The story of India’s caste blues

If you want a house, you may build one. If you want a new shirt, you’ll buy one. If your child is of school-going age, man, you’ll send him to school. But in the small hillside town of Dasgaon in the Raigad district of Maharashtra, overrun by the British military in the late 19th century, these were bold ideas with threat to life and limb. For a Dalit.
By erecting a single-storey house, Vitthal Hate Joshi, a Mahar, who made his living as a typist, passed into local legend. To his fellow-men, he became ‘Madi-wala Joshi’ — the man with the single-storey. His relative, Babaji More, was sent to jail on the charge of stealing wood to build it.
His son, Ramchandra Babaji More, born an untouchable and, given up to rebellion, perhaps in the same hour, began sending letters, by the age of 11, to the government to cancel grants to his school for denying him admission for being a Dalit. Till the late Twenties, he worked with BR Ambedkar. By the Thirties, he had joined the undivided Communist Party of India.
Dr Ambedkar (seated fourth from left) with prominent leaders of the first Mahad satyagraha in Bombay, 1927. RB More (circled) of Dasgaon suggested the idea of a conference at Mahad to Ambedkar. From the Thirties, More joined the undivided Communist Party of India. (Photo courtesy: Subodh More)
Surbanana Tipnis, an upper-caste, had been RB More’s classmate. His was a 33-year-old working relationship with Ambedkar, says his grandson Milind Tipnis, 60, a social worker. In spite of being a landlord, he joined the Ambedkar-led anti-landlord (‘Khot’) agitation, the first instance of a successful peasant agitation leading to a law. The Congress opposed the movement due to its Brahmin/landlord base then.

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मुबारकपुर मे ज्योतिबा फुले एवम् डॉक्टर अम्बेडकर की सयुक्त जयन्ति समारोह सफलता पूर्वक सम्पन

रास्ट्रीय मूलनिवासी संघ RMS एवम् तथागत ज्ञान प्रचार वैलफेयर अस्सोसिअशन TGPWA के तत्वधान मे 10 अप्रैल 2016 को दिल्ली मुबारकपुर मे ज्योतिबा फुले एवम् डॉक्टर अम्बेडकर की सयुक्त जयन्ति समारोह सफलता पूर्वक सम्पन हुआ। ओर पढे लिखे बच्चों को ओर खेल कूद वालो को इनाम ओर सम्मान पत्र दिया गया।
चीफ गेस्ट फकीर चंद अमेरिका।
किर्षि वैज्ञानिक रामभज बौद्ध।
डॉक्टर गुलशन प्रकाश ।
सुरेश गहलोत तथा वक्ता सागर भूमक मास्टर दयानंद इंजीनयर संदीप
भीम गीत :- मोनू ,सशी भूषण , जितेंदर इंदौरा।

 

 

नायक नहीं आंदोलन महत्वपूर्ण है

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बाहर और भीतर पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह एक राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना और चैनलों से लेकर अखबारों और सोशल मीडिया के साथ-साथ इंटरनेट पर उपलब्ध ई-पत्रिकाओं में भी उसकी भरपूर धमक रही. अंतरिम जमानत पर रिहाई के बाद जेएनयू के छात्रों के बीच दिया कन्हैया का भाषण अनेक चैनलों ने लाइव चलाया और बताते हैं कि इंटरनेट पर इसे 30 लाख से अधिक लोग देख चुके हैं. इसके बाद जो प्रतिक्रियाएं आईं उनमें उसे चे ग्वेरा से लेकर लेनिन तक कहा गया, प्रशंसा के पुल बांध दिए गए और एक आम मत था कि भारत को अपना नया नेता मिल गया है. इसी के बरअक्स उसे विलेन बनाने वालों की भी कोई कमी नहीं है. ऐसा लगता है कि कन्हैया को लेकर देश का जनमत दो हिस्सों में बंट गया है.

