दलितों के अपमान का जश्न है होली : राज आदिवाल

हमारा होली का त्योहार भी हमारे देश के महान मूलनिवासी राजाओ और विदेशी आर्य लुटेरो के बीच हुए संघर्ष की एक गाथा है , प्राचीन काल मे हमारे देश के कश्यप राजा रहे हिरण्यकश्यप और उसके परिवार की कहानीकहता है हमारा होली का त्योहार ।ऐतेहासिक गाथा के अनुसार हमारे मूलनिवासी राजा”हिरण्यकश्यप” बहुत पराक्रमी हुआ करते थे ,

राजा हिरण्यकश्यप ने विदेशी हिंसक ग्रंथ वेद-पुराणों की नीति को अपने यहा लागू नहीं होने दिया और अपना प्राचीन मूलनिवासी और नागवंशी धर्म ही मानते रहे जिसकी वजह से विदेशी आर्य लुटेरे उनके राज्य पर कब्जा नहीं कर पा रहे थे तो उन्होने अपनी हमेशा की छल और बहरूपिये वाली नीति अपनाने की कोशिश की जिसके सहारे वो हमारे देश मे घुसे थे । उन्होने राजा हिरण्यकश्यप के साथ छल/धोखा करके उनकी हत्या तो कर दीलेकिन उस राज्य की प्रजा ने भी विदेशी आर्य लुटेरों की सत्ता को स्वीकारने से इंकार कर दिया ।
तो उन्होने”हिरण्यकश्यप” के अल्पायु पुत्र “प्रहलाद” को ही राजाबनाने की योजना बनाई लेकिन साथ ही उन्होने ये सोचा कीप्रहलाद को विदेशी आर्य ग्रंथो वेद-पुराणों की शिक्षा देकर उसे अपने वश मे कर लेंगे जिससे प्रजा की नज़र मे तो राजा प्रहलाद ही रहेगा लेकिन वो काम उन लुटेरों के फ़ायदे का करेगा । लेकिन उनके इस षड्यन्त्र का पता “होलिका” को चल गया था तो वो प्रहलाद को बचाने के लिए उसको अपने साथ लेकर सुरक्षित स्थान की ओर चल दी लेकिन उन आर्य लुटेरों कीकुटिल नजरों से वो नहीं बच पाई और

उन आर्य लोगो ने निहत्थी होलिका को जिंदा जलाकर उसको मार डाला ।हम होली अपने महान राजा हिरण्यकश्यप और वीर होलिका के बलिदान को याद रखने हेतु शोक दिवस के रूप मे मनाते थे और जिस तरह मृत व्यक्ति की चिता की हम आज भी परिक्रमा करते है और उस पर गुलाल डालते है ठीक वही काम हम होली मे होलिका की प्रतीकात्मक चिता जलाकर और उस पर गुलाल डालकर अपने पूर्वजो को श्रद्धांजलि देतेआ रहे थे ताकि हमे याद रहे की हमारी प्राचीन सभ्यता और मूलनिवासी धर्म की रक्षा करते हुए हमारे पूर्वजो ने अपने प्राणो की आहुति दी थी । लेकिन इन विदेशी आर्य लुटेरों ने हमारे इस ऐतेहासिक तथ्य को नष्ट करने के लिए उसको तोड़ मरोड़ दिया और उसमे काल्पनिक”विष्णु” और उसका बहरूपिये पात्र “नृसिंह अवतार” की कहानी घुसेड़ दी । और जिसकी वजह से आज हम अपने ही पूर्वजो को बुरा और राक्षस मानते आ रहे है , और इन लुटेरों को भगवान मानते आ रहे है ।
ये विदेशी आर्य असल मे अपने आपको “सुर” कहते थे और हमारे भारत के लोगो और हमारे पूर्वज राजाओ की बेइज्जती करने के लिए उनको “असुर” कहा करते थे । और इनलुटेरों/डकैतो की टोली के मुख्य सरदारो को इन्होने भगवान कह दिया और अलग अलग टोलियो/सेनाओ के मुखिया/सेनापतियों को इन्होने भगवान का अवतार दिखा दिया अपने इन काल्पनिक वेद-पुराणों मे ।

