रोहित वेमूला खुदकुशी मामला : तेलंगाना के सभी विश्वविद्यालयों ने बुलाया बंद

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला की खुदकुशी पर विरोध बढ़ता ही जा रहा है। आज तेलंगाना की सभी यूनिवर्सिटियों ने बंद बुलाया है। यह बंद रोहित की खुदकुशी को लेकर आंदोलन कर रही ज्वांइट एक्शन कमेटी की ओर से बुलाया गया है।

 

रोहित वेमूला खुदकुशी मामला : तेलंगाना के सभी विश्वविद्यालयों ने बुलाया बंद

रोहित ने 17 जनवरी को यूनिवर्सिटी के एक कमरे में खुदकुशी कर ली थी। रोहित और उसके चार साथियों को यूनिवर्सिटी के हॉस्टल से निलंबित कर दिया गया था, जिसके कुछ ही दिन बाद रोहित ने खुदकुशी कर ली थी।

प्रदर्शन कर रहे छात्रों का आरोप है कि केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कार्रवाई के लिए केंद्र को चिट्ठी लिखी थी, जिसके बाद ही छात्रों को निलंबित किया गया था। ये छात्र बंडारू दत्तात्रेय और यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर अप्पा राव को बर्खास्त करने की मांग पर अड़े हैं।

 

 

Dalits and tribals should defeat caste with capital

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The economic empowerment of Dalits and tribals through policy reforms under the Make in India initiative is the only way to beat prejudices entrenched in the socio-political system, says chairman of the Dalit Indian Chamber of Commerce and Industry, Milind Kamble. In an interview to The Indian Express, he said, “Dalits and tribals should pursue a simple motto. Defeat caste with capital.”

Time has come when we have to work to ensure that Dalits and tribals evolve as job providers and not seekers, he said.

DICCI is all set to sign MoUs worth Rs 700 crore with the state government during the Make in India Week in Mumbai, to be held from February 13 to February 18. In Maharashtra, Dalits form 10.8 per cent of the population and tribals 8 per cent.

While appreciating the Maharashtra government’s decision to reserve 20 per cent industrial plots for SC/STs, Kamble said, “We have to come to terms with reality. Jobs in government (public) sectors are shrinking. The industrial growth is an opportunity to strengthen the SMSE.”

The Dalits and tribals with no land holdings will be the direct beneficiaries of the industrial growth, he said. “The generation-next Dalits and tribals, who are educationally empowered, have become very aspirational and are willing to take on the entrepreneurship challenge,” Kamble said.

According to Kamble, the DICCI has 3,000 millionaires, out of which 100 entrepreneurs have turn-overs of more than Rs 100 crore. “In 2001, total strength of SMSE in India was one crore. In 2016 the total number of SMSEs has multiplied to six crore. Now take the comparative figures for SC/ST. In 2001, the total SC/ST-run SMSE was 15 lakh. Today, it is 90 lakh. The SC/STs account for 15 per cent of the total SMSE sector in the country,” he said.

The DICCI chairman believes Make in India can offer solutions to the agriculture sector, on which almost 50 to 55 per cent of the population is dependent. He said, “When we talk of foreign investment in the food or textile sector, its beneficiaries will be farmers and farm labourers.” However, the government will have to come out with an integrated policy for that, he said.

Dismissing apprehensions raised in some quarters that Make in India would be industry-focussed and would ignore agriculture, Kamble said, “It is illogical. If the textile sector grows, benefits will trickle down to farmers who cultivate the cotton.” Similarly, industrial growth helps to grow and sustain SMSEs, he said.

“In 1952, Dr Babasaheb Ambedkar, in his first election manifesto released under the banner of SC Federations, talked about corporation farming as a must,” Kamble said. Ambedkar warned that the present farming model with small landholdings and disintegrating families would not be affordable in the long run. He had clearly said, ‘We cannot afford farming. We will have to bring mechanisation and modernisation to evolve a new model that would being cost down and higher productio’,” the DICCI chairman said.

DICCI, with presence in almost 18 states across India, has been working to promote entrepreneurship amongst the backwards castes. Kamble said, “In the past decade, there has been visible change, with the generation-next no longer willing to be at the mercy of the political system. From Maharashtra to West Bengal, the mood among the Dalits and tribals is to attain self reliance.” The new-age Dalits and tribals are aware that economic well-being can provide them not only financial, but also social security, as it elevates their stature in society, Kamble said.

