मुबारकपुर मे ज्योतिबा फुले एवम् डॉक्टर अम्बेडकर की सयुक्त जयन्ति समारोह सफलता पूर्वक सम्पन

रास्ट्रीय मूलनिवासी संघ RMS एवम् तथागत ज्ञान प्रचार वैलफेयर अस्सोसिअशन TGPWA के तत्वधान मे 10 अप्रैल 2016 को दिल्ली मुबारकपुर मे ज्योतिबा फुले एवम् डॉक्टर अम्बेडकर की सयुक्त जयन्ति समारोह सफलता पूर्वक सम्पन हुआ। ओर पढे लिखे बच्चों को ओर खेल कूद वालो को इनाम ओर सम्मान पत्र दिया गया।
चीफ गेस्ट फकीर चंद अमेरिका।
किर्षि वैज्ञानिक रामभज बौद्ध।
डॉक्टर गुलशन प्रकाश ।
सुरेश गहलोत तथा वक्ता सागर भूमक मास्टर दयानंद इंजीनयर संदीप
भीम गीत :- मोनू ,सशी भूषण , जितेंदर इंदौरा।

 

 

हरियाणा में एससी बीसी के 16000 पद खाली

हरियाणा सरकार ने नौकरियों में भले ही नए सिरे से आरक्षण तय कर दिया है, लेकिन अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग का बैकलाग आज तक पूरा नहीं हो पाया है। सरकारी विभागों, अर्ध सरकारी विभागों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में अनुसूचित जाति (एससी) और पिछड़े वर्ग (बीसी) के हजारों पद खाली पड़े हुए हैं। प्रदेश
सरकार को इन पदों के लिए उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं। इसके अभाव में सरकार ने खाली पदों को भरने की समय सीमा बताने से साफ इनकार कर दिया है।
विशेष पिछड़ा वर्ग में ग्रुप ए और ग्रुप बी की नौकरियों में आरक्षण का कोटा एक-एक प्रतिशत बढ़ाने से हालांकि पद पहले से अधिक सृजित होंगे, लेकिन सरकार आज तक पिछला बैकलाग ही पूरा नहीं कर पाई है। अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के करीब 16 हजार पद खाली चल रहे हैं।
सरकारी व अर्ध सरकारी विभागों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में अनुसूचित जाति के करीब साढ़े 9 हजार पद खाली हैं। इनमें ग्रुप ए व ग्रुप बी 77 पद और ग्रुप सी और ग्रुप डी के 8781 पद का बैकलाग अधूरा पड़ा है। पिछड़े वर्ग में ग्रुप ए व ग्रुप के मात्र 71 पद खाली हैं, जबकि ग्रुप सी और ग्रुप डी के 6260 पद खाली पड़े हुए हैं।
चीफ सेक्रेटरी की ओर से भेजे जा चुके तीन पत्र: कांग्रेस विधायक उदय भान ने विधानसभा में बैकलाग भरने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी मांगी थी, जिसके जवाब में अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग कल्याण राज्य मंत्री कृष्ण कुमार बेदी ने मुख्य सचिव के 24 सितंबर 2013, 27 मई 2014 और 11 सितंबर 2015 के तीन पत्रों का हवाला देते हुए कहा कि सभी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों तथा विश्वविद्यालयों को बैकलाग पूरा करने की हिदायतें जारी की जा चुकी हैं। इन हिदायतों का अभी असर देखने को नहीं मिला है।
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आरक्षण के बदले प्रारूप पर अभी गवर्नर के हस्ताक्षर नहीं: विधानसभा में पारित नए आरक्षण विधेयक पर अभी राज्यपाल के हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। उनके हस्ताक्षर के बाद आरक्षण के नए प्रावधानों पर आधारित अधिसूचना जारी होगी। पिछड़ा वर्ग ब्लाक ए में 71 जातियां शामिल हैं। ग्रुप सी और डी के पदों के लिए 16 प्रतिशत तथा ग्रुप ए व बी के पदों के लिए 11 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। पहले ग्रुप ए व बी के पदों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण मिलता था। पिछड़ा वर्ग ब्लाक बी में ग्रुप सी व डी पदों के लिए 11 प्रतिशत तथा ग्रुप ए व बी के लिए 6 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। ग्रुप ए व बी के लिए पहले 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था। पिछड़े वर्ग ब्लाक सी की नई कैटेगरी बनाई गई है, जिसमें ग्रुप सी व डी के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण तथा ग्रुप ए व बी के लिए 6 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। ग्रुप ए व बी के लिए पहले 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था।