अगर देखें तो उसका भाषण महान नहीं था. बौद्धिक सेमिनारों और आयोजनों में जाने वाले जानते हैं कि उसमें कोई नई और मौलिक बात नहीं थी. कुछ तथ्यात्मक भूलें भी थीं. वैसे भी संघर्षों में तपे वामपंथी छात्र नेता पूरे कमिटमेंट के साथ बोलते हुए अच्छा भाषण देते ही हैं. लेकिन वह भाषण निश्चित तौर पर ऐतिहासिक था. सोचिए जरा जेल और इतने दमन के बाद अगर उसके भाषण में डर का कोई कतरा होता? प्रतिहिंसा का कोई कतरा होता? कोई अभद्र टिप्पणी होती? कोई हल्की बात होती? तो यह पूरा छात्र आंदोलन कमजोर पड़ जाता. वह किसी डिबेट में नहीं था, जेल से आने के कुछ घंटों के भीतर उस छात्र समूह के सामने था जो उसके साथ रहा तो उस मीडिया और जनता के सामने भी जिसका एक बड़ा हिस्सा उसको खत्म कर देने के लिए मुतमइन था. इसलिए वह देस-काल महत्वपूर्ण बन गया. उसे इतिहास ने एक मौका, एक जिम्मेदारी दी, जिसे उसने  बखूबी निभाया. इस अवसर पर जिस कमिटमेंट और विट के साथ उसने दक्षिणपंथी राजनीति पर हमला किया और आंबेडकरवादी तथा वामपंथी छात्र राजनीति को एक मंच पर आने का आह्वान किया वह संघर्ष की उस लंबी परियोजना की ओर इंगित करने वाला था, जिसके बिना फासीवाद के खिलाफ कोई लंबी लड़ाई भारत में नहीं लड़ी जा सकती.

देश भर के तमाम इंसाफपसंद लोग जो सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं… ये सब हीरो हैं. सब इसमें बराबरी के हिस्सेदार हैं

और यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. देश में एक के बाद एक छात्र आंदोलनों की कड़ियां जुड़ती जा रही हैं. शुरुआत एफटीआईआई के आंदोलन से हुई जब एक औसत से भी निचले स्तर के कलाकार गजेंद्र चौहान को सिर्फ इस आधार पर इस प्रतिष्ठित संस्था की कमान सौंप दी गई कि वे सत्ताधारी पार्टी से जुड़े हुए हैं. वह आंदोलन कैंपस से बाहर निकला और जेएनयू ही नहीं अनेक विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्रों, फिल्म से जुड़े गंभीर लोगों और बुद्धिजीवी समाज ने उसे पूरा समर्थन दिया. उसके बाद केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय विश्वविद्यालयों की शोध फेलोशिप बंद किए जाने के खिलाफ एक ऐतिहासिक आंदोलन हुआ जिसमें छात्रों ने यूजीसी कार्यालय के सामने 88 दिनों तक लगातार धरना दिया. इसमें जेएनयू ही नहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय सहित तमाम जगहों के छात्र शामिल थे और उनके समर्थन में देश भर में धरना प्रदर्शन हुए. अंततः सरकार को फेलोशिप तो देनी पड़ी लेकिन इसे बढ़ाने की उनकी मांग ठुकरा दी गई. हैदराबाद के आंबेडकरवादी छात्र संगठन के कार्यकर्ता रोहित वेमुला के केंद्रीय मंत्रियों के दबाव में छात्रावास से निष्कासन के बाद आत्महत्या जैसा कदम उठाने के बाद तो आत्महत्या के  लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने की मांग के साथ देश के भीतर ही नहीं बाहर भी आंबेडकरवादी, वामपंथी और प्रगतिशील विचारधारा के लोगों ने जबरदस्त प्रतिरोध दर्ज कराया. हर बार की तरह इस बार भी जेएनयू इस प्रतिरोध में अपनी पूरी ताकत के साथ खड़ा था.