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राजस्थान में दलित छात्र संगठनों की आहट

समय के बदलाव के साथ भारत के सामाजिक परिवेश में भी बदलाव आया है| भारत मे संविधान के लागू होने के बाद दलित, पिछड़ों व वंचितों को शिक्षा,बिजली व पानी को प्राप्त करने का कानूनी हक मिला,जिसकी बदोलत आज दलित वर्ग शिक्षा के प्रति जागृत हुआ है|
मगर जन्म के साथ जुड़ी जाति व्यवस्था की जड़े उच्च शिक्षण संस्थाओ मे भी आसानी से देखी जा सकती है| कई प्रकरणों में सामने आया है कि दलित वर्ग के युवा विधार्थी जाति व्यवस्था के आधार पर प्रताड़ित होते है|
कई दलित छात्र मानते है कि भाजपा के सम्बंधित संगठन एबीवीपी व कांग्रेस के एनएसयूआई में उन्हें सीटे बढाने,पास को प्रवेश या महाविधालय की समस्या जैसी मांगो का समर्थन तो मिलता है मगर सामाजिक व जाति व्यवस्था तथा आरक्षण जैसे मसलो पर वो खामोश नजर आते है|
दलितो के मसीहा डॉ. अंबेडकर के गृहराज्य महाराष्ट्र और कभी मायावती का शासन क्षेत्र उत्तर प्रदेश मे भी दलित युवा छात्र अपने हक के लिए अम्बेडकर के नाम पर कई छात्र संगठन बनाकर अपनी आवाज बुलन्द करते हुए नजर आते थे,मगर पिछले दो वर्षो मे राजस्थान मे भी कई दलित छात्र संगठन सामने आये है, जिनमें भारत विधार्थी मोर्चा (बीवीएम), डॉ. अंबेडकर स्टुडेंट फ्रंट अॉफ इण्डिया (डीएएसएफआई) और एससी एसटी स्टुडेंट युनियन प्रमुख नाम है|

भारत विधार्थी मोर्चा बीएमपी नामक राजनैतिक पार्टी से अनुदान प्राप्त है मगर दलित छात्रों के हित में संघर्षरत है,लेकिन इसका अधिकांश प्रचार प्रसार केवल बाडमेर मे ही नजर आता है| वही डॉ राम मीणा व्दारा संचालित एससी एसटी स्टुडेंट युनियन का कार्य क्षेत्र उदयपुर में है| बीवीएम से जुड़े एक कार्यकर्ता ने बातचीत में बताया कि” हम एससी के साथ एसटी,ओबीसी व अल्पसंख्यक को साथ जोड़ते है|”

वही डॉ अंबेडकर स्टुडेंट फ्रंट ऑफ इण्डिया(डीएएसएफआई) ने आज राज्य में एक अलग पहचान बनाई है| डीएएसएफआई जयपुर, सीकर, नागौर,सिरोही व चुरू सहित कई जिलो मे कार्य कर रहा है| पिछले छात्र संघ चुनाव मे भी संगठन ने कई जिलों की मुख्य महाविधालय मे भाग लिया था| संगठन ने अपने पांच छात्र संघ अध्यक्ष निर्वाचित किये जिनमे एक समर्थित उम्मीदवार था| डीएएसएफआई से जुड़े नोरतराम लोरोली ने बताया कि “संगठन दलित छात्रों के हित की आवाज तो उठाता ही है साथ ही दलित उत्पीड़न के मामलों मे भी सक्रियता दिखाता है,हमारा मकसद छात्र संघ चुनाव जीतना नही है बल्कि समाज के युवा वर्ग के स्वाभिमान की लड़ाई जीतना है|”

छात्र राजनीति के जानकार बताते है कि दलित छात्रों के हक की लड़ाई लड़ने का दावा तो अन्य सभी छात्र संगठन करते है,मगर वास्तविकता कुछ और है| आज भी कई जिलों के महाविधालय व विश्वविधालयों मे आज तक दलित छात्र अध्यक्ष नही बन पाये है|

पिछले दो वर्षों मे दलित छात्र संगठनों की आहट का ही नतीजा हो सकता है कि छात्र संघ चुनाव 2015 मे राज्य की प्रमुख दो विश्वविधालयों मे एबीवीपी व एसएफआई ने अध्यक्ष पद पर दलित छात्रों को टिकट दी थी हांलाकि वे जीत नही पाये थे|

वक्त किस तरफ करवट लेता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा मगर छात्रों को महाविधालयों में एक विकल्प जरूर दलित छात्र संगठनों के रूप में जरूर मिलेगा|

(लेखक एक स्वंतत्र पत्रकार है.)
Source : ajmernama.com

पंचायतों की तस्वीर

 