और इस तरह ये विदेशी आर्य हमारे भारत के अलग-अलग इलाको मे अपने लुटेरों की टोली भेजते रहे और हमारे पूर्वज राजाओ को मारकर उनका राजपाट हथियाते रहे । और उसी क्रम मे इन्होने हमारे अलग-अलग क्षेत्र के राजाओ को असुर घोषित कर दिया और वहाँ जीतने वाले सेनापति को विभिन्न अवतार बता दिया ।और आज इससे ज्यादा दुख की बात क्या होगी की पूरा देश यानि की हम लोग इनके काल्पनिक वेद-पुराणों मे निहित नकली भगवानों याने हमारे पूर्वजो के हत्यारो को पूज रहे है और अपने ही पूर्वजो को हम राक्षस और दैत्य मानकर उनका अपमान कर रहे है ।

 

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जो लड़ रहे जीने के लिए..

 

जो लड़ रहे जीने के लिए..(File Pic)

‘बेरहम बिसात’ ने मुझे अंदर से झकझोर दिया। लखनऊ के बाबा साहब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में मैंने रोहित वेमुला जैसों को देखा है। रोहित सी वेमुला और इन वेमुलाओं में अंतर सिर्फ इतना है कि इनके पास जिजीविषा है, आंबेडकर के जीवट संघर्ष का आदर्श है, ज्योतिबा फुले और बिरसा मुंडा के विचार हैं, बुद्ध के संस्कार हैं। इन्हें विश्वास है आंबेडकर के बनाए संविधान पर। इन्हें विश्वास है कि इनका जन्म लेना अभिशाप नहीं है। लखनऊ के आंबेडकर विश्वविद्यालय के शोधार्थी हों या फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के, सभी की स्थिति एक जैसी ही मिलेगी।

इनमें उन शोधार्थियों की स्थिति और भी खराब है जो राजीव गांधी राष्टीय फेलोशिप प्राप्त करते हैं। उनका ध्यान शोध पर कम फेलोशिप की कागजों से लदी फाइलों पर ज्यादा रहता है। वे अपने सुपरवाइजर से कम मिलते हैं विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन और बैंक के चक्कर ज्यादा काटते हैं। ऊपर से विश्वविद्यालय के कुलपति का बयान आता है कि विद्यार्थी मोटरसाइकिल खरीद कर फेलोशिप का दुरुपयोग करते हैं। समान्यत: हर शोधार्थी गृहस्थ आश्रम के पड़ाव पर होता है। ऐसे में कभी किसी कुलपति ने अपने शोधार्थी के बारे में यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर 8000 रुपए में शोध का काम कैसे चल रहा है।

आंबेडकर विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि ले चुकीं डॉक्टर वेला टर्की अपने दो मासूम बच्चों के साथ अभी भी पिछले चार सालों से फेलोशिप के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन का चक्कर काटती हैं। इन सब के बावजूद इन शोधार्थियों को लड़ना आता है। बाबा साहब भी तो लड़े थे। रोहित वेमुला भी लड़े और हार नहीं मानी। लेकिन उनसे चूक हो गई जीते जी यह संदेश देने में कि धूल के कणों से ही शानदार वस्तुएं बनती हैं, सभी क्षेत्रों में।

सवाल यह नहीं कि रोहित ने आत्महत्या क्यों और किन हालात में की। सवाल तो यह है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली जिसके मूल्यों और संस्कार की हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशों में चर्चा करते रहे हैं, उसका स्तर ऐसा क्यों हो गया है कि एक शोधार्थी मरने पर मजबूर हो जाए। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में पिछले एक दशक में दलित छात्र के खुदकुशी करने की यह नौवीं घटना है। संस्थान-विशेष से अलग हट कर देखें तो पिछले चार साल में अठारह दलित विद्यार्थी आत्महत्या कर चुके हैं। रोहित की मौत ने एक बार फिर हमारे शैक्षिक परिसरों का एक बहुत दुखद पहलू उजागर किया है।