इलाहाबाद में छात्रों ने अपनी अध्यक्ष ऋचा सिंह के नेतृत्व में विषैले बयानों के लिए चर्चित सांसद आदित्यनाथ को प्रवेश करने से रोका तो उनके खिलाफ जो कुचक्र रचे जा रहे हैं वे आज तक जारी हैं. केंद्र में नई सरकार आने के बाद जिस तरह कैंपसों में हिंदुत्व का वैचारिक एजेंडा लागू करने के लिए कोशिशें हुईं उसमें यह स्वाभाविक था कि इसका दुष्परिणाम झेलने वाले तबके एक साथ आते और प्रतिरोध दर्ज कराते. जेएनयू में हुई एक घटना के बाद जिस तरह तीन छात्रों को राजद्रोह (भाषा की अपनी राजनीति होती है जिसके तहत ब्रिटिशकालीन राजद्रोह कानून को मुख्यधारा के चैनल देशद्रोह में बदल देते हैं) के आरोप में गिरफ्तार किया गया, वह तमाम तार्किक लोगों को गैरजरूरी और अतिरेकी कदम लगा और इसीलिए देश-विदेश से तमाम प्रगतिशील लोगों, विश्वविद्यालयों, शिक्षक संघों, बुद्धिजीवियों और आम जनता ने इसका कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराया. छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में कन्हैया के भाषण को इन्हीं परिप्रेक्ष्यों में देखा जाना चाहिए लेकिन मसीहा की तलाश में पागल हमारा समाज केजरीवाल से कन्हैया तक के कंधों पर अपनी अकूत उम्मीदों का बोझ डालने के लिए बेकरार है. उसे उद्धारक चाहिए जो पांच साल में दुनिया बदल दे और खुद बस एक बार जाकर वोट डालना हो. जाहिर है उसे हर बार धोखा खाना ही होगा. एक कमजोर और आत्मविश्वास से हीन समाज ही मसीहा तलाशता है लेकिन इतिहास का अनुभव बताता है कि समाज जनता बदलती है नेता नहीं. आंदोलन नेता पैदा करते हैं, नेता आंदोलन नहीं पैदा करते. व्यक्ति को आंदोलन से ऊपर खड़ा कर देने की प्रवृत्ति सत्ता और उसके समर्थकों के लिए तो लाभकारी होती है जो आज उसे कुछ साल पहले मिली सजा से लेकर एक मित्र के साथ सामान्य-सी तस्वीर को अपने कुत्सा प्रचार का हिस्सा बनाकर निजी हमलों की आड़ में व्यापक सवालों को छिपा रहा है लेकिन शिक्षा के बाजारीकरण और भगवाकरण के खिलाफ जो एक देशव्यापी आंदोलन सुगबुगा रहा है, उसके समर्थकों का इसे स्वीकार करना घातक होगा.

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रोहित वेमूला खुदकुशी मामला : तेलंगाना के सभी विश्वविद्यालयों ने बुलाया बंद

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला की खुदकुशी पर विरोध बढ़ता ही जा रहा है। आज तेलंगाना की सभी यूनिवर्सिटियों ने बंद बुलाया है। यह बंद रोहित की खुदकुशी को लेकर आंदोलन कर रही ज्वांइट एक्शन कमेटी की ओर से बुलाया गया है।

 

रोहित वेमूला खुदकुशी मामला : तेलंगाना के सभी विश्वविद्यालयों ने बुलाया बंद

रोहित ने 17 जनवरी को यूनिवर्सिटी के एक कमरे में खुदकुशी कर ली थी। रोहित और उसके चार साथियों को यूनिवर्सिटी के हॉस्टल से निलंबित कर दिया गया था, जिसके कुछ ही दिन बाद रोहित ने खुदकुशी कर ली थी।

प्रदर्शन कर रहे छात्रों का आरोप है कि केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कार्रवाई के लिए केंद्र को चिट्ठी लिखी थी, जिसके बाद ही छात्रों को निलंबित किया गया था। ये छात्र बंडारू दत्तात्रेय और यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर अप्पा राव को बर्खास्त करने की मांग पर अड़े हैं।

 

 

SC एसोसिएशन का ‘विरोध दिवस’

दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की कथित आत्महत्या के मुद्दे पर जारी आंदोलन से जुड़ते हुए हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) की अनुसूचित जाति-जनजाति कर्मचारी कल्याण एसोसिएशन ने शुक्रवार क ‘विरोध दिवस’ का आयोजन किया। अनुसूचित जाति-जनजाति शिक्षक फोरम और संबंधित शिक्षकों ने भी शुक्रवार सुबह अपनी क्रमिक भूख हड़ताल जारी रखी जो गुरुवार से शुरू हुई थी। सामाजिक न्याय संयुक्त कार्यसमिति के प्रतिनिधि ने कहा कि फोरम के सदस्यों ने विश्वविद्यालय के विजिटर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को अपनी इस मांग के संबंध में पत्र लिखा है कि कुलपति अप्पा राव पोडिले को हटाया जाना चाहिए तथा प्रभारी कुलपति विपिन श्रीवास्तव को पद से अलग किया जाना चाहिए। वेमुला ने 17 जनवरी को हास्टल के कमरे में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी। संयुक्त कार्यसमिति ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय परिसर में चल रहे आंदोलन के प्रति एकजुटता व्यक्त करने के उद्देश्य से देश भर के विश्वविद्यालयों में सामूहिक भूख हड़ताल का आह्वान किया है। छात्रों के दो समूहों ने पूर्व में एचसीयू में प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की थी। हालांकि उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर चिंता के चलते उन्हें अस्पताल भेज दिया गया। संयुक्त कार्यसमिति (जेएसी) के प्रतिनिधि ने कहा कि अपनी मांगों को लेकर समिति की योजना फरवरी के पहले सप्ताह में राष्ट्रपति से मिलने के लिए दिल्ली जाने की है। जेएसी की मुख्य मांगों में विश्वविद्यालय में वंचित तबके के छात्रों के साथ किसी भी अन्याय को रोकने के लिए ‘रोहित एक्ट’ लाए जाने और देश में पिछले 20 वर्षों में विश्वविद्यालयों में कथित जातिगत और शैक्षिक भेदभाव के मुद्दों को देखने के लिए एक समिति बनाए जाने जैसी मांगें शामिल हैं। राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र पर 93 ‘संबंधित शिक्षकों’ के हस्ताक्षर हैं। इसमें विश्वविद्यालय के कुलपति और प्रभारी कुलपति को उनके पदों से हटाने का आग्रह किया गया है। इस बीच, आंदोलित छात्रों ने प्रभारी कुलपति विपिन श्रीवास्तव को हटाए जाने की मांग करते हुए प्रशासनिक ब्लाक के समक्ष प्रदर्शन किया। गैर शिक्षण कार्य से जुड़े कई सदस्यों ने श्रीवास्तव को बताया कि वे कार्यालय बंद रहने की वजह से काम करने में सक्षम नहीं हैं और हर रोज विश्वविद्यालय आने के बाद घर वापस लौट रहे हैं। गैर शिक्षण कर्मियों ने कहा कि वे अपना नियमित काम करना चाहते हैं और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पद से हटाए जाने जैसी कुछ मांगें कुलपति के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। उनके अनुसार छात्रों के विरोध के चलते प्रशासनिक ब्लॉक से वापस लौटे श्रीवास्तव ने कहा कि वह कार्यालय का कामकाज जल्द शुरू करने के प्रयास करेंगे। प्रभारी कुलपति ने दो दिन पहले प्रदर्शन स्थल पर आंदोलित छात्रों से बात करने की कोशिश की थी, लेकिन नारेबाजी के चलते उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। source

हैदराबाद यूनिवर्सिटी से 2 और इस्तीफे

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के दो और शिक्षकों ने पद छोड़ दिया. प्रोफेसर सौम्या और प्रोफेसर अनुपमा ने अपने प्रशासनिक पदों से इस्तीफा दे दिया है. इससे पहले गुरुवार को 14 दलित शिक्षकों ने प्रशासनिक पदों से इस्तीफा दे दिया था.

रोहित के नाम पर कानून बनाने की मांग
इस्तीफा देने वाली दोनों फैकल्टी मेंबर्स ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को हटाने की मांग की है. साथ ही मांग रखी है कि रोहित के नाम पर एक कानून बनाया जाए और शोषित समुदाय के छात्रों को उच्च शिक्षा में सुरक्षा दी जाए.

