आरक्षण की गेंद

सरकार ने आरक्षण की बाबत एक अहम फैसला किया है। इस फैसले के तहत नेशनल कमीशन फॉर सोशियली ऐंड एजुकेशनली बैकवर्ड क्लासेस यानी राष्ट्रीय सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ा वर्ग आयोग (एनएसईबीसी) का गठन होगा, जो मौजूदा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की जगह लेगा। पहले भी, आरक्षण का आधार सामाजिक व शैक्षिक पिछड़ापन ही था, और जैसा कि खुद नाम से जाहिर है, नए आयोग के गठन के बाद भी वही होगा। इसमें कुछ गलत नहीं है, संविधान में भी और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में भी आरक्षण की बाबत यही नीति और नजरिया मान्य है। केंद्र सरकार के ताजा निर्णय में अगर कुछ नया है, तो एक यह कि इसके जरिए उसने आरक्षण की गेंद संसद के पाले में डाल दी है। दूसरे, प्रस्तावित एनएसईबीसी को संवैधानिक दर्जा दिया जाएगा, जैसा कि अनुसूचित जाति आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग को हासिल है।

पर यह दर्जा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को प्राप्त नहीं था। सवाल है कि सरकार के इस फैसले से आरक्षण को लेकर क्या फर्क पड़ेगा? सबसे खास बात यह होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर किस जाति को पिछड़े वर्ग में रखा जाए और किसे बाहर किया जाए, इसका फैसला केंद्र सरकार के बजाय संसद करेगी। एनएसईबीसी का एक अध्यक्ष होगा और एक उपाध्यक्ष, और तीन अन्य सदस्य होंगे। नागरिकों के किसी समूह को पिछड़े वर्ग में शामिल करना है या उससे बाहर करना है इस बारे में प्रस्तावित आयोग केंद्र सरकार को अपनी सिफारिश भेजेगा। आयोग की सलाह अमूमन केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी होगी। मगर इस बाध्यकारिता का कोई ज्यादा मतलब नहीं होगा, क्योंकि फैसला अंतत: संसद करेगी। अलबत्ता यह जरूर कहा जा सकता है कि निर्णय संसद में होने का व्यावहारिक अर्थ यह होगा कि सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन की भूमिका उसमें अहम होगी।

लेकिन जब ओबीसी आरक्षण के लिए जाट आंदोलन जैसी उलझन में डाल देने वाली स्थिति होगी, तो सरकार पल्ला झाड़ते हुए कह सकेगी कि हमारे हाथ बंधे हुए हैं, फैसला हमें नहीं संसद को करना है। पटेल औरकापु जैसी कई और ताकतवर जातियां भी आरक्षण मांग रही हैं। उनकी सियासी ताकत को देखते हुए, क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि संसद उनकी मांग पर सिर्फ सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के कोण से विचार करेगी? दूसरे, क्या इस बात की भी आशंका नहीं है कि कोई ऐसा समुदाय, जो संख्याबल में कमजोर हो और राजनीतिक नफे-नुकसान के लिहाज से ज्यादा मायने न रखता हो, उसके आवेदन या उसकी शिकायत को नजरअंदाज कर दिया जाए? आरक्षण को लेकर उभरने वाले विवादों के पीछे दो सबसे बड़ी वजहें हैं।

एक यह कि मांग की तुलना में रोजगार के नए अवसर बहुत कम पैदा हो रहे हैं। दूसरे, संगठित क्षेत्र की नौकरियों के बरक्स असंगठित क्षेत्र के रोजगार में पैसा भी बहुत कम मिलता है और असुरक्षा भी ज्यादा होती है। खेती के लगातार घाटे का धंधा बने रहने तथा अन्य स्व-रोजगार में अस्थिरता व दूसरी मुश्किलों के चलते सरकारी नौकरी सबका सपना हो गई है। यही कारण है कि जाट, पटेल और कापु जैसे समुदाय, जो कभी अपनी आत्मछवि पिछड़े के तौर पर नहीं देखते थे, अब आरक्षण के लिए आसमान सिर पर उठा लेते हैं। कोई भी पार्टी वोट के नुकसान के डर से आरक्षण की अनुचित मांग के खिलाफ मुंह नहीं खोलती। ऐसे में, संसद में सियासी समीकरणों से ऊपर उठ कर विचार होगा, इसकी ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती।