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री वीरेंद्र सिंह ने पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण बढ़ा कर पचास फीसद करने के केंद्र सरकार के इरादे के संकेत दिए हैं। उनके मुताबिक संसद के अगले सत्र में ही इस बारे में संविधान संशोधन विधेयक लाया जा सकता है। अगर प्रस्तावित विधेयक ने कानून की शक्ल अख्तियार की, तो पूरे देश में पंचायती राज संस्थाओं में सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए आधे स्थान आरक्षित हो जाएंगे। स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की तजवीज शुरू से थी, यानी जब तिहत्तरवां संविधान संशोधन लागू हुआ। वर्ष 1992 में लागू हुए इस संशोधन ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित कर दिया। फिर उसी साल चौहत्तरवां संशोधन भी आया, और उसके जरिए ऐसी ही व्यवस्था नगर पालिकाओं और नगर निगमों में भी की गई। यह ऐसा कानून था जिसमें एक सीमा तक फेरबदल करने के अधिकार राज्यों को दिए गए। इसका लाभ उठाते हुए, नीतीश कुमार की अगुआई में बिहार पहला राज्य बना, जिसने पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण की सीमा तैंतीस फीसद से बढ़ा कर पचास फीसद कर दी। 2006 में हुई बिहार की इस पहल से प्रेरणा लेते हुए राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश जैसे कई और राज्यों ने भी ऐसे कदम उठाए। ऐसे राज्यों की संख्या आठ हो चुकी है। इस लिहाज से केंद्र की संभावित पहल में कोई नयापन नहीं होगा। पर उसने मूर्त रूप लिया, तो एक झटके में पूरे देश में पंचायतों की तस्वीर बदल जाएगी। पचास फीसद स्थान आरक्षित होने पर संभव है पंचायतों में स्त्रियों की भागीदारी आधी से कुछ अधिक हो। जैसे, बिहार में इस वक्त लगभग चौवन फीसद है। नतीजतन, स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं की कमान स्त्रियों के ही हाथ में होगी। पर यह तो आंकड़ों की बात हुई, क्या व्यवहार में भी ऐसा हो पाएगा? यह किसी से छिपा नहीं है कि पंचायतों में तैंतीस फीसद महिला आरक्षण की हकीकत क्या है। चुनी गई अधिकतर महिलाओं का कामकाज उनके पति या परिवार के अन्य पुरुष सदस्य करते हैं। कुछ मामलों में इसकी वजह अशिक्षा रहती है, पर ज्यादातर मामलों में इसका कारण समाज और परिवार का मर्दवादी नजरिया और ढांचा होता है। दलित, आदिवासी और अन्य कमजोर तबकों से आने वाली महिला सरपंचों को तो दोहरा दबाव झेलना पड़ता है। अपने परिवार के पुरुष सदस्यों की मर्जी के बिना वे कुछ नहीं कर सकतीं, पर दबंग जातियों के पुरुषों के आगे तो उनकी हालत और भी बेचारगी भरी रहती है। ऐसी खबरें जब-तब आती रहती हैं कि किसी दलित या आदिवासी महिला सरंपच को पंद्रह अगस्त के दिन झंडा फहराने से रोका गया; या बैठक में वह जमीन पर बैठी थी, ‘मानिंद लोग’ http://www.jansatta.com/editorial/image-of-panchayat/66836/#sthash.FCQQBaUy.dpufकुर्सियों पर। पतियों द्वारा महिला सरपंचों के अधिकार हड़पे जाने का एक नतीजा यह भी हुआ है कि पंचायतों में भ्रष्टाचार बढ़ा है। बहुत-सी महिला सरपंचों को पता नहीं होता कि उनसे किस मद में किस हिसाब पर दस्तखत करवाया या अंगूठा लगवाया जा रहा है। कहने का अर्थ यह कि स्त्री सशक्तीकरण का यह प्रावधान तो सकारात्मक और ऐतिहासिक था, पर इसका अमल बहुत लचर रहा है। वैधानिक स्तर पर इसमें इजाफा करने का उपाय सोचा जा रहा है, पर इसकी सार्थकता तभी होगी जब लड़कियों की शिक्षा-दीक्षा का दर्जा और दायरा बढ़ाने तथा समाज की पुरुषवादी मानसिकता को बदलने का भी अभियान चले। एक सवाल यह भी उठता है कि पंचायतों के स्तर पर स्त्री सशक्तीकरण की बात करने वाले विधायिका में महिला आरक्षण पर क्यों खामोश हैं! source

 

26 जनवरी 1950

26 जनवरी 1950, इस दिन का महत्व भारत का बच्चा-बच्चा जानता है. ये वो  ऐतिहासिक दिन था, जब भारत को संवेधानिक आज़ादी मिली और भारत बना एक गणतंत्र. देश का संविधान बनाने का श्रेय किसी एक को नहीं बल्कि, कई लोगों को जाता है. पहली बार जब देश का संविधान पास हुआ और संविधान की पहली बैठक हुई तो उस वक़्त का नज़ारा कैसा रहा होगा, वे कौन थे, जिन्होंने बड़ी भूमिकाएं निभाई थीं, इसकी कुछ झलकियां आपको मिलेंगी भारत की पहली Constituent Assembly की Rare (दुर्लभ) तस्वीरों में.

1. भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद अंतरिम सरकार के मेंबर्स के साथ

Source: bhaskar

2. संविधान की पहली बैठक में 205 लोगों ने हिसा लिया था, जिसमें 9 महिलाएं थीं

Source: bhaskar

 

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उपराज्यपाल ने पुलिस अधिकारी को किया तलब

दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग ने आज दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त एस के गौतम को तलब कर मध्य दिल्ली के झंडेवालान स्थित आरएसएस दफ्तर के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई पर रिपोर्ट मांगी। इस घटना के कारण व्यापक आक्रोश फैला हुआ है।

सूत्रों ने बताया कि दिल्ली पुलिस की सेंट्रल रेंज के संयुक्त आयुक्त गौतम ने उपराज्यपाल को उनके कार्यालय में मामले से अवगत कराया। बताया जाता है कि जंग ने शनिवार को हुई घटना पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

गौतम मामले में चल रही जांच की अध्यक्षता कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस के आयुक्त बी एस बस्सी ने विशेष आयुक्त :कानून व्यवस्था: दीपक मिश्रा के साथ विचार विमर्श के बाद मामले में जांच शुरू की थी। दलित छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी के विरोध में यहां आरएसएस कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिसिया कार्रवाई का वीडियो सामने आने के बाद दिल्ली पुलिस की कड़ी आलोचना हो रही है। वीडियो में पुलिसकर्मी प्रदर्शन कर रहे छात्रों की पिटाई करते हुए और उनका बाल खींचकर घसीटते हुए नजर आ रहे हैं।

शनिवार की घटना का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद तीखी प्रतिक्रियाएं आइ’ और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया कि राजनीतिक व्यवस्था के तहत पुलिस बल को संघ और भाजपा की ‘‘निजी सेना’’ के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

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Bhilai Gangrape: मर जाऊंगी तो कोई मुझे वेश्‍या नहीं बुलाएगा

‘अगर मैं मर जाऊंगी तो फिर कोई मुझे वेश्‍या नहीं बुलाएगा।’ भिलाई (छत्‍तीसगढ़) में गैंगरेप की शिकार 21 साल की लड़की ने आत्‍महत्‍या करने से पहले सुसाइड में यह बात लिखी है। गैंगरेप की शिकार लड़की का मुकदमा लड़ने वाली कल्‍पना देशमुख ने बताया था कि ‘न्‍याय मिलने की उम्‍मीद बहुत कम है।’ केस की अगली सुनवाई 2 फरवरी को तय की गई थी और इससे पहले ही उसने पंखे से लटक कर जान दे दी। लड़की ने यह भी लिखा, ‘जब भी मैं कोर्ट जाती हूं, तो बताया जाता है कि जज अदालत में नहीं हैं।’ पुलिस को किताब में मिले लेटर में लड़की ने दर्द बयां किया है कि कैसे न्‍याय के लिए उसे संघर्ष करना पड़ रहा था। लड़की के पिता नागपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में गार्ड थे और उनके सात बच्‍चों में पीडि़त लड़की चौथी संतान थी। क्‍या है मामला जानकारी के मुताबिक, जिन दो कॉन्‍स्‍टेबल पर लड़की के साथ बलात्‍कार का आरोप है, उनके नाम- सौरभ भक्‍ता और चंद्रप्रकाश पांडे हैं, जबकि आरोपी डॉक्‍टर का नाम गौतम पंडित है। पुलिस ने इस मामले में दोनों कॉन्‍स्‍टेबल को गिरफ्तार कर लिया था, जबकि डॉक्‍टर गौतम पांडे ने खुद ही सरेंडर कर दिया था। ये तीनों इस समय जेल में हैं। लड़की ने सुसाइड नोट में अपनी मौत के लिए सौरभ भक्‍ता, चंद्रप्रकाश पांडे और डॉक्‍टर गौतम पंडित को जिम्‍मेदार ठहराया है। उसने यह भी लिखा है कि उसे न्‍याय मिलने की कोई उम्‍मीद नहीं है। गैंगरेप का यह मामला पिछले साल जनवरी में उस वक्‍त सामने आया था, जब गैंगरेप की शिकार लड़की को सुपेला के लाल बहादुर शास्‍त्री अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था। जानकारी के मुताबिक, लड़की इनके चंगुल में 2014 में फंसी थी, जब वह इलाज के लिए डॉक्‍टर के पास गई थी। आरोप है कि इसी दौरान उसके साथ गैंगरेप किया गया था। तीनों आरोपियों ने गैंगरेप के दौरान वीडियो भी बनाया था और वे लड़की को ब्‍लैकमेल करते रहे। पीडि़त उस वक्‍त कॉलेज की स्‍टूडेंट थी। – source