प्रभारी वीसी को भी हटाने की मांग
रोहित वेमुला के खुदकुशी मामले में वीसी के बेमियादी छुट्टी पर चले जाने के बाद के प्रभारी कुलपति बने विपिन श्रीवास्तव का विरोध भी शुरू हो चुका है. इस बीच, दिल्ली में जेएनयू के छात्र भी भूख हड़ताल पर बैठ गए. छात्रों ने उन्हें दागी करार दिया है और उन्हें पद से हटाने की मांग की है. लेकिन प्रो. श्रीवास्तव ने कहा है कि वो पुराना मसला था, जो सुलझ गया है.

जेएनयू में उठी यह मांग
जेएनयू छात्रों की मांग है कि छुट्टी पर चल रहे हैदराबाद यूनिवर्सिटी के वीसी अप्पा राव पोदिले, केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और स्मृति ईरानी को गिरफ्तार किया जाए. देशभर में जस्टिस फॉर रोहित नाम से एक आंदोलन चलाया जा रहा है. जेएनयू के छात्र भी इसका हिस्सा हैं.

श्रीवास्तव का विरोध क्यों?
श्रीवास्तव पर 2008 में दलित छात्र सेंथिल को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है. छात्रों का कहना है कि इस मामले में उनकी गहरी भूमिका है. अनुसूचित जाति-जनजाति ऑफिसर्स फोरम ने उन पर यह आरोप लगाया है.

छुट्टी पर हैं वीसी
रोहित की खुदकुशी पर हंगामे को लेकर कुलपति अप्पा राव पोदिले बेमियादी छुट्टी पर चले गए. इसके बाद वरिष्ठ प्रोफेसर श्रीवास्तव को कार्यवाहक कुलपति बनाया गया है. श्रीवास्तव ने कहा कि उनकी प्राथमिकता यूनिवर्सिटी के शिक्षण और प्रशासनिक कामकाज को बहाल करना है.

क्या चाहते हैं छात्र?
फिलहाल छात्र पोदिले को हटाने और रोहित के परिवार को 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की मांग करते हुए अनिश्चितकालीन क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठे हैं. इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बनी स्थिति पर श्रीवास्तव ने कहा कि बातचीत से हम सारे मुद्दे सुलझा लेंगे. जो हो रहा है उसकी वजह कम्युनिकेशन गैप है.

जंतर मंतर पे कई दिनों से आमरण अनशन पे बैठे कुछ साथी

इस कराके के ठण्ड में भी जंतर मंतर पे कई दिनों से आमरण अनशन पे बैठे कुछ साथी , जो रोहित वेमुला को इंशाफ़ दिलाने को लेकर धरने पे हैं ,सायद इस ओर किसी मिडिया या फिर हमारे ही संगठनो की नजर इस पे न हो,हम नही चाहते की यैसी कोई अनहोनी हो जो चिंगारी आग के गोले में तब्दील हो जाये .इंसाफ तो चाहिए ही

DASFI ग्वालियर टीम द्वारा रोहित वेमुला की हत्या के विरोध में प्रदर्शन

 

 

स्मृति ने दत्तात्रेय का किया बचाव

हैदराबाद में छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी मामले में विपक्ष का चौतरफा वार झेल रही मोदी सरकार ने बुधवार को इस ओर अपनी सफाई पेश की है. केंद्रीय मानव संसाधन और शि‍क्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि यह मामला दलित बनाम गैर दलित का नहीं है, जैसा कि इसे पेश किया जा रहा है. केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि छात्र के सुसाइड नोट में किसी संस्था, दल या अधिकारी का जिक्र नहीं.

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान स्मृति ईरानी ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या पर उठ रहे सवालों का जवाब दिया. उन्होंने कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में ही कहा, ‘यह मुद्दा दलित और गैरदलित का नहीं है, जैसा कि इसे पेश किया जा रहा है. हमारे पास विश्वविद्यालय, पुलिस और अन्य स्त्रोत से जो जानकारी है उसे हम आस सभी के सामने रख रहे हैं.’