OBC आयोग को मिलेगा संवैधानिक दर्जा; संसद के पास होगा आरक्षण देने का अधिकार

jansatta

आरक्षण के रण पर बेबाक बोल: हक-बंदी

 

भारतीय जनता पार्टी की सरकार में आरक्षण के मुद्दे पर सब कुछ ठीक नहीं है। हरियाणा महज इसका ताजा उदाहरण है। इसका कड़वा स्वाद पार्टी हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में चख चुकी है। लेकिन सबक सीखने का शायद भाजपा में रिवाज नहीं है। पिछले एक साल से भी ज्यादा समय में जो भी विवाद हुए उनसे पार्टी ने शायद ही कभी उबरने की कोशिश की हो, ज्यादातर मामलों में हठधर्मिता ही दिखाई है। यही हाल उसकी हरियाणा की राज्य सरकार का भी है। हरियाणा में भी केंद्र की तर्ज पर ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे मनोहर लाल खट्टर की अगुआई में सरकार बनाई गई जो गठन के बाद अपने ही फैसलों के जाल में उलझती चली गई। नतीजा यह रहा कि राज्य में उबाल आ गया और समुदायों के बीच जातीय आधार पर एक विभाजक रेखा खिंच गई। खट्टर के साथ विडंबना यह रही कि एक साल में उनके राजनीतिक समर्थकों और चुनिंदा ‘अपने’ नौकरशाहों ने उन्हें राज्य और उसकी नब्ज को पहचानने की नौबत ही नहीं आने दी। खुद मुख्यमंत्री भी ‘स्वयंसेवकों’ के भरोसे रहे। आरक्षण पर जो कुछ राज्य में हुआ वह अचानक नहीं था, वरन उसकी भूमिका पहले से बन रही थी। लेकिन खट्टर को जमीन से जुड़ने का मौका ही नहीं दिया गया। उनके अपने मंत्रियों ने उनसे सहयोग नहीं किया और उनकी खुफिया एजंसियां भी ऐतिहासिक नाकामी दिखा गर्इं। दहकती आग में घी डालने के लिए प्रदेश में कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोकदल तो थे ही। यही वजह रही कि हालात समझ में आने से पहले ही बेकाबू हो गए। लेकिन केंद्र की चिंता उससे कहीं आगे है। एक उग्र प्रदर्शन के आगे घुटने टेकने की जो फजीहत झेलनी पड़ रही है वह अलग और इस मामले में जो एक अनचाहा रास्ता निकालना पड़ा वह अलग। देश की सरकार तीन दिन तक इस प्रदर्शन का दमन करने का रास्ता खोजती रही और उसमें देश के जेम्स बांड का दर्जा पा चुके सुरक्षा सलाहकार से लेकर सेना और केंद्रीय गृह मंत्रालय के आला पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे। लेकिन हल कोई नहीं और अंत में प्रचंड बहुमत से बनी एक सर्वशक्तिमान सरकार को मिमियाते हुए समर्पण करना पड़ा। राज्य सरकार की अकर्मण्यता तो शायद फिर भी अपने लिए कोई सफाई ढूंढ़ ले लेकिन केंद्र के धुरंधर इससे कैसे बचाव का रास्ता तलाश करेंगे, यह देखने की बात होगी। जाटों को आरक्षण के मामले में पहले राज्य सरकार और बाद में केंद्र सरकार जाट नेताओं को वस्तुस्थिति समझाने में नाकाम रही। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने तो जाटों को आरक्षण देना मान ही लिया था। उससे पहले केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने जाटों को आरक्षण के नाम पर राजस्थान में वोट लूट लिए थे और अपनी सरकार जमा ली थी। राजस्थान में भाजपा को इसका भारी फायदा मिला। हरियाणा में जाटों ने आरक्षण लेने के लिए क्या-क्या नहीं किया!

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