Rohith suicide: कैलाश विजयवर्गीय ने जोड़ा टेरर लिंक

 

हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला आत्‍महत्‍या मामले पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है। एक ओर बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय कह रहे हैं कि जो स्टूडेंट आतंकी के लिए नमाज पढ़ता हो, बीफ पार्टी करने की बात करता हो, वह कमजोर नहीं हो सकता। वह सुसाइड नहीं कर सकता। वहीं, सुषमा स्वराज ने कहा कि रोहित दलित था ही नहीं। कांग्रेस उपाध्‍यक्ष भी बयानबाजी के मामले में बीजेपी के नेताओं से पीछे नहीं है। उन्‍होंने रोहित वेमुला आत्‍महत्‍या मामले की तुलना महात्‍मा गांधी की हत्‍या से कर डाली है।

क्‍या बोले कैलाश विजयवर्गीय

रोहित वेमुला को ‘साहसी नौजवान’ बताते हुए भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने शनिवार को कहा कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय का यह दलित रिसर्चर हॉस्टल से अपने संस्पेंड किए जाने की ‘छोटी..सी घटना’ के कारण खुदकुशी नहीं कर सकता था। विजयवर्गीय ने कहा, “रोहित वेमुला इतना कमजोर नौजवान नहीं था कि वो आत्महत्या कर ले। जो आतंकवादियों की फांसी का विरोध करे। जो सार्वजनिक रुप से यह कहे कि मुझे भगवा दिखता है तो ऐसा लगता है कि फाड़ दूं। जो सार्वजनिक रुप से यह कहे कि मैं बीफ पार्टी का आयोजन करुंगा। जो सार्वजनिक रुप से आतंकवादी विशेषकर याकूब मेनन की फांसी के विरोध के लिए नमाज अदा करे, वह व्यक्ति आत्महत्या कर रहा है और आत्महत्या करते वक्त जो पत्र लिखता है उसमें किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराता। मुझे लगता है उसकी आत्महत्या के लिए वो लोग जिम्मेदार हैं जो लोग सिर्फ अपनी फेस सेविंग के लिए आंदोलन कर रहे हैं। जो मोदी जी को और सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।”

क्‍या बोलीं सुषमा स्‍वराज

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने शनिवार को कहा कि शोध छात्र रोहित वेमुला दलित नहीं था। न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक, स्वराज ने कहा कि मेरी पूरी जानकारी के अनुसार वो बच्चा दलित नहीं है। तथ्य यह है कि ये पूरी की पूरी बातचीत जो की गई या आरोप लगाए, वो आरोप पूरी तरह निराधार हैं।

राहुल गांधी ने महात्‍मा गांधी की हत्‍या से तुलना की

कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने कहा, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘उपर से एक विचार थोपकर’ छात्रों की भावना को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं। राहुल गांधी ने हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला की आत्‍महत्‍या मामले में प्रदर्शन कर रहे छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, ‘यहां बिल्कुल वही हुआ है जो महात्‍मा गांधी के साथ हुआ था।’ उन्होंने कहा, ‘गांधीजी की हत्या उन्हीं ताकतों ने की, जिन्होंने उनको वह सच बोलने नहीं दिया जो वह बोलना चाहते थे। यही बात रोहित वेमुला के साथ हुई है। वे लोग नहीं चाहते थे कि वह उस सच को बोले जो उसने संस्थान में देखा था।’ 30 जनवरी को महात्‍मा गांधी की बरसी थी।

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रोहित वेमुला दलित नहीं था, जानबूझकर मुद्दा उछाला गया: सुषमा स्वराज

हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक चौंकाने वाला बयान दिया है। महाराष्ट्र के ठाणे पहुंची सुषमा स्वराज ने कहा है कि उनकी जानकारी के अनुसार रोहित दलित नहीं था। सुषमा ने कहा कि ये पूरा घटनाक्रम इस नाम पर महज इसलिए उछाला गया, ताकि सरकार के खिलाफ सियासत की जा सके। सुषमा स्वराज का निशाना सीधे-सीधे विपक्ष पर था। सुषमा के ताजा बयान से एक बार फिर से सियासत गरमा सकती है।