-हरिनाथ कुमार, बाबा साहब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में शोधार्थी
मौत में न बदले वैचारिक टकराव
विडंबना ही है कि 21वीं सदी के भारत में भी अगड़ा-पिछड़ा की ग्रंथि हावी है। जिस विश्वविद्यालय को बौद्धिक विमर्श का केंद्र माना जाता है वहां भी दलित छात्रों के साथ भेदभाव आम सी चीज है। नतीजतन विश्वविद्यालय परिसर में जातिगत छात्र संगठन और उनके वैचारिक टकराव आए दिन देखे जा सकते हैं। लेकिन वैचारिक टकराव का हिंसक होना या फिर आत्महत्या के रूप में परिणत होना बेहद चिंताजनक है। इससे समाज में अलगाव ही बढ़ेगा। विद्यार्थी परिषद् और संघ परिवार को भी क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि आखिर क्यों अक्सर दलित छात्रों से उनका इतना तीखा टकराव बना हुआ रहता है? एक तरफ तो मोदी सरकार आंबेडकर के सम्मान में भव्य आयोजन करती है, तो वहीं जमीनी स्तर पर उसके समर्थक आंबेडकर को आदर्श मानने वालों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं। इस विरोधाभास पर उन्हें सोचने की जरूरत है।
-डॉक्टर हर्ष वर्द्धन, गेस्ट फैकल्टी, समाजशास्त्र विभाग, पटना कॉलेज
बे-सबक सत्ता
‘सत्ता के सबक’ से सत्तासीन दल और उसके मुखिया नरेंद्र मोदी कोई सबक लेते नहीं दिखते। ये अब भी अनर्गल बयानबाजियों में जुटे हैं। कभी भ्रष्टाचार पर कोहराम मचाने वाला दल अब अपने नेताओं पर पड़ रहे भ्रष्टाचार के छींटों को बिना जांच के ही बेदाग करार दे रहा है। महंगाई कम करने का वादा करने वाली सरकार के राज में जरूरत के सामान से लेकर रेल सफर तक महंगे होते जा रहे हैं। मुकेश भारद्वाज ने उचित ही लिखा है, ‘लेकिन देश में चल रही उठापटक से बेखबर मोदी अंतरराष्टÑीय स्तर पर अपनी छवि निखारने में लगे रहे। बल्कि कहा जा सकता है कि विदेश के मोर्चे पर यह ऐसा इलाका रहा है, जिसमें उन्होंने शानदार कामयाबी हासिल की। लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में मिली ऐसी कामयाबी का क्या हासिल, जब अपने घर में हालत लगातार खराब होती जा रही हो’! मोदी देश की समस्याओं से पैदा हुए नकारात्मक माहौल को विदेशी धरती पर अपनी सफलता से संतुलित करने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन, इतिहास में विंस्टन चर्चिल की मिसाल भी है, जिनकी झंडाबरदारी में द्वितीय विश्व युद्ध में गठबंधन सेना ने बड़ी कामयाबी हासिल की, लेकिन कुछ ही समय बाद हुए ब्रिटेन के आम चुनाव में उनकी कंजरवेटिव पार्टी को मात खानी पड़ी। और, मोदी जी को इतिहास से सबक जरूर लेना चाहिए।
– पुरुषोत्तम नवीन, मयूर विहार, दिल्ली
समझ से बाहर दोस्ती
मुकेश भारद्वाज का लेख चेतना को जगाता है। प्रधानमंत्री की लाहौर यात्रा जनता की समझ से बाहर रही। अगर यह दौरा कूटनीतिक था तो इसका आधार अवश्य होना चाहिए। भारतीय जनता युद्ध नहीं चाहती। यह भी सच है कि अंतिम रास्ता बातचीत और सद्भाव है। लेकिन भारत-पाक दोस्ती इस बात पर निर्भर करती है कि पठानकोट जैसी घटना दुबारा न हो और भावी वार्ता भारत-पाक संबंधों के लिए हो न कि मोदी-शरीफ की निजी दोस्ती के लिए।
-उत्पल मणि त्रिपाठी, प्रतियोगी छात्र इलाहाबाद
पाक दौरे की आलोचना सही
‘ये दोस्ती’ में मोदी-शरीफ मुलाकात और उसके तत्काल बाद घटी पठानकोट त्रासदी का विश्लेषण बहुत सही हुआ है। मुकेश भारद्वाज का प्रश्न सही है कि आज अगर कांग्रेस, शिवसेना और दूसरे दल सरकार की नीति की निंदा कर रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? फिर जो हुआ उससे हर नागरिक के मन में यह विचार उठना स्वाभाविक है कि अगर मोदीजी संयत रह कर फोन पर ही बधाई-संदेश दे देते तो पठानकोट की त्रासदी न घटती! पाक यात्रा तो पर्याप्त कूटनीतिक तैयारियों के बाद करनी थी।
-शोभना विज