‘एक मां और मंत्री होने के नाते दुखी हूं’
स्मृति ईरानी ने आगे कहा, ‘मैं इस घटना से बेहद दुखी हूं. यह मामला अगस्त का है. छात्रों के बीच विवाद हुआ और एक छात्र के साथ मारपीट की गई. छात्र की मां ने इस संबंध में कोर्ट में केस किया. जिसके बाद इस पर कार्रवाई हुई और कमिटी ने उनके निलंबन का फैसला लिया. जिस कमिटी ने यह फैसला लिया उसमें दलित प्रोफेसर भी हैं, जिन्होंने मिलकर यह फैसला लिया है.’ उन्होंने कहा कि वह एक मां और मंत्री होने के नाते रोहित की मौत से दुखी हैं.

मंत्री ने आगे कहा, ‘कुछ मीडिया चैनल और राजनीतिक पार्टियां इसे दलित मुद्दा बता रही हैं, जो ठीक नहीं है. मेरे पास उस छात्र का अंतिम पत्र है पुलिस ने इसे वेरिफाई किया है. उसने अपनी चिट्ठी में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा, जिससे यह मामला दलित के साथ जोड़कर देखा जाए. इस मामले में जैसी भी कार्रवाई हुई वो सही थी और कमिटी ने भी इसे सही ठहराया था.’

‘कांग्रेस के साथी ने भी लिखी थी चिट्ठी’
स्मृति ईरानी ने सांसद की शि‍कायत पर कहा कि ऐसा नहीं है कि बंडारू दत्तात्रेय ने सिर्फ चिट्ठी लिखी, अन्य लोगों ने भी इस घटना से हमें अवगत करवाया जिसमें कांग्रेस के साथी हनुमंत राव भी शामिल हैं. मंत्रालय को सांसदों की चिट्ठी पर जवाब देना होता है वो भी तय समय सीमा के अंदर. जो भी कार्रवाई हुई है वो नियम के अनुसार हुई.

‘दत्तात्रेय भी ओबीसी परिवार से आते हैं’
अन्य सवालों पर स्मृति ईरानी ने कहा कि बुधवार को केंद्रीय कमिटी वापस आ रही है और उनकी द्वारा जानकारी मिलने के बाद ही मैं इस पर पूरी तरह टिप्पणी कर पाऊंगी. स्मृति ईरानी ने बार- बार एक ही बात दोहराई की मामला दलित-गैरदलित नहीं है. जिस छात्र की पिटाई हुई वह भी ओबीसी है, दत्तात्रेय भी ओबीसी परिवार से आते हैं तो इसे जातीय मुद्दा नहीं बनाना चाहिए.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों पर स्मृति ईरानी ने कहा, ‘हमने वही किया जो हमें करना चाहिए. कमिटी का फैसला भी ठीक था और कोर्ट ने भी इसमें दखल दिया था.

बंडारू दत्तात्रेय ने भी दी सफाई
दूसरी ओर, सांसद और केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने भी इस ओर अपनी सफाई पेश की है. उन्होंने बुधवार को कहा, ‘रोहित वेमुला की मौत के बारे में जानकार मुझे बहुत दुख हुआ. मैं इस बारे में कुछ बातें स्पष्ट करना चाहता हूं. 10 अगस्त 2015 को मुझे यूनिवर्सिटी के स्टेट अफेयर्स के प्रतिनिधि‍त्व से कुछ शि‍कायतें मिलीं, जिनसे मैं बहुत आहत हुआ. मैंने उसे मानव संसाधन और विकास मंत्रालय को भेज दिया. 29 अगस्त को मुझे दूसरी बार शि‍कायत मिली, जिसे मैंने फिर मंत्रालय को भेज दिया और मांग की कि वह मामले में दखल दें.’

दत्तात्रेय ने आगे कहा, ‘हैदराबाद यूनिवर्सिटी एक स्वायत्त संस्थान है और इसकी प्रशासनिक कार्रवाई में मेरी कोई भूमिका नहीं है. मेरी भूमिका बस इन दो प्रतिनिधत्व वाली शि‍कायतों तक स‍िमित है. अगर संस्थान की किसी अन्य छात्र समूह या संगठन से भी कोई प्रतिनिधत्व आकर मुझसे मिलता और अपनी बात रखता तो मैं उसे भी आगे बढ़ाता.’