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अंधविश्वास का मायाजाल

हमें बचपन से किताबों में यही पढ़ाया जाता रहा है कि सच बोलो, झूठ पाप के समान है। मगर इसी झूठ से अंधविश्वास की दुकानों में खूब नफा कमाया जा रहा है, वह भी उसी धर्म-मजहब के नाम पर जिसमें सच बोलने की सीख दी जाती है। जो लोग मजहब के रहनुमा बनने की बात करते हैं, उन्हीं की नाक के नीचे अंधविश्वास का यह कारोबार फल-फूल रहा है। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्हें इसकी खबर नहीं, मगर यह सवाल जरूर उठता है कि अंधविश्वास फैलाने वाले ढोंगी मौलानाओं, बाबाओं का विरोध पुरजोर तरीके से क्यों नहीं किया जाता, ऐसे लोगों के खिलाफ कोई मुहिम या फतवा जारी क्यों नहीं होता। 21वीं सदी में विज्ञान इंसान को चांद पर बसाने की कोशिश कर रहा है। कोई ठीक नहीं कि कुछ समय में चांद पर पहुंचाने के दावे ढोंगी तांत्रिक बाबाओं की ओर से किए जाने लगें, क्योंकि विज्ञान से ज्यादा आज लोग अंधविश्वास और जादू-टोने में अपनी मुसीबतों का इलाज तलाश रहे हैं।

इसकी वजह है कि लोगों में पैसा कमाने की जल्दी और जल्द से जल्द दिक्कतों को दूर कराने की होड़। इसका हल वे अपने प्रयासों में कम, इन ढोंगियों के पास ज्यादा ढ़ंूढ़ने लगे हैं। यही वजह है कि अभी तक कुछ आसूमल, निर्मल बाबाओं की एक खेप लोगों को झूठे ख्वाब दिखा कर उल्लू बना रही थी। अब बाबाजी, मौलानाजी जैसे फर्जी दावे वाले लोग भी अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के बाजार में पूरी तरह उतर आए हैं। इनके हौसले भी इतने बुलंद हैं कि अभी तक इनकी पहुंच मुहल्लों, कस्बों तक थी पर अब इनका मायाजाल शहरों की चकाचौंध तक जा पहुंचा है। इसकी एक वजह यह भी है कि इन ढोंगियों को मीडिया का सहयोग हासिल है। जैसे सरकारें सिगरेट, तंबाकू, शराब से बचने की ताकीद विज्ञापनों के जरिए करती हैं और वही इनको बेचने का लाइसेंस भी वही मुहैया कराती हैं।

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दलितों के अपमान का जश्न है होली : राज आदिवाल

हमारा होली का त्योहार भी हमारे देश के महान मूलनिवासी राजाओ और विदेशी आर्य लुटेरो के बीच हुए संघर्ष की एक गाथा है , प्राचीन काल मे हमारे देश के कश्यप राजा रहे हिरण्यकश्यप और उसके परिवार की कहानीकहता है हमारा होली का त्योहार ।ऐतेहासिक गाथा के अनुसार हमारे मूलनिवासी राजा”हिरण्यकश्यप” बहुत पराक्रमी हुआ करते थे ,

राजा हिरण्यकश्यप ने विदेशी हिंसक ग्रंथ वेद-पुराणों की नीति को अपने यहा लागू नहीं होने दिया और अपना प्राचीन मूलनिवासी और नागवंशी धर्म ही मानते रहे जिसकी वजह से विदेशी आर्य लुटेरे उनके राज्य पर कब्जा नहीं कर पा रहे थे तो उन्होने अपनी हमेशा की छल और बहरूपिये वाली नीति अपनाने की कोशिश की जिसके सहारे वो हमारे देश मे घुसे थे । उन्होने राजा हिरण्यकश्यप के साथ छल/धोखा करके उनकी हत्या तो कर दीलेकिन उस राज्य की प्रजा ने भी विदेशी आर्य लुटेरों की सत्ता को स्वीकारने से इंकार कर दिया ।
तो उन्होने”हिरण्यकश्यप” के अल्पायु पुत्र “प्रहलाद” को ही राजाबनाने की योजना बनाई लेकिन साथ ही उन्होने ये सोचा कीप्रहलाद को विदेशी आर्य ग्रंथो वेद-पुराणों की शिक्षा देकर उसे अपने वश मे कर लेंगे जिससे प्रजा की नज़र मे तो राजा प्रहलाद ही रहेगा लेकिन वो काम उन लुटेरों के फ़ायदे का करेगा । लेकिन उनके इस षड्यन्त्र का पता “होलिका” को चल गया था तो वो प्रहलाद को बचाने के लिए उसको अपने साथ लेकर सुरक्षित स्थान की ओर चल दी लेकिन उन आर्य लुटेरों कीकुटिल नजरों से वो नहीं बच पाई और