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Dalit suicide row: 10 professors quit

 

Ten professors of the University of Hyderabad have resigned from their administrative posts as the crisis triggered by a Dalit scholar’s suicide deepened on Thursday despite the BJP-led central government’s attempts to blunt opposition attack against two ministers.

The professors, all belonging to SC/ST communities, quit in a show of solidarity with students demanding justice for 26-year-old Rohith Vemula, who committed suicide after he was suspended from the university along with four other students.

The professors also protested alleged misrepresentation of facts by Union minister for human resource development Smriti Irani who had mounted a spirited counter-attack on the opposition demanding her sacking along with Union minister Bandaru Dattatreya. She had termed the protests as a “malicious attempt” to project the issue as a caste battle.

“In response to the honourable minister’s (Smriti Irani) fabricated statements, we the Dalit (SC/ST) faculty and officers lay down our administrative positions,” said a press statement by university’s SC/ST Teachers and Officers’ Forum.

The Irani-led HRD ministry has been at the centre of a controversy after it emerged that it had written five letters to the university following Dattatreya’s complaint that the campus had turned into a “den of casteist, extremist and anti-national politics”.

The professors also rubbished Irani’s claim that a Dalit professor was among the members of the university’s body that suspended the students including Vemula.

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जाओ जाकर पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती

जाओ जाकर पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती
काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो
ज्ञान के बिना सब खो जाता है,
ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है
इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो
दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो, तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है
इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो, ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो।______सावित्रीबाई फुले

https://www.facebook.com/SatyendraHumanist/videos/870038609720368/

1. इनका जन्‍म 3 जनवरी, 1831 में दलित परिवार में हुआ था।
2. 1840 में 9 साल की उम्र में सावित्रीबाई की शादी 13 साल के ज्‍योतिराव फुले से हुई।
3. सावित्रीबाई फुले ने अपने पति क्रांतिकारी नेता ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले. उन्‍होंने पहला और अठारहवां स्कूल भी पुणे में ही खोला।
4. सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला अध्यापक-नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता थीं।
5. उन्‍होंने 28 जनवरी 1853 को गर्भवती बलात्‍कार पीडि़तों के लिए बाल हत्‍या प्रतिबंधक गृह की स्‍थापना की।
6. सावित्रीबाई ने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया।
7. सावित्रीबाई फुले ने आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में डिलवरी करवा उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया. दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर इन्होंने डॉक्टर बनाया।
8. महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु सन् 1890 में हुई. तब सावित्रीबाई ने उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिये संकल्प लिया।
9. सावित्रीबाई की मृत्यु 10 मार्च 1897 को प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान हुई।
10. उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता।
प्रथम महिला शिक्षिका के जन्म-दिवस पर बहुत बहुत बधाई।
फुले दम्पत्ति को सादर नमन।
जयभीम।