गौरतलब है कि रोहित की मौत के बाद चल रहे छात्रों को समर्थन देने के लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष न सिर्फ हैदराबाद पहुंचे, बल्कि उन्होंने एक दिन की भूख हड़ताल भी की। राहुल गांधी शुक्रवार-शनिवार रात हैदराबाद यूनिवर्सिटी कैंपस में दोबारा पहुंचे थे।

रोहित वेमुला दलित नहीं था, जानबूझकर मुद्दा उछाला गया: सुषमा स्वराज

हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक चौंकाने वाला बयान दिया है। महाराष्ट्र के ठाणे पहुंची सुषमा स्वराज ने कहा है कि उनकी जानकारी के अनुसार रोहित दलित नहीं था।

दलित उत्पीड़न मामले में कैट ने एम्स से मांगा जवाब

 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भी दलित उत्पीड़न को लेकर सवालों में है। नर्सिंग विभाग की सहायक प्रोफेसर शशि मवार सहित सहायक प्रोफेसर स्तर के तीन संकाय सदस्यों के खिलाफ एम्स की ओर से की गई कार्रवाई को अनुसूचित जाति आयोग ने भी दलित उत्पीड़न बता उन्हें काम पर वापस लगाने को कहा था। जबकि मेडिसिन विभाग के डाक्टर कुलदीप कुमार व डाक्टर अरविंद के खिलाफ की गई कार्रवाई के लिए कैट ने गुरुवार को एम्स प्रशासन को नोटिस जारी किया है। कैट ने एम्स से चार अप्रैल के भीतर जवाब देने को कहा है। इसके पहले भी बनी तीन समितियों ने भी अगल-अगल समय में दी अपनी रपट में पाया है कि एम्स में दलित विरोधी वातावरण रहा है। आरोप है कि दिसंबर 2014 में एक नर्सिंग छात्रा पल्लवी ग्रोवर की आत्महत्या के मामले में प्राचार्य मंजू वत्स ने यहां डिप्टी सुप्रीटेंडेंट रहीं शशि मवार को निशाना बनाया। तमाम छात्राओं से लिखवाया गया कि उन्हें छात्रावास में किससे दिक्कत थी। उन्हीं पत्रों के आधार पर सहायक प्रोफेसर मवार को पद से हटा कर अनिवार्य प्रतीक्षा में डाल दिया गया। जबकि मामले की पड़ताल कर रही पुलिस ने अपनी जांच रपट में मवार को दोषी नहीं पाया था। जिन छात्राओं ने ज्ञापन दिया था उसमें भी छात्राओं ने व्यवस्थागत खामियों बताते हुए उसके लिए एम्स प्रशासन को दोषी बताया था। इसके अलावा एम्स ओर से डीन की अगुआई में बनी समिति ने भी मवार क ो निर्दोष बताया था। फिर भी काम पर बहाल नहीं हुर्इं मवार ने मामले को अनुसूचित जाति आयोग सहित विभिन्न मंचों पर उठाया। आयोग ने अक्तूबर 2015 में दी अपनी रिपोर्ट में इसे दलित उत्पीड़न का मामला बताते हुए शशि को उनके पद पर तुंरत बहाल करने को कहा था। इसके बावजूद उन्हें अध्यापन के काम में नहीं लगाया गया बल्कि चिकित्सा अधीक्षक कार्यलय में उनसे जूनियर कर्मचारी के अधीन काम करने को कह दिया गया। आयोग के आदेश पर अमल करने के बजाए इस आदेश के पुनपर्रीक्षण के लिए एक तीन सदस्यीय समिति बना दी गई। यह पुनर्रीक्षण आदेश भी उपनिदेशक प्रशासनिक की ओर से दिया गया। जबकि आयोग क ो सिविल कोर्ट का दर्जा है। ऐसे में इसे आयोग की अवमानना का मामला भी माना जा रहा है। इन तमाम मानसिक उत्पीड़न से आहत मवार एक महीने की छुट्टी पर चली गई हैं। कैट ने गुरुवार को एम्स से पूछा है कि डॉक्टर कुलदीप कुमार व अरविंद को बर्खास्त करने से पहले उनके खिलाफ आरोपों की समुचित जांच क्यों नहीं की गई? जबकि इस मामले में फैसला लेने क ा हक स्वायत्त संस्था होने के नाते एम्स प्रबंध समिति को है। कुलदीप को एक मरीज से दुर्व्यवहार की शिकायत पर बिना जांच के बर्खास्त कर दिया गया। एम्स के मेडिसिन विभाग अध्यक्ष डाक्टर एसके आचार्य की रिपोर्ट पर कुमार के खिलाफ कार्रवाई की गई है। एम्स के ही एक अन्य सहायक प्रो अरविंद के खिलाफ भी बिना समुचित जांच के कार्रवाई की गई। source