उन आर्य लोगो ने निहत्थी होलिका को जिंदा जलाकर उसको मार डाला ।हम होली अपने महान राजा हिरण्यकश्यप और वीर होलिका के बलिदान को याद रखने हेतु शोक दिवस के रूप मे मनाते थे और जिस तरह मृत व्यक्ति की चिता की हम आज भी परिक्रमा करते है और उस पर गुलाल डालते है ठीक वही काम हम होली मे होलिका की प्रतीकात्मक चिता जलाकर और उस पर गुलाल डालकर अपने पूर्वजो को श्रद्धांजलि देतेआ रहे थे ताकि हमे याद रहे की हमारी प्राचीन सभ्यता और मूलनिवासी धर्म की रक्षा करते हुए हमारे पूर्वजो ने अपने प्राणो की आहुति दी थी । लेकिन इन विदेशी आर्य लुटेरों ने हमारे इस ऐतेहासिक तथ्य को नष्ट करने के लिए उसको तोड़ मरोड़ दिया और उसमे काल्पनिक”विष्णु” और उसका बहरूपिये पात्र “नृसिंह अवतार” की कहानी घुसेड़ दी । और जिसकी वजह से आज हम अपने ही पूर्वजो को बुरा और राक्षस मानते आ रहे है , और इन लुटेरों को भगवान मानते आ रहे है ।
ये विदेशी आर्य असल मे अपने आपको “सुर” कहते थे और हमारे भारत के लोगो और हमारे पूर्वज राजाओ की बेइज्जती करने के लिए उनको “असुर” कहा करते थे । और इनलुटेरों/डकैतो की टोली के मुख्य सरदारो को इन्होने भगवान कह दिया और अलग अलग टोलियो/सेनाओ के मुखिया/सेनापतियों को इन्होने भगवान का अवतार दिखा दिया अपने इन काल्पनिक वेद-पुराणों मे ।

और इस तरह ये विदेशी आर्य हमारे भारत के अलग-अलग इलाको मे अपने लुटेरों की टोली भेजते रहे और हमारे पूर्वज राजाओ को मारकर उनका राजपाट हथियाते रहे । और उसी क्रम मे इन्होने हमारे अलग-अलग क्षेत्र के राजाओ को असुर घोषित कर दिया और वहाँ जीतने वाले सेनापति को विभिन्न अवतार बता दिया ।और आज इससे ज्यादा दुख की बात क्या होगी की पूरा देश यानि की हम लोग इनके काल्पनिक वेद-पुराणों मे निहित नकली भगवानों याने हमारे पूर्वजो के हत्यारो को पूज रहे है और अपने ही पूर्वजो को हम राक्षस और दैत्य मानकर उनका अपमान कर रहे है ।

 

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एक महिला ने गौतम बुद्घ से कहा

एक महिला ने गौतम बुद्घ से कहा – मैं आपसे
शादी करना चाहती हूँ”।
गौतम बुद्ध ने पूछा- “क्यों देवी ?
महिला ने जवाब दिया -“क्योंकि मुझे आपके जैसा
ही एक पुत्र चाहिए, जो पूरी दुनिया में मेरा नाम
रौशन करे और वो केवल आपसे शादी
करके ही मिल सकता है मुझे”।
गौतम बुद्ध कहते हैं – “इसका और एक उपाय है”
महिला पूछती है -“क्या”?
गौतम बुद्ध ने मुस्कुराते हुए कहा -“आप मुझे ही अपना
पुत्र मान लीजिये और आप मेरी माँ बन जाइए ऐसे में
आपको मेरे जैसा पुञ मील जायेगा.
महिला हतप्रभ होकर गौतम बुद्ध को ताकने लगी
और रोने लग गयी,
ये होती है महान लोगो की विचार धारा ।
“पूरे समुंद्र का पानी भी एक जहाज को नहीं डुबा
सकता, जब तक पानी को जहाज अन्दर न आने दे।
इसी तरह दुनिया का कोई भी नकारात्मक विचार
आपको नीचे नहीं गिरा सकता, जब तक आप उसे अपने
अंदर आने की अनुमति न दें।”
🙏🏻

भारत रत्न डॉ. अंबेडकर अवार्ड्स 2016

बॉलीवुड मनायेगा डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर की 125 वीं ज्यंति !

