कश्मीर में धर्म, जाति और क्षेत्रवाद को लेकर खड़े हुए ‘उप-राष्ट्रवाद’ के तहत ख़ूब हिंसा और नरसंहार हुए. इसी दौर में ‘भारत माता’ वाला वो राष्ट्रवाद अपने नये रंग-रोग़न के साथ आगे आया जिसने कभी आज़ादी की लड़ाई में भारतीयों को संगठित किया था. संघ ने अब खुलकर उस हिन्दुत्व की राह चलने की घोषणा की जिसे वीर सावरकर ने राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया था. इसे ही ‘हिन्दू राष्ट्र’ का नारा बनाया गया. लेकिन इसी दौर में इन्दिरा गांधी की हत्या, सिख-विरोधी दंगे, शाह बानो मामला और बाबरी मसजिद विवाद ने ऐसा माहौल बनाया कि ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ को ख़ूब हवा मिली. मलियाना और हाशिमपुरा के नरसंहारों ने भी इस आग के लिए घी का काम किया.

1992 में संघ के ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ ने बाबरी मसजिद को ध्वस्त कर दिया. इसके बाद हुए साम्प्रदायिक दंगों ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक बार फिर से आज़ादी के पहले वाले दौर में पहुंचा दिया. हिन्दू-मुस्लिम झगड़े ने समाज को बुरी तरह से धार्मिक ध्रुवीकरण में जकड़ लिया. इसे एक ओर पाक समर्थित आतंकवाद से लगातार रसद मिलती रही तो दूसरी ओर गुजरात के दंगों ने रही-सही ज़रूरत पूरी कर दी. इस तरह, 2014 के चुनावों तक हिन्दू राष्ट्र की ऐसी धारणा ने आकार ले लिया था, जिसमें भारत में रहने वाले हरेक मुसलमान और ईसाई को भी हिन्दू कहा जाए. दलील दी गयी कि हिन्दुस्तान में रहने वाला हरेक व्यक्ति हिन्दू है. पहले भारत में रहने वाला हरेक व्यक्ति भारतीय होता था.

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