संकीर्ण पंथनिरपेक्षता

तवलीन सिंह का कॉलम वक्त की नब्ज

 

पहले कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद के मुंह से बात सुनी कि आइएस या दाएश और आरएसएस की सोच एक जैसी है। इतना हंगामा हुआ उनकी इस बात को लेकर कि उनको राज्यसभा में अपने भाषण की सीडी पेश करके सफाई देनी पड़ी। स्पष्ट किया कि उनको दोनों संस्थाओं की सोच से तकलीफ है। लेकिन इतने में उनके पुराने साथी दिग्विजय सिंह ने ट्वीट करके कह दिया कि वे पूरी तरह सहमत हैं आजाद साहब के बयान से। ये वही दिग्विजय सिंह हैं, जिन्होंने ‘26/11: आरएसएस की साजिश’ नामक किताब का समर्थन किया था। जबसे जिहादी आतंकवाद का जहर दुनिया में फैलना शुरू हुआ है तबसे कांग्रेस पार्टी की सेक्युलर सोच रही है कि इस जहर से कहीं ज्यादा खतरनाक है हिंदुत्व का जहर। याद रखिए कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने किसी अमेरिकी राजदूत को पांच वर्ष पहले यह बात कही थी। यह खबर हमको विकिलीक्स द्वारा उस वक्त मिली थी। उस समय आइएस था नहीं। उस समय मालूम नहीं था कि आइएस औरतों को गुलाम बना कर बाजारों में बेचेगा। उस समय मालूम नहीं था कि इस्लाम के इस नए खिलाफत में बच्चों को काफिरों की हत्या करने की ट्रेनिंग दी जाएगी। मालूम नहीं था कि छोटे ‘काफिर’ बच्चों को बेरहमी से मार दिया जाएगा, सिर्फ इसलिए कि उनकी जुबान पर कुरान शरीफ की आयतें नहीं चढ़ती हैं। आज दुनिया जानती है कि ऐसी चीजें होती हैं सरेआम उस मुल्क में, जिसको इस्लामिक स्टेट कहा जाता है। क्या दिग्विजय सिंह और गुलाम नबी आजाद बता सकते हैं कि इस तरह की बर्बर हरकतें संघ ने इस देश के कौन-से हिस्से में की हैं? क्या बता सकते हैं कि दुनिया की कौन-सी राजधानी में संघ के आतंकवादियों ने वैसे हमले किए हैं जैसे हाल में पेरिस में हुए थे? दुनिया मान चुकी है कि दाएश इस दौर का उतना ही बड़ा खतरा है जितना कभी नाजी जर्मनी का खतरा था। इस बात को लेकिन हम भारत में नहीं कह सकते हैं ऊंची आवाज में, क्योंकि ऐसा कहने से हमारे माथे पर फौरन चिपक जाता है सांप्रदायिक होने का बिल्ला। आगे बढ़ने से पहले मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि मैं संघ की कोई बहुत बड़ी समर्थक नहीं हूं। मुझे सख्त तकलीफ होती है जब संघी देश में घूम कर मुसलमानों को निशाना बनाते हैं बीफ के बहाने। इससे भी ज्यादा तकलीफ होती है जब संघी प्राचीन भारत की महान विरासत को एक घटिया-सा हिंदू-मुसलिम विवाद बनाते हैं। इस देश की सेवा करने की भावना अगर वास्तव में संघियों के दिल में है तो और बहुत कुछ है करने को। भारत को जरूरत है ऐसे नौजवानों की, जो देश की सेवा करने के नाते स्वच्छ भारत और बेटी बचाओ जैसे कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए निकलने को तैयार हों। स्वछ भारत का दायरा इतना विशाल है कि सरकारी अधिकारी इस काम को अकेले कर ही नहीं सकते हैं। हमारे शहर, हमारे गांव, हमारी नदियां, हमारे मंदिर और हमारे तीर्थ स्थान इतने गंदे हैं कि भारत का हर नागरिक अगर इनको साफ करने में लग जाए तो भी सफाई को लग जाएंगे कई दशक। ऊपर से है हमारी दकियानूसी सामाजिक सोच, जो सिखाती है कि बेटी एक इतना बड़ा बोझ है कि उसको जितनी जल्दी खत्म कर दिया जाए उतना ही अच्छा है। भ्रूण हत्या को रोकने के सख्त से सख्त कानून इस शर्मनाक प्रथा को बदल नहीं पाए हैं। सो, आरएसएस जैसी समाज कल्याण संस्था का मुख्य काम होना चाहिए इस देश के अशिक्षित, जाहिल लोगों को समझाना कि बेटियां बेटों से कम नहीं हैं। ऐसे कार्यों में संघी कम दिखते हैं और घर वापसी जैसे कार्यों में ज्यादा। धर्म परिवर्तन रोकने के लिए निकल पड़ते हैं संघी सीना तान के। बीफ खाने वालों को जान से मारने के लिए भी निकल पड़ते हैं जैसे कि देश के लिए कोई बहुत नेक काम कर रहे हों। दुख के साथ स्वीकार करना पड़ेगा कि नरेंद्र मोदी जबसे प्रधानमंत्री बने हैं, संघियों का हाथ ऐसे कार्यों में जरूरत से ज्यादा दिखने लगा है। जितनी बदनामी उन्होंने मोदी सरकार की की है शायद संघ के बड़े नेता खुद नहीं जानते। ऐसा कहने के बाद लेकिन यह भी कहना जरूरी है कि आरएसएस की तुलना आइएस से करना न सिर्फ गलत, बल्कि महान मूर्खता है। इसलिए कि इस देश के वर्तमान प्रधानमंत्री भी उसी आरएसएस से निकल कर आए हैं, सो जब देश की सबसे पुराने राजनीतिक दल के प्रवक्ता इस तरह की बातें करते हैं तो दुनिया यह समझ लेती है कि हिंदुत्व और जिहादी इस्लाम में कोई फर्क नहीं है। इसी गलतफहमी की वजह से अमेरिका के राष्ट्रपति मोदी के मेहमान बन कर आए थे भारत पिछले साल और जाते-जाते उपदेश दे गए अपने प्रधानमंत्री को कि उन्हें धर्मनिरपेक्षता को कायम रखना चाहिए। हाल में किसी अमेरिकी संस्था ने इजाजत मांगी थी भारत आने की, इस मकसद से कि वे धर्म-मजहब की स्वतंत्रता का जायजा लेना चाहते हैं। इतना बदनाम किया है भारत को कांग्रेस के सेक्युलर नेताओं ने कि दुनिया भूल गई है कि इस जिहादी आतंकवाद के इस दौर में जितने सुरक्षित भारत में मुसलमान हैं, शायद ही किसी दूसरे गैर-इस्लामी मुल्क में होंगे। ऐसा अगर है तो इसलिए कि सनातन धर्म का बुनियादी सिद्धांत है कि हर व्यक्ति को अधिकार है अपने तरीके से भगवान की वंदना करने का और अगर न भी मानना चाहे भगवान को तो भी कोई समस्या नहीं है। ऐसा बुनियादी सिद्धांत न इस्लाम में है और न ही ईसाई धर्म में। हमारी समस्या यह है कि कांग्रेस पार्टी समझ बैठी है कि सेक्युलरिज्म उनके राजनेताओं की देन है। – source