“छटवां भारत रत्न डॉ. अंबेडकर अवार्ड्स 2016”

स्थान: श्री षणमुखानंद ऑडिटोरियम, सायन, मुंबई
दिनांक : 20 मई 2016

समय: शाम 6 बजे से रात्री 10 बजे तक

आयोजक: कैलाश मासूम

 

भेदभाव के खिलाफ रहे अघोरेश्वसर संत कीनाराम

पूरे आदर-सम्‍मान के साथ आवभगत हुई और जूनागढ के नवाब ने हीरे-जवाहरातों से भरा थाल सामने रखकर उसे कुबूल करने का अनुरोध किया। सामने ऊंचे आसन पर बैठे महात्‍मा ने थाल में से दो-चार जवाहरात उठाकर अपने मुंह में डाले और फिर अचानक थूक कर बोल उठे – क्‍यों रे धूर्त, यह क्‍या दे रहा है, यह ना तो मीठा है और ना ही खट्टा। सख्‍त भी इतना है कि दांत टूट जाएं। फिर क्‍या था। नवाब नतमस्‍त हो गया। बोला, हमें सेवा का कुछ तो मौका दें महाराज। इस पर आदेश हुआ कि ठीक है, आज से ही तू यह नियम बना ले कि कोई भी साधु-फकीर अब से भूखा नहीं रहेगा। हर एक को ढाई पाव आटा दिया जाएगा। गरीब रियाया के साथ भी यही सुलूक होना चाहिए। और इस हुक्‍म को जूनागढ के नवाब ने फर्शी सलाम बजाकर मंजूर कर लिया।

यह है अघोरेश्‍वर के नाम से मशहूर संत कीनाराम कथा। दरअसल अपने चेले को जूनागढ़ जेल से छुड़ाने के लिए कीनाराम ने भिक्षाटन का वही तरीका अपनाया, जिसके अपराध में उनके चेले विजयराम को जेल में डाल दिया गया था। कीनाराम भी जेल में डाल दिये गये। काम मिला चक्‍की पीसने का। लेकिन बजाय चक्‍की चलाने के, वे चक्‍की को ही चलने का हुक्‍म दे बैठे। चक्‍की नहीं चली तो उन्‍होंने चक्‍की पर अपनी छड़ी मार दी। फिर तो जैसे चमत्‍कार ही हो गया। एक साथ ही जेल की सारी 981 चक्कियां अपनेआप ही चलने लगीं। जाहिर है कि जूनागढ के नवाब को इस चमत्‍कार के आगे नतमस्‍तक होना ही था। जूनागढ की जेल में बंद सारे फकीरों को रिहा भी कर दिया गया। यह थे बाबा कीनाराम। कीना यानी खरीदा हुआ।

चंदौली जिले के रामगढ़ गांव के रघुवंशी क्षत्रिय जमींदार परिवार में अकबर सिंह के घर विक्रमी संवत 1685 के भादों में कृष्‍णपक्ष की अघोर चतुर्दशी को क्षिजित में सूर्य के उदय के साथ ही शिवा का जन्‍म हुआ। लेकिन बच्‍चा ना तो रोया और ना ही दूध के लिए चिल्‍लाया। मां मनसा देवी समेत पूरा कुटुम्‍ब परेशान। अचानक ही तीन साधु पहुंचे और बच्‍चे के कान में कुछ मंत्रोच्‍चार किया। कहा जाता है कि यह तीनों साधु ब्रह़मा, विष्‍णु और महेश ही थे, जो बच्‍चे को आशीष देकर चले गये। पुरोहितों की सलाह पर इस बच्‍चे को पहले बेचा गया फिर खरीदा गया। यह एक टोटका था। लेकिन जिस बच्‍चे को खरीद कर कीनाराम बनाया गया, तब किसी को क्‍या पता था कि वही कीनाराम दुनिया के दुखों को खरीद कर अपनी झोली में डाल लेगा, सामाजिक बुराइयों को कदमों तले रौंद डालेगा और इतिहास में एक अमर पुरूष के तौर पर पूजित होगा। यह कीनाराम ही था जिसने राम को अवाम तक पहुंचा कर एक नये सांस्‍कृतिक आंदोलन का सूत्रपात किया, जिसके परिणामस्‍वरूप देश को राजनीतिक तौर पर एकजुट किया जा सका।