पाकिस्तान से सीखें

हिंदी फिल्म ‘क्या कूल हैं हम 3’ पर पाकिस्तान में पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। वहां के सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म के द्विअर्थी संवादों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे प्रदर्शन के लिए अनपुयुक्त बताया है। सवाल है कि प्रगतिशीलता और सहिष्णुता के नाम पर भारतीय बौद्धिक वर्ग समय-समय पर समाज की भलाई की ठेकेदारी लेकर बैठा रहता है, अपना विरोध-प्रदर्शन करता है और हर उस भारतीय परंपरा को दकियानूसी कहता है, जो सांस्कृतिक प्रसार के रूप में भारत में होती है। लेकिन ऐसी फिल्मों में परोसे गए द्विअर्थी संवाद उसे प्रगतिशीलता और सहिष्णुता के लिए सहज लगते हैं। दुख है कि भारत में ऐसी फिल्मों का विरोध नहीं होता। कम से कम इस मामले में हम पाकिस्तान से कुछ तो सीख सकते हैं।

विकेश कुमार बडोला, नोएडा source

SC एसोसिएशन का ‘विरोध दिवस’

दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की कथित आत्महत्या के मुद्दे पर जारी आंदोलन से जुड़ते हुए हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) की अनुसूचित जाति-जनजाति कर्मचारी कल्याण एसोसिएशन ने शुक्रवार क ‘विरोध दिवस’ का आयोजन किया। अनुसूचित जाति-जनजाति शिक्षक फोरम और संबंधित शिक्षकों ने भी शुक्रवार सुबह अपनी क्रमिक भूख हड़ताल जारी रखी जो गुरुवार से शुरू हुई थी। सामाजिक न्याय संयुक्त कार्यसमिति के प्रतिनिधि ने कहा कि फोरम के सदस्यों ने विश्वविद्यालय के विजिटर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को अपनी इस मांग के संबंध में पत्र लिखा है कि कुलपति अप्पा राव पोडिले को हटाया जाना चाहिए तथा प्रभारी कुलपति विपिन श्रीवास्तव को पद से अलग किया जाना चाहिए। वेमुला ने 17 जनवरी को हास्टल के कमरे में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी। संयुक्त कार्यसमिति ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय परिसर में चल रहे आंदोलन के प्रति एकजुटता व्यक्त करने के उद्देश्य से देश भर के विश्वविद्यालयों में सामूहिक भूख हड़ताल का आह्वान किया है। छात्रों के दो समूहों ने पूर्व में एचसीयू में प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की थी। हालांकि उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर चिंता के चलते उन्हें अस्पताल भेज दिया गया। संयुक्त कार्यसमिति (जेएसी) के प्रतिनिधि ने कहा कि अपनी मांगों को लेकर समिति की योजना फरवरी के पहले सप्ताह में राष्ट्रपति से मिलने के लिए दिल्ली जाने की है। जेएसी की मुख्य मांगों में विश्वविद्यालय में वंचित तबके के छात्रों के साथ किसी भी अन्याय को रोकने के लिए ‘रोहित एक्ट’ लाए जाने और देश में पिछले 20 वर्षों में विश्वविद्यालयों में कथित जातिगत और शैक्षिक भेदभाव के मुद्दों को देखने के लिए एक समिति बनाए जाने जैसी मांगें शामिल हैं। राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र पर 93 ‘संबंधित शिक्षकों’ के हस्ताक्षर हैं। इसमें विश्वविद्यालय के कुलपति और प्रभारी कुलपति को उनके पदों से हटाने का आग्रह किया गया है। इस बीच, आंदोलित छात्रों ने प्रभारी कुलपति विपिन श्रीवास्तव को हटाए जाने की मांग करते हुए प्रशासनिक ब्लाक के समक्ष प्रदर्शन किया। गैर शिक्षण कार्य से जुड़े कई सदस्यों ने श्रीवास्तव को बताया कि वे कार्यालय बंद रहने की वजह से काम करने में सक्षम नहीं हैं और हर रोज विश्वविद्यालय आने के बाद घर वापस लौट रहे हैं। गैर शिक्षण कर्मियों ने कहा कि वे अपना नियमित काम करना चाहते हैं और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पद से हटाए जाने जैसी कुछ मांगें कुलपति के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। उनके अनुसार छात्रों के विरोध के चलते प्रशासनिक ब्लॉक से वापस लौटे श्रीवास्तव ने कहा कि वह कार्यालय का कामकाज जल्द शुरू करने के प्रयास करेंगे। प्रभारी कुलपति ने दो दिन पहले प्रदर्शन स्थल पर आंदोलित छात्रों से बात करने की कोशिश की थी, लेकिन नारेबाजी के चलते उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। source