कीनाराम तो बचपन से ही जिज्ञासु था। विवाह हुआ लेकिन गौना से पहले ही पत्‍नी की मायके में मौत हो गयी। कुछ समय बाद मां ने भी दम तोड़ दिया। बस यहीं से शुरू हो गया कीनाराम का एक अनोखा वैराग्‍य जो सीधे शिव के साथ ही राम तक को भी आत्‍मसात कर गया। सामाजिक जाति-पाति के बंधन और भेदभाव देख मन वित़ष्‍णा से भर गया तो घर छूट गया और कीनाराम औघड़ हो गया। वैचारिक युद्ध शुरू हो गया। तुलसीदास बोले सियाराम मैं सब जग जानी तो कीनाराम ने जवाब दिया कि आओ फिर मिल एकसाथै भोजन सानी। देखते ही देखते कीनाराम की धूनी का धुआं लोगों को पवित्र करने लगा। लेकिन कीनाराम ने किसी पर कुछ थोपा नहीं। राजसी रूचि के लोगों को वैष्‍णव ही रहने दिया और सम्‍पूर्ण समर्पितों को अघोर बना दिया। उनके भक्‍तों को यकीन था कि कीनाराम में अलौकिक शक्तियां हैं। हिंगलाज देवी से उनका साक्षात्‍कार तो खूब चर्चित घटना रही। उनके अभिन्‍न शिष्‍य बीजाराम को तो बचपन में कीनाराम ने चमत्‍कार की तरह तब एक जमींदार के मुंह पर एक मोटी रकम मार कर हासिल किया था, जब वह बीजाराम को लगान न चुकाने पर बंधक बनाये हुए था। कांधार में शाहजहां और काशी में राजा तेज सिंह को दिया सर्वनाश का श्राप तो आज भी लोगों का दिल दहला देता है।

कीनाराम ने देश की सांस्‍क़तिक एकता को राजनीतिक ताकत के तौर पर पहचाना और उसमें विभेदी तत्‍वों के खिलाफ जेहाद छेड़ा। एक कपाल-खप्‍पर, एक लंगोटी और मिट़टी का एक बर्तन की अपनी भौतिक सम्‍पदा के बल पर ही कीनाराम ने पूरे आर्यावर्त को नाप डाला। जरूरत पड़ी तो केवल अक्षत फेंक कर बहते शव को जिंदा कर दिया, तो कभी काशी के शीतलाघाट पर केवल ज्ञान बिखेर रहे लोगों के बीच गदहे पर बैठकर पहुंचे और उन्‍हें कर्म की शिक्षा दी। यह इस अधनंगे संत का ही दमखम था जो वह अकेले औरंगजेब से जा भिड़ा। 21 सितंबर 1771 को करीब 170 साल की उम्र में कीनाराम ने देह त्‍यागी। बडे-बडे भण्‍डारों को अपने खप्‍पर में खाली कर लोगों के अहंकार धूलधूसरित कर देने की ताकत रखने वाले इस संत ने ठीक ही कहा कि कीनाराम फकीरी सहज नहीं, पग धरते निकले दूध छटी का।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों महुआ न्यूज में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख जनसंदेश टाइम्‍स में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

Dalits and tribals should defeat caste with capital

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The economic empowerment of Dalits and tribals through policy reforms under the Make in India initiative is the only way to beat prejudices entrenched in the socio-political system, says chairman of the Dalit Indian Chamber of Commerce and Industry, Milind Kamble. In an interview to The Indian Express, he said, “Dalits and tribals should pursue a simple motto. Defeat caste with capital.”

Time has come when we have to work to ensure that Dalits and tribals evolve as job providers and not seekers, he said.

DICCI is all set to sign MoUs worth Rs 700 crore with the state government during the Make in India Week in Mumbai, to be held from February 13 to February 18. In Maharashtra, Dalits form 10.8 per cent of the population and tribals 8 per cent.

While appreciating the Maharashtra government’s decision to reserve 20 per cent industrial plots for SC/STs, Kamble said, “We have to come to terms with reality. Jobs in government (public) sectors are shrinking. The industrial growth is an opportunity to strengthen the SMSE.”

The Dalits and tribals with no land holdings will be the direct beneficiaries of the industrial growth, he said. “The generation-next Dalits and tribals, who are educationally empowered, have become very aspirational and are willing to take on the entrepreneurship challenge,” Kamble said.

According to Kamble, the DICCI has 3,000 millionaires, out of which 100 entrepreneurs have turn-overs of more than Rs 100 crore. “In 2001, total strength of SMSE in India was one crore. In 2016 the total number of SMSEs has multiplied to six crore. Now take the comparative figures for SC/ST. In 2001, the total SC/ST-run SMSE was 15 lakh. Today, it is 90 lakh. The SC/STs account for 15 per cent of the total SMSE sector in the country,” he said.

The DICCI chairman believes Make in India can offer solutions to the agriculture sector, on which almost 50 to 55 per cent of the population is dependent. He said, “When we talk of foreign investment in the food or textile sector, its beneficiaries will be farmers and farm labourers.” However, the government will have to come out with an integrated policy for that, he said.

Dismissing apprehensions raised in some quarters that Make in India would be industry-focussed and would ignore agriculture, Kamble said, “It is illogical. If the textile sector grows, benefits will trickle down to farmers who cultivate the cotton.” Similarly, industrial growth helps to grow and sustain SMSEs, he said.

“In 1952, Dr Babasaheb Ambedkar, in his first election manifesto released under the banner of SC Federations, talked about corporation farming as a must,” Kamble said. Ambedkar warned that the present farming model with small landholdings and disintegrating families would not be affordable in the long run. He had clearly said, ‘We cannot afford farming. We will have to bring mechanisation and modernisation to evolve a new model that would being cost down and higher productio’,” the DICCI chairman said.

DICCI, with presence in almost 18 states across India, has been working to promote entrepreneurship amongst the backwards castes. Kamble said, “In the past decade, there has been visible change, with the generation-next no longer willing to be at the mercy of the political system. From Maharashtra to West Bengal, the mood among the Dalits and tribals is to attain self reliance.” The new-age Dalits and tribals are aware that economic well-being can provide them not only financial, but also social security, as it elevates their stature in society, Kamble said.

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राजस्थान में दलित छात्र संगठनों की आहट

समय के बदलाव के साथ भारत के सामाजिक परिवेश में भी बदलाव आया है| भारत मे संविधान के लागू होने के बाद दलित, पिछड़ों व वंचितों को शिक्षा,बिजली व पानी को प्राप्त करने का कानूनी हक मिला,जिसकी बदोलत आज दलित वर्ग शिक्षा के प्रति जागृत हुआ है|
मगर जन्म के साथ जुड़ी जाति व्यवस्था की जड़े उच्च शिक्षण संस्थाओ मे भी आसानी से देखी जा सकती है| कई प्रकरणों में सामने आया है कि दलित वर्ग के युवा विधार्थी जाति व्यवस्था के आधार पर प्रताड़ित होते है|
कई दलित छात्र मानते है कि भाजपा के सम्बंधित संगठन एबीवीपी व कांग्रेस के एनएसयूआई में उन्हें सीटे बढाने,पास को प्रवेश या महाविधालय की समस्या जैसी मांगो का समर्थन तो मिलता है मगर सामाजिक व जाति व्यवस्था तथा आरक्षण जैसे मसलो पर वो खामोश नजर आते है|
दलितो के मसीहा डॉ. अंबेडकर के गृहराज्य महाराष्ट्र और कभी मायावती का शासन क्षेत्र उत्तर प्रदेश मे भी दलित युवा छात्र अपने हक के लिए अम्बेडकर के नाम पर कई छात्र संगठन बनाकर अपनी आवाज बुलन्द करते हुए नजर आते थे,मगर पिछले दो वर्षो मे राजस्थान मे भी कई दलित छात्र संगठन सामने आये है, जिनमें भारत विधार्थी मोर्चा (बीवीएम), डॉ. अंबेडकर स्टुडेंट फ्रंट अॉफ इण्डिया (डीएएसएफआई) और एससी एसटी स्टुडेंट युनियन प्रमुख नाम है|