भ्रष्टाचार के मामले में भारत उसी पायदान पर है जहां 2014 में

पारदर्शिता के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की वैश्विक रिपोर्ट हर साल आती है, जो बताती है कि विभिन्न देशों में सरकारी कामकाज कितना साफ-सुथरा है, किस देश में भ्रष्टाचार कितना कम या अधिक हुआ है। इस रिपोर्ट से तमाम देशों की साख कुछ न कुछ बनती या बिगड़ती है, उनकी छवि पर असर पड़ता है। इस रिपोर्ट की अहमियत इसीलिए है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट के सूचकांक पर नजर डालें तो पहली नजर में भारत की स्थिति कुछ सुधरी हुई दिखती है। लेकिन वास्तव में भारत 2014 में जहां था वहीं पिछले साल भी। सूचकांक में विभिन्न देशों को सौ से शून्य तक अंक दिए जाते हैं। जिस देश को जितने अधिक अंक मिले होते हैं, समझिए कि वहां भ्रष्टाचार उतना ही कम है। मसलन, डेनमार्क को अट्ठानबे अंक मिले हैं, जहां भ्रष्टाचार दुनिया में सबसे कम या न के बराबर है। इसके बाद फिनलैंड का नंबर है और फिर स्वीडन का। जाहिर है, उत्तरी यूरोप में सबसे ज्यादा पारदर्शिता है। हिंसा, सामाजिक अंसतोष और तनाव के भी सबसे कम मामले यहीं मिलेंगे। विकसित देशों में सबसे कम विषमता भी इन्हीं देशों में दिखेगी। इसलिए इनके विकास मॉडल दशकों से विचार का विषय रहे हैं। पर ये बहुत कम आबादी वाले तथा विकसित देश हैं। इनसे भारत की तुलना करना ठीक नहीं होगा। पर सवाल है कि हम किस दिशा में किस गति से बढ़ रहे हैं? भ्रष्टाचार पर काबू पाने या उसे कम करने में हमें कितनी सफलता मिली है? इसका उत्तर निराशाजनक है, सूचकांक में हमारा ग्राफ थोड़ा ऊपर चढ़ने के बावजूद। भारत को 2014 में भी अड़तीस अंक मिले थे, ताजा रिपोर्ट में भी उतने ही अंक मिले हैं। दरअसल, सूचकांक में स्थिति थोड़ी सुधरने की वजह यह है कि 2014 की सूची में एक सौ चौहत्तर देश शामिल थे, जबकि 2015 की बाबत आई रिपोर्ट में एक सौ अड़सठ देश शामिल हैं। यानी भारत कुछ पायदान ऊपर आया है, तो सूची में शामिल देशों की संख्या में हुई कुछ कमी के कारण। लब्बोलुआब यह कि भारत में भ्रष्टाचार की स्थिति पूर्ववत है। आखिर भ्रष्टाचार कोलेकर तमाम शोर-शराबे और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े आंदोलन के बावजूद भारत वहीं का वहीं क्यों खड़ा है? राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ही इसकी सबसे बड़ी वजह रही है। लोकपाल कानून बनने के करीब दो साल बाद भी लोकपाल संस्था का गठन नहीं हो पाया है। विसलब्लोअर कानून से संबंधित संशोधन विधेयक अधर में है। कई राज्यों में लोकायुक्त नहीं हैं। जिन राज्यों में लोकायुक्त हैं भी, कर्नाटक को छोड़ दें तो, उन्हें पर्याप्त संसाधन और अधिकार हासिल नहीं हैं। कार्रवाई करना तो दूर, जांच कराने के लिए भी उन्हें संबंधित राज्य सरकार का मुंह जोहना पड़ता है। उनकी भूमिका सिफारिशी होकर रह गई है। यही नहीं, कई बार लोकायुक्त का पद भी समय से नहीं भरा जाता, जिसका एक उदाहरण हाल में लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर उत्तर प्रदेश के विवाद से सामने आया। सीबीआई को स्वायत्त करने की मांग बरसों से होती रही है। सर्वोच्च अदालत ने यूपीए सरकार के समय एक मामले की सुनवाई करते हुए सीबीआई को ‘पिंजरे में कैद तोता’ कह कर अपनी नाराजगी जताई थी। भाजपा विपक्ष में रहते हुए सीबीआई की स्वायत्तता की वकालत करती थी, पर अब जब वह केंद्र की सत्ता में है, पता नहीं क्यों इस बारे में हिम्मत नहीं जुटा पा रही है! कोई हैरत की बात नहीं कि भ्रष्टाचार के मामले में भारत उसी पायदान पर है जहां 2014 में थ source