भारत विधार्थी मोर्चा बीएमपी नामक राजनैतिक पार्टी से अनुदान प्राप्त है मगर दलित छात्रों के हित में संघर्षरत है,लेकिन इसका अधिकांश प्रचार प्रसार केवल बाडमेर मे ही नजर आता है| वही डॉ राम मीणा व्दारा संचालित एससी एसटी स्टुडेंट युनियन का कार्य क्षेत्र उदयपुर में है| बीवीएम से जुड़े एक कार्यकर्ता ने बातचीत में बताया कि” हम एससी के साथ एसटी,ओबीसी व अल्पसंख्यक को साथ जोड़ते है|”

वही डॉ अंबेडकर स्टुडेंट फ्रंट ऑफ इण्डिया(डीएएसएफआई) ने आज राज्य में एक अलग पहचान बनाई है| डीएएसएफआई जयपुर, सीकर, नागौर,सिरोही व चुरू सहित कई जिलो मे कार्य कर रहा है| पिछले छात्र संघ चुनाव मे भी संगठन ने कई जिलों की मुख्य महाविधालय मे भाग लिया था| संगठन ने अपने पांच छात्र संघ अध्यक्ष निर्वाचित किये जिनमे एक समर्थित उम्मीदवार था| डीएएसएफआई से जुड़े नोरतराम लोरोली ने बताया कि “संगठन दलित छात्रों के हित की आवाज तो उठाता ही है साथ ही दलित उत्पीड़न के मामलों मे भी सक्रियता दिखाता है,हमारा मकसद छात्र संघ चुनाव जीतना नही है बल्कि समाज के युवा वर्ग के स्वाभिमान की लड़ाई जीतना है|”

छात्र राजनीति के जानकार बताते है कि दलित छात्रों के हक की लड़ाई लड़ने का दावा तो अन्य सभी छात्र संगठन करते है,मगर वास्तविकता कुछ और है| आज भी कई जिलों के महाविधालय व विश्वविधालयों मे आज तक दलित छात्र अध्यक्ष नही बन पाये है|

पिछले दो वर्षों मे दलित छात्र संगठनों की आहट का ही नतीजा हो सकता है कि छात्र संघ चुनाव 2015 मे राज्य की प्रमुख दो विश्वविधालयों मे एबीवीपी व एसएफआई ने अध्यक्ष पद पर दलित छात्रों को टिकट दी थी हांलाकि वे जीत नही पाये थे|

वक्त किस तरफ करवट लेता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा मगर छात्रों को महाविधालयों में एक विकल्प जरूर दलित छात्र संगठनों के रूप में जरूर मिलेगा|

(लेखक एक स्वंतत्र पत्रकार है.)
Source : ajmernama.com

जाओ जाकर पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती

जाओ जाकर पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती
काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो
ज्ञान के बिना सब खो जाता है,
ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है
इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो
दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो, तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है
इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो, ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो।______सावित्रीबाई फुले

https://www.facebook.com/SatyendraHumanist/videos/870038609720368/

1. इनका जन्‍म 3 जनवरी, 1831 में दलित परिवार में हुआ था।
2. 1840 में 9 साल की उम्र में सावित्रीबाई की शादी 13 साल के ज्‍योतिराव फुले से हुई।
3. सावित्रीबाई फुले ने अपने पति क्रांतिकारी नेता ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले. उन्‍होंने पहला और अठारहवां स्कूल भी पुणे में ही खोला।
4. सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला अध्यापक-नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता थीं।
5. उन्‍होंने 28 जनवरी 1853 को गर्भवती बलात्‍कार पीडि़तों के लिए बाल हत्‍या प्रतिबंधक गृह की स्‍थापना की।
6. सावित्रीबाई ने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया।
7. सावित्रीबाई फुले ने आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में डिलवरी करवा उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया. दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर इन्होंने डॉक्टर बनाया।
8. महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु सन् 1890 में हुई. तब सावित्रीबाई ने उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिये संकल्प लिया।
9. सावित्रीबाई की मृत्यु 10 मार्च 1897 को प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान हुई।
10. उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता।
प्रथम महिला शिक्षिका के जन्म-दिवस पर बहुत बहुत बधाई।
फुले दम्पत्ति को सादर नमन।
जयभीम।

TOP 10 LITTLE KNOWN FACTS ABOUT DR B R AMBEDKAR